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Happy Birthday


Dharmendra Upadhyay

Old is Gold
Happy Birthday Ji!

Happy Birthday Raj Kapoor

रहेंगे यहीं अपने निशां

हिंदी सिने प्रेमियों के लाडले राज कपूर स्वयं एक किवदंती बन चुके हैं। उनपर बहुत कुछ लिखा जा चुका है।  फिर भी उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के अध्ययन के बाद में मुझे उनमें सबसे बड़ा गुण नजर आता हैं तो उनका एक अच्छा इंसान होना। उनके निभाए अधिकतर किरदारों में सीधापन और नेक खयाली रही है। ।  उनकी अधिकतर फिल्में हमेशा अच्छा इंसान बनने के लिए प्रेरित करती हैं। उनके किरदार मानो कहते हैं कि हम अच्छे इंसान बनकर रहें, एक दूसरे से प्रेम करने के तत्व हममें मौजूद रहें, ऐसा प्रेम जो स्वार्थ और घृणा से दूर हो।

Characters

उन्होंने अपनी फिल्मो में विभिन्न किरदारों के जरिए प्रेम को केंद्र में रखा है। वो ताजिंदगी एक श्रेष्ठ नेतृत्वकर्ता रहे आज उनकी जयंती पर उनके जीवन की कुछ बातें जो हिन्दी सिनेमा में उन्हें श्रेष्ठ नेतृत्वकर्ता बनाती हैं।

रिश्ता लताजी और राजकपूर का 

 ये बात दुनियां जानती हैं कि राज कपूर लता को अपनी बहिन मानते थे लेकिन इस रिश्ते की शुरुआत लता जी की वफदारी के साथ हुई थी। दरअसल राज कपूर की पहली फिल्म आग के संगीतकार राम गांगुली थे और उनकी अगली फिल्म  बरसात के संगीतकार भी वो ही थे, राजकपूर को बरसात की कहानी मिल गई थी और वे इसे बनाने की जद्दोजहद में थे।  लेकिन इसी दौरान राम गांगुली ने राज कपूर की अगली फिल्म के लिए बनाई धुन को लता मंगेशकर से किसी औैर बड़े निर्माता को सुनवा दिया। लता जी ने ये बात राज कपूर को  बताई तो राज कपूर को ये बात नागवार गुजरी और उन्होंने राम गांगुली को अपनी फिल्म से हटाकर ,आग में गांगुली के सहायक रहे शंकर रघुवंशी औेर जयकिशन पांचाल को बतौर संगीतकार बरसात के लिए चुना।  और लता जी से तो उनका भाई बहिन का रिश्ता बन गया।

With Lataji

असली फन के शैदाई

 राज कपूर स्वयं बेहद प्रतिभावान थे लेकिन उनकी सबसे बड़ी बात थी कि वे दूसरों की कला को बेहद आदर देते थे।  उनकी अपनी फिल्मों में संगीतकार के रूप में शंकर जयकशिन हुआ करते थे और अपनी अभिनीत फिल्मों में भी अधिकतर संगीतकार के रूप में शंकर जयकिशन को ही रखते थे।

एक बार वे निर्माता निर्देशक रमेश सहगल के साथ एक फिल्म फिर सुबह होगी की कहानी उन्हें अच्छी लगी।

 उन्होंने कहा, संगीकार?

 तो रमेश सहगल ने खय्याम साहब का नाम बताया। उन्होंने शाम को ही  खय्याम साहब के साथ संगीत को लेकर मीटिंग की बात कर दी। जब रमेश सहगल  ने संगीतकार खय्याम को बताया तो खय्याम को एक झटका लगा कि कहीं राज कपूर का कहानी से ज्यादा जुड़ना उनको इस फिल्म से बाहर ना निकलवादे ।

