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साहिर लुधियानवी (8 म












Amrita Pritam

Old is Gold
बागी तेवरों की तलवार साहिर लुधियानवी!


 

 

 

साहिर लुधियानवी (8 मार्च 1921- 25 अक्टूबर 1980) की 96वीं जयंती पर विशेष स्मरण! 

अदब में साहिर का नाम बड़े गर्व से लिया जाता है। इसका सबब सिर्फ उनके लिखे फिल्मी गीत ही नहींं हैं। इसकी एक खास वजह है कि उन्होंने अपने अल्फाजों में आवाम की आवाज को ढाला। शेरोशायरी उनके लिए सिर्फ पैसा कमाने का साधन नहींं थीं। वो अपनी शायरी में समाज के साथ खुद को व्यक्त करने का भाव रखते थे। उनके बागी तेवर और तरक्की पसंद सोच ने ना केवल उनके व्यक्तित्व को फिल्मी दुनियां में बतौर गीतकार मजबूत किया बल्कि उनके अल्फाज मजलूमों के संघर्ष के बीच संजीवनी बनके प्रकट हुए। फिल्मी गीतकार के रूप में भी उन्होंने कभी अपने करियर को लेकर समझौते नहींं किए उन्हें जो पसंद ना आया, उसे झेलने की बजाय उन्होंने उससे अलग हो जाना ठीक समझा

साहिर का बचपन और संघर्ष का साया  

पंजाब के लुघियाना में 8 मार्च 1921 को पैदा हुए साहिर का जन्म नाम अब्दुल हई था, जो बाद में शोरोशायरी के चलते साहिर लुघियानवी में तब्दील हो गया। कहने को तो वे एक रहीस खानदान में पैदा हुए पर उनके माता और पिता के बीच के अनबन ने ना केवल उन्हें बचपने में कोर्ट कचहरियों के चक्क र  लगवा दिए बल्कि पिता के साए से महरूम भी रखा। ताज्जुब की बात है पर हकीकत है कि उन्होंने अपने पिता के खिलाफ 13 साल की उम्र में कोर्ट में गवाही दी थी। वे बचपन से ही अपनी मां के बेहद करीब रहे इतने कि  मां के प्यार को बाद में भी कोई औरत स्थाई रूप से नहीं बांट पाई। अपनी शुरुआती पढाई उन्होंने लुघियाना में की । वे लुघियाना कॉलेज में पढे और वहीं से उनके जीवन में शायरी का प्रवेश हुआ पर अपने आसपास के माहौल को अपने मुफीद ना पाया तो वे 1943 में लाहौर जाकर बस गए। लाहौर पहुंचे तो यहां पर उनकी शायरी  का गुलाब खिल उठा और यहीं पर उनका पहला दीवान तल्खियां प्रकाशित हुआ। हालांकि इससे वे बहुत धनीमानी व्यक्ति तो नहींं बन पाए पर अदब की दुनियां में लोग उनका लोहा मानने लगे।

एक संवेदनशील शायर-संपादक

अपने लाहौर के दिनों में वे एक उर्दू पत्रिका साकी का संपादन किया करते थे। पत्रिका घाटे में चल रही थी फिर भी उनकी कोशिश रहा करती थी कि पत्रिका में छपने वाले लेखकों के लिए उनका मेहनताना दिया जाए। इस कड़ी में एक बार उन्होंने शायर शमां लाहौरी की दो गजल अपनी पत्रिका साकी में प्रकाशित की। सर्दियों के दिन थे सो ठिठुरते हुए एक दिन शमा लाहौरी अपने मेहनताने के लिए साकी के ऑफिस में आ धमके। उन्हें यूं अचानक देखके साहिर को उनसे कुछ जवाब ना देते बना क्योंकि साहिर के पास उन्हें देने के पैसे नहींं थे। लेकिन साहिर ने एक लेखक के दर्द को समझा और उन्हें पैसे देने की बजाय खूंटी पर टंगा एक नया कोट दे दिया जो उनको एक प्रशंसक ने कुछ दिन पहले ही उपहार स्वरूप दिया था। अपनी दो गजल के मेहनताने के रूप में ठंड से ठिठुरते शमां लाहौरी को मंहगा कोट मिल गया तो उनकी आंखे छलक आई वहीं संपादक साहिर ने यह जता दिया कि उनके दिल में अशआर को लेकर कितना आदरभाव और त्याग है।

 विस्थापन का दर्द 

 यूं तो उनके एक लाहौरी मित्र के मुताबिक साहिर लाहौर के दिनों से कहा करते थे कि वे फिल्मों के लिए एक बेहतर नगमनिगार साबित हो सकते हैं पर मंचीय व्यस्तताओं और उर्दू अदब की बेहतरी में लगे साहिर इस ओर कभी ध्यान नहींं दे पाते थे। लेकिन इसी दौरान देश विभाजन हो गया। वे लाहौर में टिके रहे लेकिन हालातों से मुंह मोड़ने वाले अखबारनवीसों में से साहिर नहींं थे। वे देश के हालातों को लेकर अखबार सवेरा में बड़े बड़े मजमून लिखते थे। इससे वे पाकिस्तान सरकार की आंखों की किरकिरी बनने लगे। उन्हें सरकार की तरफ से कई नोटिस मिले। जिससे उनका दिल पाकिस्तान से भर गया और वे अपने यार दोस्तों को बिना बताएं दिल्ली चले आए। उनहें दिल्ली भई रास नीहं ाई और वे कुछ महिने बाद ही फिल्मों में नगमनिगार बनने के सपने को लेकर सपनों के नगर मुंबई आ गए।

