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Old is Gold
गंगा-जमुनी तहज़ीब के गहरे हस्ताक्षर!


डॉ राही मासूम रज़ा (1 अगस्त 1927 - 15 मार्च 1992)

की पुण्यतिथि पर विशेष स्मरण! 

"मेरा नाम मुसलमानों जैसा है, मुझे क़त्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो। लेकिन मेरी नस-नस में गंगा का पानी दौड़ रहा है। मेरे लहू में से चुल्लू भरकर महादेव के मुंह पर फेंको। और उस जोगी से कह दो... महादेव अब इस गंगा को वापिस ले लो। ये ज़लील तुर्कों के बदन में गरम लहू बनके दौड़ रही है।" - डॉ राही मासूम रज़ा

यकीन नहीं होता कि ये शब्द एक मुसलमान ने लिखे हैं, पर यकीन तो उस समय वो लोग भी नहींं कर पा रहे थे जो बी आर चोपड़ा को ये कह रहे थे कि आप एक मुसलमान से महाभारत लिखवाने का दुस्साहस कर रहे हैं। लेकिन चोपड़ा साहब डॉ राही मासूम रज़ा के दिल में बसी हिंदू तबियत से वाकिफ़ थे। उन्होंने उन पर यकीन किया और महाभारत के रूप में हमें छोटे पर्दे पर एक हिंदू धर्म ग्रंथ एक मुसलमान की क़लम के नज़रिए से देखने को मिला।

गंगौली, गंगा और गाजीपुर 

1 सितंबर 1927 में गाजीपुर के गंगौली गांव में जन्मे डॉ राही मासूम रज़ा को बचपन से ही गंगा-जमुनी तहजीब के संस्कार मिले। कारण ये कि गंगौली में यूँ तो मंदिर काफी हैं पर वहीं मुस्लिम जुलाहों की एक बड़ी आबादी भी निवास करती है। डॉ साहब ने अपनी नज्म वसीयत में तो लिखा हैं कि "मेरी मौत के बाद मुझे गंगा की गोदी में सुला देना।" वो अपने गांव की मिट्टी से इस कदर जुड़े हुए थे कि बात कहीं की हो वे उसे घुमाते हुए उसमें उसमें गंगा, गंगौली और गाजीपुर को जोड़ ही देते थे। उनके अपने उपन्यास आधा गांव के अधिकतर किरदार उनके गंगौली गांव से ही निकले हुए हैं। 

अलीगढ़ यूनिवर्सिटि और रज़ा साहब

अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बाद वो जब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटि में पहुंचे तो वहां उनके चाहने वालों की तादाद बहुत ज्यादा थी। जवानी के दिनों में उनके चेहरे पर वो नूर छलकता था जो एक बारगी किसी को गौर से देखते ही को उनका बना देता था। इसके साथ ही उनकी विद्वता किसी को भी उनका होने जाने के लिए मजबूर कर देती थी। उनके दूर के रिश्तेदार में से एक मो. हसनैन के मुताबिक, यूनिवर्सिटि में मजाज के बाद वो सबसे लोकप्रिय शायरों में से रहे। लड़कियां उनकी तस्वीर तकिए के नीचे रखकर सोती थीं। अपनी शिक्षा पूरी होने के बाद उन्होंने वहां अध्यापन कार्य भी किया।

वो विचारों से प्रगतिशील थे लेकिन उन्होंने मार्क्सवादी सोच को अपनी गंगा-जमुनी तहजीब पर कभी हावी नहींं होने दिया। कुछ कारण ये भी रहा और कुछ सिनेमाई लोगों के बीच उठना बैठना, सो बाद में यूनिवर्सिंटि का माहौल उन्हें रास नहींंआया और उन्होंने मुंबई फिल्मी दुनियां की ओर रुख कर लिया।

मुंबई की राह और राही

चूँकि अदब की दुनियां में अलीगढ़ से ही उनका खूब नाम था इसलिए मुंबई में उनके कई लेखक दोस्त थे जिनमें धर्मवीर भारती, कमलेश्वर और भारत भूषण शामिल थे। धर्मवीर भारती धर्मयुग में उनसे खूब लिखवाते और एडवांस पारिश्रमिक देते। इसके साथ ही कमलेश्वर और भारत भूषण उन्हें निर्माता-निर्देशकों से मिलवाते। दरअसल, वो अलीगढ़ से भारत भूषण अभिनीत फिल्म मुशायरा लिखने के लिए मुंबई आए थे। लेकिन किसी कारण ये फिल्म नहींं बन पाई। बाद में उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में पहचान हरमेश मल्होत्रा निर्देशित फिल्म पत्थर और पायल से मिली।

इस कड़ी में भारत भूषण द्वारा बी आर चोपड़ा से करवाई गई मुलाकात उनके फिल्मी लेखन के जीवन में मील का पत्थर साबित हुई। इस बैनर के साथ उन्होंने महाभारत से पहले कई फिल्मों में बतौर लेखक काम किया। इसके साथ ही उन्होंने ऋषिकेश मुखर्जी के लिए मिली, आलाप, गोलमाल और सुभाई घई के लिए कर्ज जैसी हिट फिल्म लिखी। राज खोसला की मैं तुलसी तेरे आंगन की के लिए उन्हें बैस्ट डॉयलाग राइटर का फिल्मफेयर अवार्ड मिला।  