विविध भारती से हुई लंबी बातचीत में खय्याम साहब ने बताया, शाम को सहगल साहब और राज कपूर मेरे सिटिंग रूम में तशरीफ लाए तो मैं थोड़ा नर्वस था पर मैंने खुदा का नाम लेकर शीर्षक गीत वो सुबह कभी तो आएगी सुनाया। राज कपूर एक स्थाई और अंतरा सुनकर अचानक कमरे से बाहर निकल गए उनके पीछे पीछे रमेश सहगल मुझे लगा कि धुन शायद राजकपूर को अच्छी नहीं लगीं। मैंने बाहर आकर देखा तो वे जा रहे थे । मैं घबरा गया लेकिन जब रमेश सहगल ने मुझे आकर अगली फिल्म के संगीतकार होने के लिए बधाई दी तो सांस में सांस आई। रमेश सहगल ने मुझे बताया कि राज साहब कह रहे कि मैंने काफी समय से ऐसा गीत- संगीत नहीं सुना है जिसने मेरे अंदर एक उत्साह और आशा जगाई हो। खय्याम साहब ही इस फिल्म का संगीत तैयार करेगे। मैं शर्मिंदां हूं कि मैं इस फिल्म के लिए उनके संगीत को परखने आया। 

अजब थी उनकी नायिकाओं की प्रस्तुति   

वे अपनी नायिकाओं के साथ गहराई से जुड़े रहे लेकिन उन्होंने इसे अपने सिनेमा के लिए ताकत बनाकर कर उभारा। कई बार वे अपनी पत्नी से कहा करते थे कि तुम मेरे बच्चों की मां हो तो वो हीरोइंस भी मेरी फिल्मों की मां हैं। वो राजकपूर ही थे जिन्होने जीनत अमान जैसी अंग्रेजीदा कलाकार को गांव की भोली भाली लड़की के रूप में इस तरह प्रस्तुत किया कि दर्शकों ने दांतों तले उंगली दबा ली। नरगिस से लेकर वैजयंती माला, जीनत अमान, डिंपल कपाड़िया, पदमिनी या मंदाकिनी सभी को उनकी फिल्मों से एक नया मुकाम मिला।

With Actresses

सिनेमा में अथाह विश्वास

राजकपूर की सबसे बड़ी ताकत थी कि उन्हें सिनेमा में अथाह विश्वास था। जब जब वे असफल हुए उन्होंने अपनी अगली फिल्म में बेहतरीन सफलता पाई।  उनकी सिनेमा में आस्था अटूट थी। जब बतौर निर्माता निर्देशक उनकी पहली फिल्म आग बुरी तरह फलाप हुई तो उनके पास दूसरी फिल्म के लिए नरगिस को अनुबंधित करनेके पैसे नहीं थे । नरगिस को अनुबंध करने के लिए लाई गई पचपन हजार रुपए की राशि उनकी नवौढा पत्नी कृष्णा के जेवर गिरवी रखके आई थी। लेकिन उन्होंने अपनी अगली फिल्म बरसात से बड़ी सफलता रचकर सबको चकित कर दिया।

दूसरी बार फिर जब मेरा नाम जोकर से उन्होंन बड़ी असफलता झेली। हिंदी सिनेमा से जुड़े कई लोगों उन्हें चुका हुआ व्यक्ति मान लिया लेकिन वे अपनी अगली फिल्म बॉबी के साथ ही पुरजोर तरीके से दर्शकों के समक्ष आए और उन्होंने उसी अबोध प्रेम को मान्यता दिलवा दी जिसे दर्शकों ने मेरा नाम जोकर में मानने से स्पष्ट इंकार कर दिया।

वे सिनेमा के सच्चे कर्मवीर थे, वो हमेशा चाहते थे कि अंतिम समय तक वो काम करते रहें और ऐसा हुआ भी राजकपूर नामक इस हिंदी सिनेमा के सेवक को सिनेमा ने ठुकराया नहीं। वें अंतिम दिनों में भी अपनी अगली फिल्म हिना की तैयारियों में जुटे हुए थे ।

 

 

Dharmendra Upadhyay

पिछले  आठ साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं।



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