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Baazigar
Baazi GaddMadd


Sanoj Mishra
Director


Manoj Kushwaha
Writer


























Film Review
Baazigar Bhojpuri:बाज़ी गड्डमड्ड


बाजीगर, भोजपुरी

लेखक- मनोज के कुशवाहा

गीतकार- प्यारेलाल यादव, जाहिद अख्तर, हरेराम डेंजर, मधुकर आनन्द और सनोज मिश्रा.

निर्माता- महेन्द्र पवन कुमार सिंह,

निर्देशक सनोज मिश्रा.

कलाकार- रवि किशन, पवन सिंह, सुभी शर्मा और अनन्या सरकार

 

एक बाजीगर 1993 में आई थी, वो हिन्दी फिल्म थी, अब्बास-मस्तान व्दारा निर्देशित क्राइम-थिलर. एक और बाजीगर इस सप्ताह आई है, यह भोजपुरी फिल्म है, सनोज मिश्रा व्दारा निर्देशित. कोशिश पुरानी बाजीगर के जैसी क्राइम-थिलर बनाने की ही रही होगी, क्योंकि कहानी की प्रेरणा पहली बाजीगर से ही उठाई गई लगती है, मगर प्रेरणा ही गड्डमड्ड हो गई है. फिल्म लड़की को जबरन पटाने से शुरू होती है, फिर दो हीरो की कहानी बन जाती है, फिर बदले की कहानी का रूप लेते हुए त्रिशूल का भूत घुस जाता है और अंत में पुरानी भोजपुरी फिल्मों के मुनीम विलेन वाला सरल ट्रैक पकड़कर फिल्म अंजाम तक पंहुचायी जाती है.

फिल्म के लेखक हैं मनोज के कुशवाहा. कहानी पवन (पवन सिंह) की है, जो अपने बड़े भाई की हत्या का बदला लेने के मकसद से पढ़ाई छोड़कर आया है. उसे मालूम है कि उसके भाई की हत्या महादेव सिंह (रविकिशन) ने की है, इसलिए उससे बदला लेने के लिए जबरन उसकी बहन (सुभी शर्मा) को पटाता है. सुभी भी उससे प्यार करने लगती है, महादेव अपनी बहन से बहुत प्यार करता है और वह नहीं चाहता कि वह पवन से प्यार करे. वह अपनी बहन को तो रोक नहीं पाता, मगर पवन से सौदा करता है कि मुँहमागी रकम लेकर उसकी बहन की जिन्दगी से दूर चला जाय. पवन पैसे लेकर अपना बिजनेस खड़ा करता है. सुभी को पवन के इस व्यवहार से निराशा होती है... मगर आखिर में पता चलता है कि पवन के भाई की हत्या महादेव ने नहीं, महादेव के मुनीम ने की है. महादेव और पवन के बीच की गलतफहमी दूर होती है और दोनों मिलकर मुनीम को सजा देते हैं.

पहले तो कहानी ही क्लियर नहीं है, उस पर से बचकाना स्क्रीनप्ले फिल्म को बेहद लचर बना देता है. कहानी को सीन दर सीन आगे बढ़ाने के बजाय पवन सिंह और रवि किशन पर ज्यादा फोकस किया गया है. पवन और रवि ने अच्छा संभाला भी है, मगर बिना सही स्क्रिप्ट के एक्टर आखिर कबतक सिर्फ अपने प्रजेंस के बल पर दर्शकों की रुचि बनाए रख सकता है. इसलिए इंटरवल तक तो फिल्म टिपिकल भोजपुरी दर्शकों पर अपनी पकड़ बनाए रखती है, मगर उसके बाद वह इंट्रेस्ट भी छूट जाता है. लेकिन फिल्मकार की रिपोर्ट के अनुसार फिल्म बिहार में सुपरहिट है.

भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री ने फिल्म बाजार में तो अपनी जगह बना ली है, मगर लेखन के स्तर पर अपनी शुरुआत के पचास साल बाद भी बेहद प्राइमरी स्तर पर है. क्राफ्ट को समझकर लेखन करनेवाले लेखकों से अब भी बहुत दूर है भोजपुरी फिल्में. यही वजह है कि संख्या में भले हर साल 100 के करीब भोजपुरी फिल्में बन रही हैं, स्टारों की कीमतें भी पचास लाख तक पहुंच चुकी है, मगर रचनात्मक स्तर पर भोजपुरी फिल्में दो कौड़ी की भी नहीं रह पाती हैं. यह बड़ी चिंता का विषय है, मगर अफसोसजनक बात यह है कि भोजपुरी फिल्मकारों को इस बात की जरा भी चिंता नहीं है. भोजपुरी फिल्म प्लान करते वक्त फिल्मकार अपने टार्गेट ऑडियंस की फॉर्मूला पसंद से आगे बढ़ नहीं पा रहे हैं. लेखक आमतौर पर इसके लिए निर्माता को दोषी मानते हैं, कि उनको अच्छी और नई कहानी नहीं चाहिए. मान लिया कहानी के स्तर पर निर्माता टिपिकल फॉर्मूले से हटना नहीं चाहते, मगर हमारे लेखक अच्छी पटकथा तो लिख सकते हैं, मगर उसमें भी वह जीरो साबित होते हैं. इसकी बड़ी वजह है लेखक का स्किल्ड स्क्रीन रायटर न होना. ज्यादातर रायटर स्क्रीनप्ले राइटिंग के बेसिक से भी अपरिचित हैं. बस वह सीन लिखते चले जाते हैं.

गीत स्तर पर इस फिल्म में फूहड़ शब्दों का कम इस्तेमाल है यह थोड़ी राहत की बात है. मगर कोई भी गीत याद नहीं रह सका. एक गीत की पंक्ति याद रही वह है... जवानी छोहाड़ा...इस गीत में लड़की अपनी जवानी को छोहाड़ा हो गई बता रही है.



   Dhananjay Kumar

Dhananjay Kumar is a Writer of Bhojpuri & Hindi (Films and TV Show).

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