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अहसास के शायर कैफ़ी

Old is Gold
अहसास के शायर कैफ़ी आज़मी

पुण्य तिथि पर विशेष

 अहसास के शायर  कैफ़ी आज़मी

 पुण्य तिथि 10 मई पर विशेष

कैफ़ी आज़मी का नाम ज़हन में आते ही गीतों के कई रंग हमारे सामने बिखर जाते हैं।  कहीं देशभक्ति भाव, तो कहीं प्रेम में निसार हो जाना; कहीं टूटे दिल की बात, तो कहीं जिंदगी को फिर से पाने का एक हौसला; उनके फिल्मी गीतों में सुनाई पड़ता है। और ऐसा होना उनके गीतों में पूरी तरह से उनके होने का परिचायक है। क्योंकि वो अहसास के शायर थे। वो कोई बड़े तालीमयाफता इंसान नहीं थे पर उनके हरेक शेर में हमेशा उनके अहसास का अलहदा रंग होता था। ये अहसास बचपन से ही कहीं उनके खून में थे।  इन अहसासों पर चढे जीवन संघर्ष के गहरे रंगों ने उन्हें और सुर्ख कर दिया।  

छोटी उम्र में बड़ी शायरी  

कैफ़ी आज़मी का जन्म आजमगढ उत्तर प्रदेश के मिजंवा में 14 जनवरी 1919 को हुआ। जमींदार परिवार में पैदा हुए कैफी को बचपन से ही शेरो शायरी का जुनून था। 11 साल की उम्र में ही उन्होंने ऐसी अह्सासों से भरी ग़ज़ल  लिखी जिसे पढकर कोई ये मानने को तैयार नहीं हुआ कि ये ग़ज़ल  इस 11 साल के लड़के अतहर हुसैन ने लिखी है। बाद में बेग़म अखतर की आवाज में ये ग़ज़ल रिकॉर्ड हुई जिसके बोल थे..

इतना तो जिंदगी में किसी की खलल पड़े।

हंसने से हो सुकूं,  ना रोने से कल पड़े।

जिस तरह से हंस रहा हूं मैं, पी पी के अश्केगम

यूं दूसरा हंसे तो, कलेजा निकल पड़े। 

अतहर हुसैन का कॉमरेड कैफी होना 

 बचपन से ही वो बागी और तरक्कीपसंद प्रवृति के थे। जब उनके तहसीलदार पिता ने आजमगढ़ से लखनऊ के सुल्तान उल मदारिश नामक मदरसे मे भेजा तो उन्होंने वहां पर ही विद्यार्थियों की यूनियन बना डाली और मदरसे में चल रही अनियमितताओं के खिलाफ आवाज बुलंद कर दी। इसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा कि उन्हें मदरसे से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। घरवाले नाराज थे। ऐसे में वे कानपुर चले गए और कानपुर में एक जूतों की फैक्ट्री में काम करने लगे। यहां पर मजदूरों के साथ रहकर उनके भीतर एक नई क्रांति का सूत्रपात हुआ।

 ये समय था 1942 का, जब देश में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ को जोर था। उन्होंने इंकलाब जिंदाबाद के नारों के साथ आंदोलन में हिस्सा लिया। इसके साथ ही वे पत्र पत्रिकाओं में भी लिखते थे। इसी दौरान उन्होंने अपनी एक रचना मुंबई से प्रकाशित कौमे जंग में कैफ़ी आज़मी के नाम से भेजी। इससे अखबार के संपादक सज्जाद जहीर खासे प्रभावित हुए और डाक पर लगी मोहर के जरिए  इस लेखक की खोज हुई।  इस रचना की वजह से कैफी 1943 में मुंबई

आ गए। यहां आकर वे विधिवत कॉमरेड बन गए। इसके साथ ही वे 45 रुपए माहवार में अखबार कौमे- जंग के लिए लिखते लगे। उनके लिखे शेरोशायरी और आलेखों से वे मकबूल होने लगे। और फ़िर मुंबई के बाहर भी कैफी के अशआर की चर्चा होने लगी।

