1
 


प्यासा फ़िल्म गुरु

Old is Gold
गुरु दत्त

जन्मदिन विशेष

                   ये दुनियां अगर मिल भी जाए तो क्या है.. ..

                     प्यार का प्यासा फिल्मगुरु - गुरुदत्त

उस्ताद गुरु

फिल्मकार गुरुदत्त का कुछ वर्षों में ही बेहतरीन सिनेमा बनाकर यूं रजतपट से ओझल हो जाना हर रसिक सिनेप्रेमी को अखरता है।  उनकी बात चले तो हर किसी के मुहं से यकबयक निकल पड़ता है कि  गुरुदत्त ने और दो दशक का जीवन जिया होता तो निस्संदेह उन्होंने कुछ बेहतरीन फिल्में हिंदी सिनेमा के लिए बनाई होती। लोग उनके सिनेमाई नैराश्य को खूब बहुत पसंद करते हैं । पर वर्षों से उनकी फिल्म प्यासा को लेकर हॉलीवुड के सामने भी कॉलर ऊंची करने वाले हिंदी सिनेमा के लोगों ने कभी उनकी जिंदगी और सिनेमा पर उनके प्रभाव को लेकर बहुत ज्यादा बात नहीं की। समीक्षकों ने उन्हे तन्हाई के फिल्मकार के तमगे से नवाजा पर किसी को पता ना चला कि कब तन्हाई ने उन्हें अपने अंदर समेट लिया। ये तन्हाई उन्हें मां के पेट से नहींं मिली थी पर जिंदगी के झँझावातों से लड़ते हुए उन्होंने बेचैनी को अपना मुकद्दर मान लिया।

गुरुदत्त का बचपन

गुरुदत्त का जन्म कर्नाटकीय पादुकोंण ब्राह्मण परिवार में 9 जुलाई 1925 को बंगलोर में हुआ। अपने छोटे भाई बहिनों के साथ एक छोटे से घर में बड़े हुए गुरुदत्त के बचपन में ही  उनकी मां वासंती पादुकोण ने कला संस्कृति का बीज उनके मन में बो दिया था। लेकनि घर में उनके पिता और मां के बीच होने वाली कलह ने बचपन में ही उनके जीवन में एक खास तरह की खामोशी भर दी थी। उनकी छोटी बहिन चित्रकार ललिता लाजमी एक साक्षात्कार में बताती हैं कि वो बचपन से ही पारिवारिक गहमा गहमी से बाहर निकल कर एकांत में बैठ जाया करते थे। जब सब कुछ शांत हो जाता हम उन्हें ढूढकर घर लौटा लाया करते थे। शायद इसीलिए वो घर से जल्दी कूच कर जाना चाहते थे। 

बचपन से ही डांस में बेहद रुझान रखने वाले गुरुदत्त ने उदय शंकर की अल्मोड़ा अकादमी में दाखिला मिल गया।  लेकिन इसके लिए उन्होंने जी तोड़ कोशिशि की, कई दिनों के अथक प्रयास के बाद उन्होंने अपने नाग नृत्य से उदयशंकर को प्रभावित कर लिया और वे अल्मोड़ा चले गए।

प्रेम के असफलताएं और सिनेमा

प्रेम से मिली निराशाओं ने जहां उनको व्यक्तिगत जीवन में तोड़ा वहीं उनहोंने इस टूटन से ही अपने सिनेमा को संवारा । अल्मोड़ा से निकलकर जब वे पुणे की प्रभात फिल्म कंपनी में नृत्य निर्देशक विश्राम वेडेकर के सहायक थे तब उन्हें उस जमाने की सबसे बड़ी फिल्म मैगजीन फिल्म इंडिया के संपादक बाबू राव की साली से प्यार हो गया। लेकिन गुरुदत्त की मुफलिसी की वजह से ये प्रेम बेल मुंडेर नहीं चढ़ पाई। बाद में गुरुदत्त की प्यासा में माला सिन्हा का किरदार अपने इस प्रेम से प्रभावित रखा। इसके बाद वे मुंबई आ गए। यहां पर अपनी पहली ही फिल्म बाज़ी की पार्श्वगायिका गीता रॉय से प्रेम कर बैठे। यहां गुरुदत्त को सहारा तो मिला पर इस रिश्ते में पैदा हुई अना ने गुरुदत्त को कहीं का ना छोड़ा। दरअसल गुरुदत्त की आर्थिक परिस्थितियां बाजी के बाद भी ज्यादा ठीक नहीं थी बहिन भाइयों के खर्चे और पारिवारिक दबाब में गुरुदत्त पिस रहे थे। उनकी बाजी से प्रभावित गीता बाली की बड़ी बहिन हरिदर्शन कौर उनके पास आई और दोंनों ने मिलकर बाज़ फिल्म प्रोड्यूस की। लेकिन फंतासी फिल्म बाज भी पिट गई थी। गुरदत्त एक फलॉप निर्माता निर्देशक साबित हो चुके थे। इस दौरान एक समय एसा भी आया कि घर की पूरी आर्थिक जिममेदारी गीता को लेनी पड़ी थी।  गुरुदत्त की इस कमतरी ने गीता के साथ उनके रिश्ते के प्रारंभिक चरण में ही कमजोर कर दिया। हालांकि  इसके बाद उनकी अगली फिल्म आरपार की बेहतरीन सफलता ने गुरदत्त के जीवन में आर्थिक उन्नयन ला दिया इसके बाद मिस्टर एंड मिसेज पचपन और सी आई डी ने तो उन्हें बतौर निर्माता स्थापित कर दिया। लेकिन इसी दौरान हैदराबाद से मुंबई आई वहीदा ने गुरदत्त और गीता के अहम की आग में जल रहे इस रिश्ते को और कमजोर कर दिया।  कागज़ के फूल की शुरुआती कहानी के मुताबिक इस फिल्म के माध्यम से गुरुदत्त निर्देशक सुरेश सिन्हा के रूप में अपने गुरू ज्ञान मुखर्जी के सिनेमाई चरम और फिल्म इंडस्ट्री से उनके कट जाने की कहानी को कहना चाहते थे लेकिन रिश्तों के भावनात्मक जंजाल में फंसे गुरुदत्त ने इसे अपने वर्तमान के इर्द गिर्द रच दिया। उनकी महत्वाकांक्षी फिल्म कागज के फूल की असफलता ने उन्हें तोड़ जरूर था पर वे आर्थिक रूप से कमजोर नहीं हुए थे।  कुछ समय बाद रिलीज हुई उनकी अगली फिल्म चौदहवीं का चांद ने गुरदत्त फिल्मस में फिर से बहार ला दी थी। अपनी पत्नी से टूटते रिश्तों के साथ वे खुद को संभालना चाहते थे। उनके लेखक अबरार अल्वी के मुताबिक, जॉनी वॉकर को बीच में रखकर उन्होंने वहीदा रहमान से शादी का प्रस्ताव उनके घर भेजा था पर वहीदा के जीजाजी को ये बात बिल्कुल बर्दास्त नहीं थी। 

