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सआदत हसन मंटो


जन्मदिन पर विशेष


Old is Gold
सआदत हसन मंटो

जन्मदिन पर खास

 मौत के बाद जिंदगी का सफर सआदत हसन मंटो

               11 मई जन्म जयंती पर विशेष   

मौत हमें जिंदगी से जुदा कर देती है लेकिन कुछ लोग अपनी मौत के बाद जिंदगी का सफर शुरू करते हैं। इस सफर में उन्हें वो इज्जत शौहरत मिलती है जो शायद जीते जी उन्हें नसीब ना हो पाई हो। आज के हालातों में मंटो के बारे में सोचता हूं तो यही बात दिमाग में कौंध जाती हैं। आज मंटों के अफसानों की कद्रदानी कितनी बढ़ी है। हर दूसरा रंगकर्मी उनके अफसानों को नाटक में ढालकर उनकी आवाज को गाहे बगाहे उठाता है।

 उनके अफसानों को उनके जीते जी लानत मिली थी। आज उन्हें ना केवल भारत बल्कि पाकिस्तान में भी प्यार मिल रहा है। भारत में रहे तब तक अंग्रेज़ सरकार की उन पर वक्रदृष्टि रही और पाकिस्तान सरकार ने तो उनकी लेखनी की कमर ही तोड़ दी। पाकिस्तान के कट्टरपंथियों ने उन्हें पथभ्रष्ट मुसलमान कहा। और शायद इसी गम में शराबनोशी को वजह बना बहुत कम उम्र में दुनियादारी से अलविदा कह गए।

बचपन, आवारगी और अदब

  पंजाब  लुघियाना के शमराला गांव में ११ मई १९१२ को सआदत हसन मंटो की पैदायश हुई । शुरूआती तालीम अमृतसर में करने के बाद आगे की तालीम के लिए अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय तक गए पर,  बचपन से मन चांद सितारों में हो तो पढाई लिखाई में कहां लग पाता है । इंटर में दो बार फेल होने के कारण मन पढाई से उचाट हो गया और वो अमृतसर लौट आए। यहां पर यार पेशा होकर अमृतसर के फजलू कुमहार की बैठक में मन रमने लगा,  जहां पर अपनी उम्र से बड़े दोस्तों को जुआ खेलते देखना उनका काम था । इसके अलावा इस महफिल में फिल्मों में काम करने वाली सिने तारिकाओं और आगा हश्र काश्मीरी के नाटकों के संवाद भी चर्चा का विषय हुआ करते थे। लेकिन किस्मत शायद उनके चांद सितारे के शौक को परवान चढाना चाहती थी इसलिऐ उनकी जिंदगी में लेखक संपादक वारी अलीग का आगमन हुआ।  लाहौर के लेखक संपादक वारी अलीग अपने सहयोदी अबुलजला चिस्ती के साथ उर्दू साप्ताहिक मसावात को अमृतसर से शुरु करने आए थे। इल्मदार लोगों के प्रति सेवा भावना रखने वाले मंटों की उनसे जमने लगी।

 बकौल मंटो -  “वो एक  जिंदादिल इंसान थे और युवाओं में गर्मजोशी भरना तो मानो उन का इंसानी पेशा था। उनसे दिल लगा तो मसावात के दफतर में रोज जाने लगा। वे मुझे कोई ना कोई मजमून उर्दू में रुपांतरण करने के लिए दे देते। मैं हालांकि इससे पीछे हटता, लेकिन उनका इसरार एसा होता कि मैं मना नहीं कर पाता । उनके ऐसे ही इसरार पर मैंने फ्रांसीसी उपन्यासकार विक्टर ह्यूगो के उपन्यास का उर्दू तर्जुमा कर दिया। इस तरह मेरी अखबारनवीसी को एक रुख मिलने लगा था।“

सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था कि अमृतसर से उर्दू मासावात बंद हो गया। वारी साहब के अमृतसर से जाने के बाद मंटो बेचैन रहने लगे, अब अदबी माहौल के कारण इतनी तमीज तो आ गई थी कि फिर से फजलू कुमहार की बैठक में जाकर जुआ ना खेलें।  इसके साथ ही मुर्शिद वारी अलीग के कारण सामयवादी बयार का असर मंटो पर होने लगा था। इसी दौरान वो अपने मौलिक अफसाने लिखने लगे। 

ये बात 1933 की है जब लेखक संपादक वारी अलीग एक बार फिर अमृतसर लौटे और उन्होंने खल्क नामक उर्दू अखबार अमृतसर से निकाला और इसी में मंटो का पहला अफसाना तमाशा साया हुआ,  पर इसमें मंटो ने अपना नाम ना दिया। उन्होंने सोचा लोग मजाक उड़ाएंगे और उस अफसाने का मौंजू भी उस माहौल के लिहाज से एक लेखक के लिए अनुकूल ना था।  खल्क के पहले एडीशन से ही मुसीबत के बादल मंटो पर मंडराने लगे। हुआ यूं कि बारी अलीग ने सामयवादी विचारों का अक्स खल्क के पहले एडीशन में ही अपने संपादकीय लेख ‘हीगल से कार्ल मार्क्स तक’ में दे दिया । इसका परिणाम ये हुआ कि उनके पीछे खुफिया पुलिस लग गई। वारी साहब अमृतसर से गायब हो गए तो पुलिस उनके संगी साथियों पर नजर रखने लगी। पिछले कुछ समय से अफसानें लिखने की वजह से मंटो को अफसानानिगारी की कुछ समझ तो आ ही गई थी इसलिए खुफिया पुलिस से खुद को बचाने की खातिर और फिल्म लेखक बनने का सपना लेकर मंटो बंबई चले आए।  

