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आनंद बख़्शी (21 जुला





Old is Gold
आनंद बख़्शी (21 जुलाई 1930 - 30 मार्च 2002)

आम आदमी के हमज़ुबां

 

हिंदी फ़िल्मों में यूं तो गीतकार बहुत से आयें, लेकिन आनंद बख़्शी की क़लम ने जो आम आदमी को बयां करने वाले किरदारों के सुख-दुख को उकेरा, वो अन्यत्र कम ही मिलता है। आनंद बख़्शी यानि वो गीतकार जो गीत लिखते समय हमेशा ख़ुद से ज़्यादा किरदार की सोच को अपने गीत में रोंपने का प्रयास करता रहा।

वे सिने-संगीत प्रेमियों की नस को पकड़कर बाज़ार के साथ चलते रहें और अपनी सासें थमने तक हिंदी फिल्म उद्योग को अपने अनुभवों से नवाज़ते रहें। वे अनुभव जो उन्होंने कठोर संघर्ष और लंबे इंतज़ार के बाद पाए थे।

 

 

बचपन जवानी और सपनें

आनंद बख़्शी का जन्म 21 जुलाई 1930 को पेशावर (पाकिस्तान) के मधयमवर्गीय परिवार में हुआ। उन्हें परिवार में प्यार से सभी नंदों कहकर पुकारते थें। संघर्ष से उनका सामना उन्हें किशोरावस्था के दौरान ही हो गया। भारत-विभाजन ने उन्हें अपने घर से किशोरावस्था में ही विस्थापित कर दिया। इसका उनके व्यक्तित्व पर गहरा असर पड़ा। 1947 में वे अपने परिवार के साथ दिल्ली आ गए। विस्थापन की परेशानियों ने उन्हें अपने अंदर कुछ खोजने को मजबूर कर दिया और वे हल्की-फुल्की शायरी करते हुए उन्हें गुनगुनाने लगें। फिर पेट की ख़ातिर और पारिवारिक परिस्थितियों के चलते, उन्होंने 18 साल की उम्र में सेना की नौकरी चुन ली। सेना में काम करते हुये भी उन्होंने रेडियो सुनने और गाने का शौक जारी रखा। वे फ़ौजी कैंपों में अपने साथियों के बीच अपने गीत और कविता पढ़कर सुनाते तो उन्हें उनके साथी सराहाँ करतें। इसी के चलते वे पहले सिंगिग में अपनी किस्मत आज़माना चाहते थें।

एक दिन इसी हिम्मत के साथ वे कुछ दिन की छुट्टी लेकर मुंबई आ गए, पर पहली बार मुंबई ने उन्हें बैरंग लौटा दिया। उन्हें स्वयं पर विश्वास था और वे ये भी जानते थें कि नौकरी और गीत लेखन की राह एक साथ आगे नहीं चल सकती है। इसलिए उन्होंने फौजी के रूप में देशसेवा करने के बजाय अपने गीतों के ज़रिए देश की सेवा करने के निश्चय किया और वे फ़ौज की नौकरी छोड़ एकबार फिर मुंबई चले आए।

 

मुंबई शहर, संघर्ष और पहला अवसर

आनंद बख़्शी साहब मुंबई आ तो गए पर यहां पर उनके पास रहने का कोई ठिकाना नहीं था इसलिए वे दादर स्टेशन पर ही सोने लगे। दिनभर एक बेंच पर बैठ अपने आप में खोए रहते और कॉपी पेन लेकर कुछ ना कुछ लिखते रहते। नौजवान बख़्शी साहब को ऐसा करते हुए जब कई दिन हो गए तो उन पर दादर स्टेशन के टिकिट कलैक्टर चित्रमल की नज़र पड़ी। वे भले मानस थे, उन्हें अपने घर ले आये। युवा आनंद के जज़्बे को जान उन्हें करीब साल भर तक अपने घर रखा लेकिन उनसे वायदा लिया कि वो हर रोज़ किसी निर्माता को अपने गीत जाकर सुनाएंगे। इस तरह बख़्शी रोज़ अपने गीतों को लेकर निर्माताओं से मिलने लगें। उन्हें पहला फ़िल्मी गीत लिखने का अवसर मिला भगवान दादा अभिनीत फ़िल्म ‘भला आदमी’ के लिए 1956 में। पहली बार उन्होंने अपनी ही आवाज में ‘धरती के लाल, ना कर इतना मलाल’ रिकॉर्ड किया।

 