अंतिम दिनों की टूटन

सिनेप्रेमी जानते हैं कि अपने अंतिम दिनों में गुरदत्त बिल्कुल अकेले थे। वे खार के एक फलैट में रहा करते थे जहां पर इब्राहीम नामक नौकर उनके खानपान का ध्यान रखता था। लेखक अबरार अल्वी के मुताबिक, वे उन दिनों के एल सहगल अभिनीत फिल्म प्रेसीडेंट को अपने हिसाब से कहने की तैयारी कर रहे थे। मैं उनकी अंतिम रात की शाम से ही उनके साथ था । 10 अक्टूबर 1963 की रात वे बड़े बेचैन थे और बार बार अपनी पत्नी को फोन मिला रहे थे। वो चाहते थे कि अपनी बेटी से मिलना चाहते थे पर उनकी पत्नी गीता उन्हें मिलने नहींं दे रही थी। इस बात को लेकर ही दौनों में तीखी बहस हुई और गुरुदत्त ने यहां तक कह दिया कि वो उनका मरा हुआ मुख देखेंगी और सुबह एसा ही हुआ जब गीता ने गुरुदत्त के घर पर फोन लगाकर उनके देर तक सोने की बात को लेकर नौकर को उन्हें  जगाने के लिए कहा तो वे मृत पाए गए।  

इधर गुरुदत्त से शादी की बात को लेकर जीजा की खिलाफत और दो कौमों के बीच उबाल आने की वजह से वहीदा भी गुरुदत्त से किनारा करने लगी थीं।   फिल्म पत्रकार विनय छिब्बर के मुताबिक, साहिब बीबी और गुलाम के बाद वहीदा की व्यस्तताएं ज्यादा बढ गईं थीं। वे उन दिनों सुनील दत्त के साथ मुझे जीने दो की शूटिंग कर रही थीं। जब भी गुरुदत्त वहीदा को फोन मिलाते तो उन्हें जवाब मिलता कि मैडम शूटिंग करने के लिए चंबल गई हैं।

अपने लगाए हुए पौधे पर हक जताने से महरूम हुए गुरुदत्त इसे बर्दास्त नहीं कर पा रहे थे। इसी दौरान उन्हें एक दिन सूचना मिली कि सुनील दत्त ने एक पार्टी का आयोजन किया है जिसमें वहीदा भी आने वाली हैं। वे बिन बुलाए शराब पिए हुए उस पार्टी में पहुंच गए। वहां जाकर वहीदा से जा उलझे और गुस्से में वहीदा के गाल पर थप्पड़ मार दिया। इस पर सुनील दत्त ने उन्हें गार्डस से कहकरा होटल से बाहर फिंकवा दिया। शायद इस बेइज्जती को भी गुरुदत्त बर्दास्त नहीं कर पाए। ये उनके मौत को गले लगाने से कुछ दिन पहले की घटना थीं। 

गुरुदत्त आज हमारे बीच नहीं है पर उनके कालजयी सिनेमा से हमेशा उनके हमारे साथ होने का अहसास हमें बना रहता है। 9 जुलाई 1925 के दिन वे इस दुनियां में आए थे। और जल्द् ही यहां से अपना काम निपटाके चले दिए इस दुनिया को ठोकर मारते हुए कि ये दुनियां अगर मिल भी जाए तो क्या है? 

 

                    धर्मेंद्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं। . 

 



Click here to Top