उठ मेरी जान मेरे साथ चलना है तुझे

कद काठी और बुलंद आवाज के धनी मुशायरों में छाने लगे तो ऐसे ही एक बार औरंगाबाद में अपने परिवार जनों के साथ कैफी को सुनने के लिए आई उनकी शरीके हयात शौकत कैफी,  जो उस समय मैट्रिक में पढ़ रही थीं। वो उनकी नज्म ताजमहल से बहुत ज्यादा मुतासिर हुईं और कैफी का एक ऑटोग्राफ लिया। इसके बाद दौनों का झुकावा एक दूसरे प्रति होने लगा। और खत लिखे जाने लगे। इस कड़ी में एक बार तो कैफी साहाब ने शौकत को खून से खत लिखा। शौकत कैफी के मुताबिक, कैफी साहब ने अपनी औरत नज्म उन्ही के लिए लिखी थी। इस नज्म के हर तरक्की पसंद इंसान के जुबान पर चढ जाने के बाद तो शौकत ने तय कर लिया कि अब तो कैफी के साथ ही जिंदगी बिताएंगी।   

परिवार के साथ

फिल्मों में गीत लेखन और आर्थिक संघर्ष

सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था कि  देश में 1949 में पार्टी पर बैन होने के बाद कैफी के जीवन में संघर्ष के बादल और घने हो गए। पार्टी के शीर्षस्थ लोगों में होने के कारण उन्हें अंडरग्राउंड होना पड़ा। इस दौरान घर की आर्थिक स्थिति डगमगाई हुई थी। एसे हालात में कैफी और शौकत की पहली संतान एक बेटा साल भर का होकर इलाज के अभाव में गुजर गया। 

ऐसे में शाहिद लतीफ उनके पास आए और उन्होंने अपनी फिल्म बुजदिल के दो गीत उनसे लिखवाए । बकौल कैफी,  उनकी फिल्म के गीतकार तो शैलेंद्र थे पर उन्होंने मेरी आर्थिक मदद करने के लिहाज से मुझसे गीत लिखवाए क्योंकि गीत लिखवाने से पहले ही उन्होंने कह दिया था कि इन गीतों से मिलने वाले पैसे मैं शौकत को दूंगा। इस तरह फिल्मों में गीत लिखने की शुरूआत हुई। इसके बाद कैफी ने यहूदी की बेटी (1956), मिस पंजाब मेल (1958),  ईद का चांद (1958) के गीत लिखे। इस दौरान कुछ फिल्मों के गीत लिखते लिखते शाहिद लतीफ के जरिए ही वे गुरुदत्त तक पहुंचे जो उन दिनों प्यासा के बाद साहिर का विकल्प ढूंढ रहे थे। चाहे फिल्मी गीतकार के रूप में वो साहिर के मुकाबिल मकबूल नहीं थे पर उर्दू अदब में उनका नाम साहिर, मजरूह, जांनिसार अखतर के साथ लिया जाने लगा था। गुरुदत्त उनके अशआरों से प्रभावित हुए और कैफी को ‘कागज़ के फूल’ के गीत लिखने का अवसर मिला। बतौर गीतकार ये कैफी के लिए बहुत बड़ा अवसर था पर ‘कागज के फूल’ के बॉक्स ऑफिस पर बैठ जाने के कारण गीतकार के रूप में कैफ़ी के कदम एक बार फिर रुक से गए।  