एक दशक का इंतजार

बतौर गीतकार आनंद बख़्शी साहब ने कई दशकों तक हिंदी फ़िल्म जगत पर राज किया लेकिन इसके लिए उन्हें लगभग एक दशक का इंतज़ार करना पड़ा। प्रारंभ में वे अपने गीत लिखने के साथ निर्माता से गाने का इसरार भी करते थें। पहले गीत के बाद उनकी आवाज़ तो नहीं चली पर बतौर गीतकार वे अपने पैर जमाने लगें। कई बार संगीतकार अपने पसंदीदा गीतकारों के साथ अपने रिहर्सल रूम में बैंठे रहते और आनंद बख़्शी बाहर अपनी बारी आने का इंतज़ार किया करते। संगीतकार चित्रगुप्त के बेटे आनंद ने विविध भारती को एक साक्षात्कार में बताया कि बख़्शी साहब हमारे पिता के संगीत कक्ष के बाहर घंटों बैंठे रहते और इस बोरियत को मिटाने के लिए हमारे लिए बाल कवितायें लिख दिया करते। हम दोनों भाई उन कविताओं को शनिवार को स्कूल में आयोजित बाल सभा में सुनाकर वाहवाही पा जाते!

इसी दौरान बख़्शी साहब के सुर, संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी के साथ मिलने लगें। 1962 में उनके संगीत से सजी फ़िल्म ‘मेंहदी लगी मेरे हाथ में’ और ‘काला समंदर’ में लिखे बख़्शी साहब के दो गीतों ने उन्हें थोड़ी पहचान दिलाई। साल 1965 में कल्याणजी जी-आनंद जी के संगीत निर्देशन में ‘हिमालय की गोद में’ और ‘जब जब फूल खिलें’ के गीतों को उन्होंने लिखा। ‘हिमालय की गोद में’ फ़िल्म के कुछ गीत इंदीवर ने भी लिखे थें पर 1965 में आई फ़िल्म ‘जब जब फूल खिलें’ के गीत ‘परदेसियों से ना अंखियाँ मिलाना’ ने बख़्शी साहब को बेहद लोकप्रिय गीतकार बना दिया।

 

यूं मिला जोड़ीदारों का साथ

फ़िल्मी जगत में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत और आनंद बख़्शी के गीत कई दशकों तक हिट का पर्याय माने जाते रहें । बतौर गीतकार आनंद बख़्शी के उदयकाल में कल्याणजी-आनंदजी के साथ इंदीवर भी सक्रियता के साथ गीत लिखा करते थें । उसी समय ‘हिमालय की गोद में’ फ़िल्म में कल्याणजी-आनंदजी के साथ मुख्य सहायक के रूप में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल भी काम कर रहे थें। उन्होंने इसी फ़िल्म के बाद स्वतंत्र रूप से संगीत देना शुरू किया। उनकी पहली फ़िल्म ‘पारसमणि’ का संगीत हिट रहा। लक्ष्मी-प्यारे बख़्शी साहब के चुटकी में गीतों के मुखड़े-अंतरें लिख देने की कला से वाक़िफ़ थें। उन्होंने बख़्शी साहब से बतौर गीतकार उनसे जुड़ने का आग्रह किया। फिर क्या था? इस जोड़ी की 1967 में आई ‘मिलन’ के बाद आनंद बख़्शी साहब चोटी के गीतकारों में पहुंच गयें। तीनों ने मिलकर कितनी फ़िल्मों में सुपरहिट गीत-संगीत दिया, यह सर्वविदित है।

आनंद बख़्शी ने लंबे समय तक बतौर गीतकार अपनी क़लम को कमज़ोर नहीं होने दिया। उन्होंने संगीतकारों की दो पीढ़ियों के साथ काम किया। वे जहां संगीतकार रोशन के साथ काम कर चुके थें तो उन्होंने राजेश रोशन के साथ भी काम किया। इस कड़ी में कल्याणजी-आनंदजी के बेटे विजू शाह और चित्रगुप्त के बेटे आनंद-मिलिंद के साथ भी काम किया।

 

भले मानस आनंद बख़्शी

महेश भट्ट् के मुताबिक, एक बार वे उनकी फ़िल्म जुर्म के संगीत पर काम कर रहे थें। महेश भट्ट् को आनंद बख़्शी ‘दो रास्ते’ से ही पसंद थें क्योंकि उनके गुरू राज खोसला भी बख़्शी साहब से ही गीत लिखवाते थें। लेकिन राजेश रोशन चाहते थें कि इंदीवर इस फ़िल्म के गीत लिखें। एक बार सिटिंग के दौरान बख़्शी साहब और राजेश रोशन मे थोड़ा मतभेद हुआ तो बख़्शी साहब वहां से उठकर चल दिए। महेश भट्ट ने बख़्शी साहब को फिर फोन घुमाया तो वे बड़े ही विनम्र अंदाज में बोले - “महेश, मेरे पास तो फ़िल्मों की कोई कमी नहीं हैं पर तुम्हारे संगीतकार के पास ज़्यादा काम नहीं है। वो मेरे दोस्त का बेटा है। अगर वो किसी और का साथ चाहता है तो उसे ही फ़िल्म में रहने दो। क्योंकि मैं नहीं चाहता कि मेरे चक्कर में उसके हाथ से ये फ़िल्म निकले।”