 मंटो और मायानगरी

ये वो जमाना था ङ्क्षहदी फिल्मों ने बोलना शुरू किया ही था । आर्देशिर ईरानी की इंपीरियल फिल्म कंपनी का दबदबा चारो तरफ था।  अदबी जगत में थोडी जान पहचान के कारण मंटो यहां अस्थाई तौर पर काम करने लगे। एक्सट्रा कलाकारों की भीड़ में रोज अठन्नी तो मिल ही जाती थी। इसके साथ ही वहां काम करने वाले एंगलो इंडियन कलाकारों को उनके संवाद, जो उर्दू में होते थे, उन्हें ढँग से कहलवाने का काम उन्हें मिल गया था।  करीब पांच साल बंबई में इंपीरियल फिल्म कंपनी से लेकर सरोज फिल्म कंपनी तक में छोटी मोटी लिखने की मुलाजमत की, जो कलम के मजदूर जैसी थी। लेकिन इस तकलीफदेह दौर में पत्र पत्रिकाओं में साया होने वाले मंटो के अफसानों से बतौर लेखक मंटो ने अपनी पहचान बना ली। इसी वजह से 1938 में दिल्ली रेडियो स्टेशन में जब मंटो को नौकरी करने का ऑफर आया तो वो बंबई से अपना बोरिया बिस्तर समेट दिल्ली आ गए।  दिल्ली में करीब डेढ साल रहकर रेडियो पर प्रसारित अपने ड्रामों के जरिए पूरे हिंदुस्तान में अपनी अफसाना निगारी की पैठ जमा ली थी । मुंबई के कई फिल्मी लोग दिल्ली रेडियो स्टेशन से प्रसारित हो चुके उनके ड्रामों के कारण मंटो कद्रदान बन चुके थे। इनमें से एक जद्दनबाई भी थीं।

फिर हुई मुंबई वापसी

मंटो के ड्रामों की लोकप्रियता के मद्देनजर उनके दोस्त और फिल्मनिगार के आसिफ के मामूजान नज़ीर ने उन्हें वापिस मुंबई बुलाया।  

बकौल मंटो, .. .. ..”सिर्फ अखबारनबीसी के लिए बंबई ना लौटता पर इस बार नजीर ने ‘खानदान’ फिल्म के सुपरहिट डायरेक्टर शौकत के लिए एक फिल्म लिखने का प्रस्ताव भी मुझे दिया तो मैं अगस्त 1940 में एक बार फिर बंबई की फिल्मी दुनिया में अपने कदम जमाने की खातिर दिल्ली रेडियो की मुलाजमत छोड़कर बंबई आ गया। इस बार कई रास्ते मेरे लिए खुले थे । शौकत के लिए कहानी लिखने के साथ ही नजीर के अखबार ‘मुसव्विर वीकली’ में संपादक की हैसियत से मैने अपनी अखवार नबीसी को अंजाम देना भी शुरु कर दिया। शौकत के साथ मैने फिल्म नौकर लिखी पर इस फिल्म के मेरे अनुभव अच्छे नहीं रहे अपनी आदत के अनुसार शौकत ने मेरी लिखी कहानी में काफी बदलाव कर दिया। शौकत का ध्यान फिल्म पर कम और लाहौर से मुंबई आई नूरजहां के साथ आशनाई पर ज्यादा था। फिर भी शौकत से दिली लगाव के कारण मैने उससे दोस्ती तोड़ने की बजाय अपना रास्ता अलग करना ही बेहतर समझा।

 इस दौरान मंटो की शादी हो चुकी थी । मंटो के घर आने वालों में एक थे शाहिद लतीफ । मंटो की बेरोजगारी को देखते हुए साफिया ने शाहिद लतीफ को मंटो की नौकरी लगवाने का जिक्र किया।  शाहिद लतीफ उन दिनों फिल्मिस्तान से जुड़े थे। कुछ दिन बाद मंटो को फिल्मस्तान के सिनेरियो (पटकथा) डिपार्टमेंट में मुलाजमत मिल गई । और यहां मंटो को बतौर फिल्म लेखक एक सही राह मिली । फिल्मस्तान के लिए मंटो ने उस जमाने के सितारा कलाकार अशोक कुमार से सजी चल चल रे नौजवान, शिकारी और आठ दिन जैसी फिल्मों को लिखा। अपनी लिखी ‘आठ दिन’ में तो मंटो ने अशोक कुमार के आग्रह पर पागल लेफिटनेंट सखाराम का किरदार निभाया।