महाभारत और मासूम रज़ा

जो लोग फिल्मों के शौकीन नहीं हैं उनके लिए डॉ साहब का परिचय इतना ही काफी है कि उन्होंने महाभारत सीरियल की पटकथा और संवाद लिखे। लेकिन तत्कालीन परिस्थतियां ऐसी नहींं थी कि उन्हें हाथों-हाथ लिया गया हो। उस समय उनके लिए महाभारत लिखना एक चुनौती जैसा था पर स्वयं को गंगा का बेटा मानने वाले राही मासूम रज़ा ने महाभारत के प्रारंभिक एपीसोड्स में ही सबकी बोलती बंद कर दी। ना केवल किरदार बल्कि समय के रूम में पीछे से आने वाली हरीश भिमाणी की आवाज़ में आने वाले उनके संवादों का लोहा पूरे मनरंजन उद्योग ने माना। 

वैसे डॉ साहब फिल्मी दुनियां में बतौर संवाद लेखक खूब मकबूल हुए पर वो जो कहानी कहना चाहते थे उन पर लोगों की नज़र कम पड़ी । वो अपने आत्मकथ्यात्मक उपन्यास सीन नं 75 में लिखते हैं कि "मैं मुबई आ गया हूं पर मुझे मेरी बात कहने का रास्ता नहींं मिल रहा है, मुझे हारकर वहीं अंग्रेज़ी फिल्मों को हिंदी में बदलने की बात कहीं जा रही हैं । मैं वो पेट के लिए कर रहा हूं पर कब तक करता रहूँगा।" लेकिन महाभारत के बाद उन्हें बहुत संतुष्टि मिली क्योंकि इसमें वो इंसान मुखर हुआ जिसे वो बचपन से अपने जेहन में रमाए हुए हुए थे। 

शायराना तबियत और शायराना लिबास

सुप्रसिद्ध लेखक जावेद अख़्तर के मुताबिक, "लेखन के प्रारंभिक काल में डॉ साहब एक ऐसे शायर थे जिनका मैं मुरीद था। मैं स्कूल में पढ़ा करता था तो उनके हाथों से शायरी की बेंतबाजी में कई बार मुझे पुरस्कृत होने का अवसर मिला। बाद में वो मुंबई आ गए पर उन्होंने अपने कपड़े पहने का अंदाज शायराना रखा। फिल्मों में उन्होंने गीतकार के हैसियत से ना के बरावर काम किया है लेकिन मजरूह सुल्तानपुरी जैसे गीतकार उनके शायराना अंदाज की काफी कद्र किया करते थे। उन्होंने अपने पहनावे में हमेशा शायराना तबियत को छलकाए रखा। जब वो फिल्मों में बतौर संवाद लेखक फेमस हो गए तो बहुत से निर्माता-निर्देशक उनके पहनावे को बदलने के लिए कहा करते थे लेकिन उन्होंने अपने पहनावे को मरते दम तक नहीं बदला। उनके पहनावे में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटि ताजिंदगी रहीं।" बाद के दिनों में स्वयं जावेद अख़्तर राही साहब से मुतासिर हुए और खुद उन्होंने पेंट शर्ट छोड़ कुर्ता पायजामा का लखवनी अंदाज पकड़ा।  

साहित्य जगत में उनका योगदान

डॉ राही मासूम रज़ा का योगदान साहित्य जगत में भी कम नहीं रहा। उनके लिखे आधा गांव, टोपी शुक्ला, कटरा बी आरजू, दिल एक सादा काग़ज़ उपन्यास को अदबी जगत में खूब मकबूलियत मिली। उनके उपन्यास नीम का पेड़ पर धारावाहिक बना। वे अपने औपन्यासिक लेखन में गालियों के सिलसिले के बारे में कहते थे, "देखो भाई मैं अपना उपन्यास इसलिए नहींं लिखता कि उसे किसी अकादमी से पुरस्कार मिल जाए। मैं इसलिए लिखता हूं कि जिस किरदार को मैं कहना चाहता हूं वो वैसे ही कोरे काग़ज़ पर उतरे जैसा कि वो अपनी प्रकृति से है।"

उन्होंने इलाहाबाद के निकहत पब्लिेकेशन के लिए मशहूर रायटर इबने शफ़ी की तबियत बिगड़ने के बाद कई जासूसी उपन्यास शाहिद अख़्तर के नाम से घोस्ट-राइटर के रूप में लिखे। राही मासूम रज़ा ने अपनी आत्मकथा को छोटे आदमी की बड़ी कहानी के शीर्षक से लिखा। वो अपने लेखन से पूरी तरह मुतमईन थे। महाभारत के बाद उनका नाम इज्जत से हर हिंदू घर में लिया जाता रहा। वो लिखते लिखते ही 15 मार्च 1992 को चल बसे । आज वो हमारे बीच में नहींं हैं पर आज के युग की कथित राष्ट्रवादिता के बीच में उनके राष्ट्रवादी होने के मायने में वजन दिखता है। उनकी राष्ट्रवादिता जिसमें सर्वधर्म समभाव के दर्शन मिलते हैं। उनका लिखा ये शेर उनके इंसानियत से लबरेज मजहब को बयां करता प्रतीत होता है -

ज़ाहिद-ए-तंग नज़र ने मुझे काफ़िर जाना, और काफ़िर ये समझता है मुसलमां हूं मैं।   

- धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं।

(आगे पढ़ें, स्क्रीनराइटर्स असोसिएशन के संग्रह में से डॉ राही मासूम रज़ा पर एक विस्तृत आलेख!)    



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