 

कमाल का काफ़िया कंरट

शब्द से शब्द मिलाकर मुखड़े तैयार करना और अंतरे को मुखड़े से मिलाने के लिए बेहतरीन शब्दों का उपयोग करना, बख़्शी साहब की बड़ी ख़ासियत थी। उर्दू में जिसे हम काफ़िया और देशी भाषा में तुकबंदी कहते हैं, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं मिलता है।

राजेश खन्ना पर फ़िल्माए ‘आक्रमण’ के गीत में एक बानगी देखिए -

“अंधा बेटा युद्ध पे चला तो ना जा,  ना जा उसकी मां बोली

वो बोला कम कर सकता हूं, मैं भी दुश्मन की एक गोली

ज़िक्र शहीदों का हो जब जब, उनमें क्यूं मेरा नाम ना आए।

देखो वीर जवानों अपने ख़ून पे ये इल्ज़ाम ना आए।”  

इस अंतरे में जहां तुकबंदी बेमिसाल है, वहीं एक लाचार आदमी भी देशभक्ति की भवाना को दिल में समाये निश्छल भाव से युद्ध में अपनी उपयोगिता सिद्ध कर रहा है। इसके साथ ही वो अपने गीतों में किरदार की सोच के साथ मज़ेदार उदाहरण भी देते थें। राजेश खन्ना फिल्म ‘दुश्मन’ के गीत ‘वादा तेरा वादा’ में एक ड्रायवर की भाषा शैली में नायिका की तारीफ़ करते हुए कह रहे हैं - तुम्हारी ज़ुल्फ़ या सड़क के मोड़ हैं ये ।

 

 

निर्देशकों के प्यारे गीतकार

फ़िल्म इंडस्ट्री में शक्ति सामंत, दुलाल गुहा, प्रमोद चक्रवर्ती जैसे वरिष्ठ नामों के साथ उस ज़माने के युवा निर्देशक सुभाष घई ने हमेशा अपनी फ़िल्मों के गीत बख़्शी साहब से ही लिखवाये। इतने निर्देशकों के प्रिय गीतकार होने की वजह ये थी कि वे निर्देशक से कहानी सुनने के बाद उसके रचे किरदारों की ज़बान से ऐसे गीत लिखते थें कि अन्य गीतकार फीके पड़ जाते थें। अपने प्रिय निर्देशकों में एक  सुभाष घई की ‘ख़लनायक’ के लिए ‘चोली के पीछे क्या है’ को लेकर उन्होंने काफ़ी नाराज़गी भी झेली लेकिन आज के गीत लेखन के सस्ते दौर में वो गीत कितना अर्थपूर्ण नज़र आता है। 

 

आदमी मुसाफ़िर है

कई दशकों तक वो फ़िल्मों के बेहद लोकप्रिय गीतकार रहें और शायद यही उनकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा पुरस्कार है। पर फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड की सूची देखते हैं तो लगता है उनके साथ थोड़ा अन्याय ही हुआ। उन्हें फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड के लिए संभवत: सबसे ज़्यादा 40 बार नामांकन मिला पर चार बार ही पुरस्कार मिल पाया। इन 36 नामांकनों में भी उनके बेहतरीन लोकप्रिय गीत थें। 

उन्होंने अपने गीतों को आवाम की बोलचाल के लहज़े में लिखा और लिखते रहें। आज बख़्शी साहब हमारे बीच में नहीं हैं पर उनके गीतों की सौगात हर दिन हमें प्रेरणा देती है। उनकी याद में दुलाल गुहा की धर्मेंद्र अभिनीत ‘दोस्त’ के गीत ‘गाड़ी बुला रही है’ की दो पक्तिंयाँ याद आती हैं, जिनमें छुपा जीवन का फ़लसफ़ा आज उनको ही समर्पित करता हूँ -

“आते हैं लोग, जाते हैं लोग, पानी के जैसे रेले

जाने के बाद आते हैं याद, गुज़रे हुए वो मेले।”

 

 

 

 

धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं।

   



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