परिवार के साथ

“अपने संस्मरण की किताब तस्वीरें में मंटो लिखते हैं, फिल्मस्तिान ही वो जगह थी जहां पर मेरे फिल्मी लेखन का सितारा बुलंद हुआ था । मेरे दिलो दिमाग में काबिज फिल्मिस्तान की यादें आज भी मेरा पीछा नही छोड़ती हैं। अशोक कुमार का जीजा एस मुखर्जी तो मानो उस समय जनता की नब्ज जानता था। पूरे फिल्म के विचार को एक सूत्र में पिरो देता था। वो फिल्म कला का बड़ा ताज़िर था, खुद पर बेहद विश्वास रखने वाला वह शखस कलाकारों के चयन में बाजार का रुख देखता था।  इस कारण अशोक और मुखर्जी दोनों जीजा सालों के बीच खूब जद्दोजहद होती थी।“

मंटो का मुंबई से मुंह मोड़ना

मंटो की लिखी आठ दिन खूब मकबूल हुई। सब कुछ अच्छा चल रहा था कि दूसरे विश्व युद्ध की छाया हिंदुस्तान पर मंडराने लगी। इससे फिल्म उद्योग पर भी बुरा असर पड़ा। कई फिल्म कंपनियों के दिवाले निकल गए। फिल्मस्तान का धन प्रबंधक सेवक वाच्छा अपनी मां के इलाज के लिए लंदन चला गया था। एसे में अशोक की अपने जीजा एस मुखर्जी से भी थोड़ी अनबन हुई,  क्योंकि उसका सारा ध्यान नसीमबानो और उसकी फिल्म कंपनी ‘ताजमहल पिक्चर्स’ में फिल्मिस्तान से ज्यादा अटकने लगा था।  मंटो एसे में एक दो अन्य प्रोड्यूसर्स के लिए कहानी लिखने लगे।  विश्व युद् की गरमी ठंडी हुई तो सेवक वाच्छा लौटा लेकिन तब तक मुस्लिम लीग का आंदोलन जोर पकड़ने लगा । जगह जगह दंगे भड़कने लगे।

बकौल मंटो – “ बॉबे टॉकीज के मालिक हिंमांशु राय की मौत हो चुकी थी। देविका रानी विदेश बस गई थी । अशोक और सेवक वाच्छा ने मौके का फायदा उठाते हुए फिल्मस्तिान से अलग होकर एक बार फिर बॉबे टॉकीज को जिंदा करने का जिम्मा ले लिया। अशोक और सेवक के साथ में शाहिद लतीफ , इस्मत चुगताई , हसरत लखनवी , के साथ संगीतकार गुलाम हैदर भी थे ।  जब अशोक और सेवक ने मुझे एक  बार फिर अपने पुराने संबंधों की दुहाई देते हुए बॉंबे टॉकीज से जोड़ने की जिद की तो मैं उन्हें मना नहीं कर सका। लेखक कमाल अमरोही की लिखी कहानी को फिल्म के रूप में ढालने की कोशिश शुरू हो गई।

लेकिन इस दौरान मुंबई की फिल्मी दुनियां में भी दो धड़े बन चुके थे । एक वो जो हिंदुस्तान में रहने का हिमायती था तो दूसरा वो जो मुसलमानों के लिए अलग से मुल्क पाकिस्तान बनाए जाने की हसरत रखता था। इस दौरान कहीं ना कहीं मंटो के अजीज अशोक कुमार और मंटों के रिश्तों में थोड़ी दरार आ गई जिसे आसपास के लोगों ने भरने के बजाय और चौड़ा किया। उन दिनों अशोक कुमार ने भी बॉंबे टॉकीज को पुनर्जीवित करने के लिए अपना सब कुछ दाव पर लगा दिया था। उनका ध्यान सिर्फ फिल्म महल की सफलता के लक्ष्य पर टिका था। ऐसे में वो मंटो के मन में चल रहे द्ंद को नहीं समझ पाए। फलस्वरूप मंटो ने देश के विभाजन के करीब पांच महिने बाद नूरजहां और उनके पति निर्देशक शौकत, संगीतकार रफीक गजनवी को ही अपना सहारा मान, पाकिस्तान की ओर रुख किया।  लेकिन वहां पर किसी फिल्म कंपनी में उन्हें उचित काम नहीं मिला। कट्टरपंथियों ने उनकी कहानी ‘ठंडा गोस्त’ पर मुकदमा चला दिया। जिससे लेखक मंटों की लेखनी की कमर टूट गई । इस गम में शराबनोशी इतनी बढी कि पाकिस्तान के पागलखाने में दाखिल होना पड़ा। इसी दौरान उन्होंने अपनी मर्मस्पर्शी कहानी टोबाटेकसिंह लिखी ।   

बिगड़ती सेहत के साथ 18 जनवरी 1955 को सिर्फ 43 वर्ष की उम्र में वो दुनियादारी से कूच कर गए। लेकिन आज वो अपने अफसानों और इज्ज्त शौहरत के साथ आवाम के दिलों में मौजूद हैं।

                     
धर्मेंद्र उपाध्याय   

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं। . 


-Dharmendra Upadhyay

 

 

 



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