 पनौती गीतकार होने का दर्द

 कागज के फूल की असफलता ने कैफी के गीतकार करियर को प्रभावित तो किया ही साथ ही जो लोग कैफी से खार खाते थे उन्होंने चारो तरफ ये प्रचारित करना शुरू कर दिया कि कैफी पनौती गीतकार है, जिस फिल्म के लिए लिखता है वो बॉक्स ऑफिस पर बैठ जाती है। इसके काफी समय बाद उनके पास चेतन आनंद आए और उनसे अपनी फिल्म हकीकत (1964) के गीतों को लिखने का इसरार किया ।
बकौल बाबा आजमी, “चेतन आनंद साहब जब अब्बा के पास आए तो उन्होंने कहा अच्छी बात है आप गीत लिखवाने के लिए मेरे पास आए हैं पर बाजार में चर्चा है कि मैं जिस फिल्म के गीत लिखता हूं वो बॉक्स ऑफिस पर बैठ जाती हैं।“

इस पर चेतन आनंद ने कहा,  “कैफी साहब मैं भी एक असफल इंसान हूं, क्या पता दो असफल इंसान कोई बड़ी सफलता हालिस करलें?” और हुआ भी ऐसा ही।  हकीकत (1964) से चेतन आनंद, कैफी और संगीतकार मदन मोहन की इस तिकड़ी ने हिंदी सिनेमा को  हकीकत, हंसते जखम, हीर रांझा जैसा बेहतरीन संगीतमय फिल्म दीं। मदन मोहन के साथ कैफ़ी आज़मी  के गीतों की धूम ने निर्माताओं का रुख कैफी की ओर मोड़ दिया।

शायर कैफी और उनके गीत

शायर कैफी ने जहां उर्दू के बेहतरीन शब्दों का इस्तेमाल अपने गीतों में किया वहीं गीतकार कैफी आज़मी बड़ी सरलता के साथ अपने गीतों में सामने आए। मसलन ‘माना हो तुम बेहद हसीन, ऐसे बुरे हम भी नहीं, (टूटे खिलौने), मिलो ना तुम तो हम घबराएं मिले तो आंख चुराएं (हीर रांझा),  तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो (हंसते जखम) आदि । इसके साथ ही उन्होंने फिल्मों के संवाद लिखे जिनमें एस एम सथ्यू की ‘गरम हवा’ (1975) के स्क्रीनप्ले डायलॉग के लिए उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड मिला। चेतन आनंद के लिए हीर रांझा के फिसी संवादों को उन्होंने काव्य की शैली में प्रस्तुत किया।

एक बानगी रांझा के संवाद में

शरमाती है तू क्यों आज मेरी बांहों में आके

ले जाऊंगा एक दिन तुझे डोली में बैठाके। 

बतौर शायर उनके दीवान .. शरमाया, आवारा सज्दे, नए गुलिस्तान, कैफियत साया हुए।  1975 में उन्हें आवारा सज्दे के लिए साहित्य अकादमी अवार्ड से नवाजा गया। 1970 में अमिताभ की पहली फिल्म सात हिंदुस्तानी के लिए उन्हें गीत लेखन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

शायरी और जिंदगी

कैफी की शायरी में हिंदुस्तानी तहजीब के साथ औरत को इज्जत मिलती है। वो अपने गीतों में अपने संघर्ष के साथ जिंदगी को जीने का हौसला भी दिखाते हैं। पैरालाइसिस अटैक के समय उनकी लिखी नज्म की चंद पक्तियां उनके जिंदगी में विश्वास को प्रकट करती हैं।

जिंदगी कहने को बेमाया सही, ग़म का सरमाया सही

मैंने इसके लिए क्या क्या ना किया।

कभी आसानी से एक सांस यमराज को मैंने ना दिया।

 लेकिन जिंदगी भी भला उनकी जिंदादिली का कहां तक साथ देती । 83 वर्ष की उम्र में 10 मई 2002 को वो जहाने फानी से रुखसत कर गए और  पीछे छोड़ गए अपने विचारों की एसी मशाल जो सदियों तक हमारे समाज को रौशन करेंगी। 

सुनिए खुद कैफ़ी साहब को एक मुशायरे में ..

 

 

धर्मेन्द्र उपाध्याय

 धर्मेंद्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं। . 



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