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श्री विजयदान देथा


श्री मणि कौल निर्द



श्री प्रकाश झा निर


श्री अमोल पालेकर न


श्री धर्मेन्द्र उप

Old is Gold
श्री विजयदान देथा जी

पुण्यतिथि पर श्रधांजलि

मिटती नहीं पिताजी की परछाईयां- महेंद्र देथा 

जन्म: सितम्बर 1, 1926

मृत्यु: नवंबर 10, 2013, Rajasthan

एक बेटा कभी ये बता नहीं सकता कि वो अपने पिता के कितना करीब है। ये बात तो गांव देहात में लोग बताते हैं। क्योंकि हर बेटे के व्यक्तित्व में उसके पिता स्वयं ही ध्वनित होते है। यह कहना है राजस्थान के यशस्वी कथाकार श्री विजयदान देथा जी के सुपुत्र महेंद्र देथा का। पिछले दिनों राजस्थान में स्क्रीन रायटर एसोसिएशन से हुई बातचीत में उन्होंने अपने पिता के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला।  पेश है धर्मेन्द्र उपाध्याय की उनसे हुई बातचीत के अंश

सादा जीवन उच्च विचार

उनका जीवन सादगी से परिपूर्ण रहा, सुबह जल्द उठ जाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। वो अभावों से जूझते हुए भी अपने लेखन को पुष्ट बनाए रखते थे । उनकी लोकप्रियता की शुरुआती दिनों में उनके पास काफी काम रहता था। लेकिन ग्रामीण जीवन उनकी इस व्यस्तता में खलल डालता था जब वो बिजली के चले जाने से थोड़े परेशान हो उठते थे लेकिन लैंप के प्रकाश में भी वो लिखते थे।  सुबह अखबार पढना उनकी दिनचर्या में शामिल था। जब वो अपने जीवन की संध्या में रोज अखबार पढने में नाकाबिल हुए तो मैं रोज सुबह उन्हें अखबार से खबरें पढाकर सुनाया करता था। 

नहीं छोड़ा राजस्थानी मिट्टी का दामन

लोग उन्हें राजस्थानी की मिट्टी का कथाकार कहकर संबोधित करते हैं तो अच्छा लगता है लेकिन कई बार सोचता हूं कि इसके लिए उन्होंने कम कुर्बानी भी नहीं दी है।  कई बार विदेशों के ऑफर उन्होंने ठुकरा दिए क्योंकि वो अपनी बोरूंदा गांव की मिट्टी से नहीं कटना चाहते थे। वो जीवन पर्यंत अपने गांव में ही रहे और शहर उनकी चौखट पर मंडराता रहा। वो गांव से कभी नहीं कटे इसलिए उनके किरदारों में राजस्थानी संस्कृति के गहरे रंग नजर आते थे।   

सिनेमा और उनका सिनेमाई लेखन 

वैसे बाहरी तौर पर उनके लेखन में कोई सिनेमाई सरोकार नहीं था। लेकिन सिनेमा में उनके कंटेटे की चर्चा हुई जब फिल्मकार मणिकौल ने उनकी कहानी पर फिल्म दुविधा बनाई। मणिकौल उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानते थे।  प्रकाश झा की परिणति से भी देथाजी की सिने जगत में पहचान बढ़ी। इसके बाद काफी समय तक उनकी कहानी पर कोई फिल्म नहीं बनी। 

बाद में जब अमोल पालेकर ने उनकी दुविधा को ही एक बार पहेली के नाम से सिनेमा में कहने की ठानी तो वे बड़ी स्टारकास्ट की वजह से इस फिल्म की सफलता और लोकप्रियता को लेकर वे आश्वस्त थे। इस फिल्म की खूब चर्चा भी हुई पर इसे बड़ी सफलता ना मिली। हालांकि वो सिनेमा के शैदाई नहीं थे पर वे इस माध्यम की कद्र तो करते ही थे।

इरफान ने नहीं निभाया वादा 

जयपुर के अभिनेता इरफान उनके कद्रदानों में से एक रहे। अपने जयपुर प्रवास के दौरान कई बार इरफान उनसे मिलने बोरूंदा आते थे । वो घंटों उनसे साहित्य और उनकी कहानियों पर चर्चा करते थे। उस दौरान वो कहा करते थे कि मुझे उनकी जो कहानियां बेहद पसंद हैं, उनमें से एक पर मैं फिल्म जरूर बनाऊंगा। लेकिन पिताजी की मृत्यु के बाद उनकी कहानी पर बनी फिल्म किस्सा को देखकर मैं हैरान हुआ। निर्देशक अनूप सिंह ने राजस्थानी कहानी को पंजाब में सेट कर दिया गया और उन्हें फिल्म में भी कोई श्रेय नहीं दिया गया।  

पांरपरिकता को सहेजा

 महेंद्र देथा के मुताबिक, बहुत से आलोचक चाहे उनके साहित्य पर पांरपरिकता की छाप मानते हों लेकिन उन्होंने इस आलोचना को ही अपनी शक्ति बनाकर प्रस्तुत किया। कितने लोग हैं जो परंपराओं को अपने साथ लेकर चलते हैं। उन्होंने पुरानेपन की जमीन पर ही अपनी एक नई दुनियां रची। जो हर किसी लेखक के जीवट की बात नहीं हो सकती है। उनकी लोकप्रियता विदेशों तक थी। विदेशों से उनसे मिलने लोग आते थे तो मैं देखता था कि उनके चेहरे पर एक संतुष्टि के भाव हेते थे।  ऐसे में उन्हें खुद पर गर्व होता था कि दूर दूर से लोग उनके गांव उनसे मिलने आते हैं।

वो आज भी हमारे साथ हैं

 November 10, 2013 को उनका देहांत हो गया। लेकिन मुझे एसा नहीं लगता कि वो आज हमारे बीच में नहीं हैं । जिस स्थान पर वो बैठकर लिखा करते थे जब मैं उस जगह पर नजर डालता हूं तो एसा लगता है कि वो वहीं पर बैंठे हैं। उनकी परछाईंया साहित्य जगत से दशकों तक मिटने वाली नहीं हैं ।  

 

-- धर्मेन्द्र उपाध्याय

पिछले  आठ साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं।

 



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