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प्यारेलाल यादव
गीतकार


























Film Review
लाडला (भोज.) :डिस्कोडांसर की घटिया Cop


लाडला (भोजपुरी)

लेखक- नन्हे पाण्डॆ

गीतकार- प्यारेलाल यादव, आजाद सिंह और मनोज मतलबी 

निर्देशक- प्रेमांशू सिंह

निर्माता- नीलाभ तिवारी, रंजीत सिंह

कलाकार- केशरी (खेसारी) लाल यादव, नेहाश्री, रंजीत सिंह, आलोक कुमार आदि.

 

लेखक नन्हे पाण्डेय आज के भोजपुरी फिल्म दर्शक की पसन्द को जानते हैं कि वे प्रेमिका को माल और माँ को भगवान का रूप मानते हैं, इसीलिए लाडला की जो कहानी बनाई है, उसमें माँ को मजबूत कड़ी के तौर पर प्रस्तुत करने की कोशिश है. मगर उनकी कोशिश अधकचरी है. कहीं की ईट, कहीं का रोड़ा लेकर कहानी बनाने की कोशिश की है, मगर कहानी बी सुभाष की मिथुन चक्रवर्त्ती स्टारर हिट हिन्दी फिल्म “डिस्को डांसर” की घटिया कॉपी बन गई है. पटकथा भी इतनी बुरी तरह से लिखी गई है कि मनमोहन देसाई की लॉस्ट एंड फाउंड कहानी, डिस्को डांसर की कहानी और आम फूहड़ भोजपुरिया फिल्मों का लव ट्रैक (सेक्स ट्रैक कहना ज्यादा सही है) जोड़ने के बाद भी दृश्य फिल्म में लय पैदा नहीं कर पाते. पटकथा के नाम पर लेखक ने मनमाने तरीके से दृश्यों की अनगढ़ श्रृंखला बनाई है. संवाद भी माशाअल्लाह ही हैं.

यह विडम्बना ही है कि भोजपुरी फिल्मों के क्षेत्र बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तरप्रदेश सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर जितने उर्वर हैं, भोजपुरी फिल्मों के लेखक रचनात्मक स्तर पर उतने ही कंगाल हैं. उसी समाज की कहानी कहकर प्रेमचन्द, शिवपूजन सहाय, फणीश्वर नाथ रेणु, आदि महान कथाकार कहलाए, मगर उस समाज में भोजपुरी फिल्म लेखकों को कहानी का कोई प्लॉट नहीं मिलता और कहानी के लिए पुरानी मसाला हिन्दी फिल्मों की कॉपी करनी पड़ती है. उस पर से इन लेखकों का फिल्म लेखन ज्ञान भी भगवान भरोसे ही है. जो लोग भोजपुरी फिल्मों की निर्माण प्रक्रिया से जुड़े नहीं हैं, उनको लगता होगा कि भोजपुरी में अच्छे स्क्रीन रायटर्स शायद हैं ही नहीं, मगर सच्चाई ऎसी नहीं है. सच यह है कि फिल्मकार को अच्छे लेखक की आवश्यकता ही नहीं है. वह सिर्फ हिट स्टार के दम पर अपनी फिल्म को हिट बनाना चाहते हैं. लेखक उनके लिए बस खानापूर्त्ति करनेवाला मुंशी है. इसीलिए जब वह फिल्म का बजट बनाते हैं, तब स्टार पर 50 से 60 लाख तक खर्च करते हैं, मगर लेखक को बमुश्किल 50 हजार रुपए देते हैं. ऎसा क्यों है यह समझ से परे है, जबकि स्क्रिप्ट ही अच्छी फिल्म की बुनियाद है.

फिल्म की कहानी विस्तार से बताने की जरूरत नहीं है. यह एक माँ (माया यादव) की कहानी है, जो अपने बेटे (केशरी लाल यादव)  को बड़ा गायक का स्वप्न देखती है. इस दौरान उसे नौकरानी के रूप में एक अमीर व्यक्ति ( ब्रजेश त्रिपाठी) के यहाँ काम करना पड़ता है. वहाँ उसे बड़ा अपमान सहना पड़ता है. बेटा बड़ा होता है और उसी अमीर आदमी की बेटी (नेहाश्री) से प्यार करने लगता है. सिंगर के तौर पर कॉम्पीटिशन भी उसी व्यक्ति के बेटे राजा सिंह (रंजीत सिंह) से होती है, जो कि सुपरस्टार है. इस काम में राजा का सेक्रेटरी (आलोक यादव) उसकी सहायता करता है. बीच में माँ बेटे का इमोशनल ड्रामा है और फिल्म पूरी होती है.

फिल्म में जबतब गीत भी आते रहते हैं. गीत फूहड़ शब्दावली से आप्लावित हैं. पता नहीं हीरोइन और आइटम डांसर में कब फर्क करना सीखेंगे गीतकार. भाई प्रेमिका सिर्फ खटिया पर लेटनेवाली नहीं होती है. एक रोमांटिक गीत के बोल देखिए, ‘ बुता द तनी लंप, मारs खटिए पर जंप’. दूसरा रोमांटिक गीत है, ‘ ढूँढ़ी में फँस गइल टुटल बुसट के बटाम हो’.  माँ को लेकर भी एक गीत है, ‘कुहकेला हरदम बेटा खाती माई के करेजा’ यह गीत हिदी में पहले से हिट है, भोजपुरी में उसकी लोकप्रियता को भुनाने की कोशिश है.

कुल मिलाकर यह फिल्म भोजपुरी सिनेमा की एक और कमजोर कड़ी है. 



   Dhananjay Kumar

Dhananjay Kumar is a Writer of Bhojpuri & Hindi (Films and TV Show)..

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