यार-दोस्त और मुंबई में शुरूआत

1949 में शायर मुंबई आ गए । यहां पर उनके दोस्त मजाज लखनवी थे और दौनों दोस्तों ने साथ में संघर्ष शुरू कर दिया। वे एक निर्माता के दफतर में रोज जाकर बैठते थे लेकिन निर्माता उनसे मिलता ही नहींं था।  इसी संघर्ष की उधेड़बुन में मजाज लखनऊ लौट गए पर शायर को खुद पर विश्वास था इसलिए वे मुंबई में टिके रहे और एक दिन रोज रोज आने वाले साहिर पर निर्माता का दिल पसीज गया।  उन्हें पहली बार 1949 में ही फिल्म आजादी की राह के लिए बदल रही है जिंदगी गीत लिखने का अवसर मिला।

इन्ही दिनों दिनों में संगीतकार सचिनदेव वर्मन भी एक अच्छे गीतकार की तलाश में थे। सो उन्होंने मुंबई के अदीबों की महफिल के बीच एक मुखड़े की धुन पर शब्द लिखने को कहा , सभी ने मुखड़े लिखे पर वर्मन दा को साहिर के बोल भा गए और उन्हें उनके साथ फिल्म नौजवान में काम करने को मिला। 1951 में रिलीज हुई नौजवान और बाजी के गीत बेहद मकबूल हुए। इसके बाद तो सचिन देव वर्मन और साहिर की जोड़ी ने धूम मचा दी। लेकिन इस जोड़ी को भी जल्द ही नजर लग गई क्योंकि साहिर का मानना था कि उनकी बेहतरीन शायरी से गीत लोगों की जुबान पर चढ़े, इधर वर्मन दा की सोच थी कि उनकी मैलोडी संगीतप्रेमियों को आकर्षित करती है। बहरहाल प्यासा के बाद दौनों अलग हो गए।

निर्माताओं के गीतकार 

 फिल्मी गीतकारों के बीच साहिर एक ऐसा नाम थे जो किसी संगीतकार के पीछे चलने वाले गीतकारों में से नहींं थे। उनके पास फिल्म की कहानी के साथ कई निर्माता सीधे आते थे। बीर आर चौपड़ा के तो वे परमानेंट गीतकार थे जब तक जिंदा रहे उन्होंने ही बी आर  फिल्मस के लिए गीत लिखे ।

संगीतकार के रूप में रवि ने साहिर के गीतों को अपनी पुरकशिश धुनों से नवाजा। लंबे समय तक साहिर और रवि की जोड़ी जमी रही। क्योंकि रवि जूनियर थे इसलिए वे साहिर साहब की तबियत के मुताबिक काम करते थे। इसके अलावा उन्होंने अपने हिट गीत रौशन, खय्याम और एन दत्ता के साथ दिए। उनकी कुछ नज्मों को भी गीत की शक्ल में पेश किया गया जिनमें चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दौनों (हमराज), कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है प्रमुख रहीं। साहिर जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा (ताजमहल) और कभी कभी मेरे दिल में (कभी कभी) के लिए उन्हें बेस्ट लिरिक्स का फिल्म फेयर अवार्ड मिला।

भीड़ के बीच अकेले

यूं तो जवानी से ही वे अदबी जगत में काफी लोकप्रिय रहे पर फिर भी इस भीड़ के बीच अकेले थे । परिवार के रूप में इस दुनियां में मां के अलावा उनका कोई नहीं था। अमृता प्रीतम के साथ उनके रिश्ते को लेकर बहुत कुछ लिखा और कहा जा चुका है, अपनी आत्मकथा रसीदी टिकिट में अमृता ने लिखा है कि वे अपने पति से अलग होकर हमेशा के लिए साहिर की बनना चाहती भई थीं लेकिन ब्लिटज में छपे एक मजमून ने सारा मामला चौपट कर दिया। ्मृता के बाद  साहिर की जिंदगी में आईं गायिका सुधा मल्होत्रा को उनहोंने कई बड़े अवसर प्रदान करवाए। लेकिन ये प्रेम बेल भी लंबी ना चढ पाई। 1960 में सुधा मल्होत्रा की शादी के बाद उनके घर बसाने की आशा क्षीण हो गई। उनकी मां के निधन के बाद वे अकेले पड़ गए।

बकौल निदा फाजली,अपनी मां को मौत के बाद भावनात्मक रूप से वे काफी अकेले पड़ चुके थे। लेकिन गीतकार लॉबी के बीच उनका दबदबा हमेशा रहा क्योंकि प्रगतिशील लेखक संघ के जरिए लेखक गीतकारों के हक की लड़ाई में सर्वदा आगे रहे इस वजह से निर्माताओं के साथ उनके संबधों में तल्खियां भी आईं। वे अपने अंतिम दिनों में भी अपने पसंदीदा निर्माताओं के लिए लिख रहे थे पर 25 दिसंबर 1980 को हार्ट अटैक के कारण जहाने फानी से रुखसत कर गए। उनके लिखे अलफाजों के साथ अनेक शक्ल आज भी वो हमारे बीच मौजूद हैं। क्योंकि उस दौर में उनकी कलम से निकले नगमे विविधरंगी थे। इनमें इश्क की मखमली नफासत है तो कहीं पर विद्रोह, कहीं पर आस्था है तो कहीं पर विश्वास .. .. ..

इन काली सदियों के सर से जब रात का आंचल ढलकेगा

जब दुख के बादल पिघलेंगे,जब सुख का सागर छलकेगा।

जब अंबर झूमके नाचेगा, जब धरती नगमे गाएगी ... वो सुबह कभी तो आएगी।

 

- धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं।

 

 



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