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शकील बदायुनी

Old is Gold
शकील बदायूंनी

फिल्म संगीत का चमकता चांद

          मैं शकील दिल का हूं तर्जुमा,

          कि मोहब्बतों का हूं राजदा

          मुझे फख्र है मेरी शायरी,

          मेरी जिंदगी से जुदा नहीं।

हिंदी सिनेमा के तमाम गीतकारों के बीच गीतकार शकील बदायूंनी का नाम चांद की तरह चमकता है। यूं तो उन्होंने हिंदी फिल्मों में कई बड़े हिट गीत दिए पर गुरुदत्त फिल्मस की चौदहवी का चांद के लिए लिखा गया उनका शीर्षक गीत चौदहवी का चांद हो, कई दशकों के बाद आज भी नई पीढ़ी के बीच लोकप्रिय है। संगीतकार नौशाद के साथ उनके हिट गीतों की लंबी फेहरिश्त है वहीं संगीतकार हेमंत कुमार और संगीतकार रवि के साथ उनकी गीतों की जुगलबंदी को भला कौन भुला सकता है।

बचपन और शेरोशायरी का रुझान

गीतकार शकील बदायूनीं का जन्म ३ अगस्त 1916 को उत्तरप्रदेश के बदायूँ जिले में हुआ। उनके वालिद अहमद जमाल शौखता कादरी उन्हें उर्दू, अरबी की तालीम दिलाकार कुछ और ही बनाना चाहते थे। बचपन में उनका रुझान भी अच्छी कौमी तालीम पर ही था लेकिन जैसे जैसे वो बड़े हुए उनके दिल में शेरो शायरी का फन पैदा होने लगा। उनके घर परिवार में तो कोई शेरो शायरी से नहीं जुड़ा था पर उनके दूर के रिश्तेदार जिया उल कादरी बदायूँनी का असर उन पर होने लगा।

1936 में उन्होंने अलीगढ़ मस्लिम विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया। यहां पर उर्दू के जानकार शायरों की सोहबत मिली तो अपने अंदर छुपे शायर को समझने की ताकत शकील के अंदर जाग गई और उन्होंने बाकायदा हकीम अब्दुल अश्क बिजनौरी को अपना गुरु बनाया। उनसे शेरोशायरी के फन को अपने अंदर रमा किया। अलीगढ़ कॉलेज में तीन साल शेरोशायरी के रंग जमे और वे अपनी पढाई पूरी करने के बाद दिल्ली आ गए। यहां पर वे एक कंपनी से बतौर सप्लायर जुड़ गए। दिन में वे कंपनी का काम करते और रात को दिल्ली और आसपास के मुशायरों में अपने फन को धार देते। इस दौरान उनका प्रभाव दिल्ली के अदबी दुनियां में खासा जमने लगा तो वे 1944 में अपना बोरिया बिस्तर समेट कर मुंबई चले आए।

नौशाद और शकील की जुगलवंदी

मुंबई आकर वे निर्माता ए आर कारदार से मिले । कारदार साहब ने उन्हें नौशाद से मिलाया। नौशाद उन दिनों फिल्म ‘दर्द’ के संगीत में जुटे हुए थे। उन्होंने उसी समय एक संगीत का टुकड़ा सुनाया और उस पर लिखने को कहा तो शकील ने तरंत उस टुकड़े पर गीत का मुखड़ा लिखा दिया। नौशाद उनसे ऐसे प्रभावित हुए कि उन्होंने उसी समय शकील को अपनी फिल्म ‘दर्द’ के लिए बतौर गीतकार साइन कर लिया। दर्द में लिखे उनके गीत खूब मकबूल हुए । इसके बाद दीदार, मदर इंडिया, बैजू बाबरा, मुगले आजम आदि फिल्मों के गीतों ने उन्हें इंडस्ट्री के चोटी के गीतकारों में लाकर खड़ा कर दिया। नौशाद और शकील की जोड़ी के गीत संगीत पर अमल करें तो हम पाते हैं कि दोनों ने मिलकर उत्तर-प्रदेश के लोक गीत- संगीत को फिल्म संगीत में बड़े शानादार तरीके से पिरोया है। संगीतकार नौशादा से उनका सिर्फ काम का ही नहीं बल्कि एक रुहानी रिश्ता था। एक बार जब शकीली को टीबी की बामारी हो गई तो उनकी पेसे की जरूरूत को देखते हुए संगीतकार नौशाद ने बतौर गीतकार उनको तीन फिल्म साइन करवाई और तिगुना  मेहनताना भी दिलवाया।

एक जिंदादिल इंसान

 वे जितने अच्छे गीतकार थे उससे कही ज्यादा वे एक  जिंदादिल इंसान के रूप में अपने दोस्तों के बीच पहचाने जाते थे। गीतों के अलावा उन्हें बैडमिंटन और पतंगबाजी का खासा शौक था। वे काम से थोड़ी राहत मिलने पर अपने दोस्तों दिलीप कुमार, नौशाद, जॉनी वाकार और लेखक वजाहत मिर्जा के साथ पतंगबाजी किया करते थे।

फिल्मफ्फेयर की हैट्रिक

 शकील बदायूँनी के गीतों की लोकप्रियता का आलम ये था कि उन्हें लगातार तीन साल तक फिल्म फेयर अवार्ड से नावाजा गया। नौशाद के बाद उनके गीतों को अपने संगीत से सजाया संगीतकार रवि और हेमंत कुमार ने । इस कड़ी में 1961 में चौदहवीं का चांद हों, 1962 में हुस्न वाले तेरा जवाब नहीं , 1963 में कहीं दीप जले कहीं दिल इन गीतों के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। 

जल्दी साथ छोड़ा जिंदगी ने

बकौल संगीतकार रवि; शकील साहब अपने फन में माहिर इंसान थे अगर वो कुछ साल और जिंदा रहते तो और भी कई हसीन गीती हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को देकर जाते लेकिन जिंदगी ने उनका साथ जल्द छोड़ दिया।  वे अपने स्वास्थ्य के प्रति थोड़े लापरवाह होकर अपने गीतों के मुखड़े अंतरे सजाने में लगे रहे और अंदर ही अंदर उन्हें टीबी की बीमारी ने खोखला कर दिया। 1963 के बाद भी उनके पास खूब काम था । जिन संगीतकारों के साथ वो काम कर रहे थे उनके अलावा नए संगीतकार भी उनसे अपने गीत लिखवाना चाहते थे। लेकिन उनकी गिरती सेहत के साथ मात्र 53 वर्ष की उम्र में वे जहाने फानी से रुखसत कर गए। उनकी मौत के बाद उनके नाम से उनके मित्र फिरोज रंगूनवाला ने एक ट्र्स्ट भी स्थापित किया जिसे नाम दिया गया यादे-शकील। कुछ समय तक इस ट्र्स्ट के जरिए उन्हें गाहे बगाहे याद भी किया गया। शकील बदायूँनी इस दुनिया से चले गए पर वे अपने गीतों के साथ हमेशा हमारे जेहन में हमेशा मौजदू रहेंगे।   

 

धर्मेंद्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं।



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