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Nasir Hussain


Dharmendra Upadhyay


Old is Gold
Nasir Hussain

जन्म जयंती पर शत शत नमन

       यादों की बारात निकली है आज दिल के द्वारे

        3 फरवरी जन्म जयंती पर शत शत नमन 

लेखक निर्माता निर्देशक नासिर हुसैन की आज जन्म जयंती है। चाहे सरकार ने उनके सिनेमाई योगदान के लिए उन्हें कोई बड़ा पुरस्कार नहीं दिया हो पर आम आदमी के बीच उनके सिनेमा की लोकप्रियता के लिहाज से, सिनेमा में उनके योगदान को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। उन्होंने अपने सिनेमा के जरिए आम आदमी की रूह को सुकून दिया।  उनकी फिल्मों के संगीत को ना केवल पुरानी पीढीयों ने गुनगुनाया बल्कि उनकी फिल्मों के क्या हुआ तेरा वादा, ये लड़का हाय अल्लाह, आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा जैसे गाने आज भी यू ट्यूब पर खूब पसंद किए जाते हैं।  नई पीढ़ी उन्हें आमिर खान के चाचा के रूप में जानती है। 

With Aamir

नासिर हुसैन और हिंदी सिनेमा

नासिर हुसैन भोपाल से मुंबई फिल्मी दुनिया में शशधर मुखर्जी के आह्वान पर आए थे। ये वो वक्त था जब भारत स्वतंत्र हो चुका था, फिल्मिस्तान से अशोक कुमार और सेवक वाच्छा अलग हो चुके थे।  सआदत हसन मंटो पाकिस्तान चले गए थे।  ऐसे में हिंदी सिनेमा के फार्मूला गुरु शशधर मुखर्जी को एक ऐसे लेखक की जरूरत थी जो उनके मन में उठने वाले सिनेमाई फार्मूलों को अपनी कलम से कहानी की शक्ल में पेश कर सके। इस जगह को भरने में नासिर हुसैन ने अहम भूमिका निभाई। फिलमिस्तान में आकर वो पहले निर्देशक ए आर कारदार के साथ सहायक निर्देशक और लेखक की हैसियत से जुड़े। उन्होंने फिल्मिस्तान में अनारकली (1953) से अपनी जगह बनाई। इसके बाद अपने मेंटर शशधर मुखर्जी के विचारों को उन्होंने कलमी जामा पहनाते हुए मुनीम जी(1955) और पेइंग गेस्ट (1957) का लेखन किया। इन फिल्मों का निर्देशन शशधर मुखर्जी के छोटे भाई सुबोध मुखर्जी ने किया। इन फिल्मों की लोकप्रियता ने नासिर हुसैन को बतौर लेखक अच्छी पहचान दिलवा दी तो शशधर मुखर्जी ने उन्हें फिल्मिस्तान के बैनर तले ही तुमसा नहीं देखा (1957) से फिल्म निर्देशन का अवसर प्रदान किया। इस अवसर को उन्होंने अपने लिए ही सार्थक नहीं बनाया बल्कि कई फिल्मों की असफलता झेल चुके शममी कपूर के करियर को भी दिशा दी। इसके बाद उन्होंने दिल देके देखो (1959) से दोहरी सफलता पाई। इसके साथ ही वे लेखक-निर्देशक के बाद निर्माता बने और जब प्यार किसी से होता है (1961), फिर वही दिल लाया हूं (1963), तीसरी मंजिल (1966), बहारों के सपने (1967), प्यार का मौसम (1969), कारवां (1971) , यादों की बारात (1973), आंगन (1973) हम किसी से कम नहीं(1977) तक अधिकतर हिट फिल्में बतौर निर्माता पेश की। बतौर निर्देशक उनकी अंतिम फिल्में जमाने को दिखाना है (1981), मंजिल मंजिल (1984) और जर्बदस्त (1985) बॉक्स अफिस पर कुछ खास कमाल नहीं कर पाई। 

सफलता की सृजन लकीर

नासिर साहब के बारे में कहा जाता हैं कि उनकी अधिकतर फिल्मों की कहानी एक जैसी होती थी। लेकिन गहराई से अध्ययन किया जाए तो उनकी सृजन लकीर शशधर मुखर्जी के फार्मूला सिनेमा की सोच से निकलती जरूर थी पर उनके किरदारों और स्क्रीनप्ले में एकरसता का आभास दर्शकों को कभी नहीं हुआ। उनकी अधिकतर फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई । उनकी फिल्मों के नायक का बेहद रूमानी होना और नायिका से विशेष परिस्थितियों में पड़के मिलना जरूर एक लकीर पर चलता था, पर हर बार परिस्थतियां और किरदारों में रंग इस तरह भरा जाता था कि बॉक्स अफिस पर इसका असर देखने को मिलता था। अपने प्रोडक्शन हाउस के लिए लेखकों से उनकी कहानी सुनने का अंदाज भी निराला था।

सिने विशेषज्ञ लोकेंद्र शर्मा के मुताबिक, वे लेखक को सामने बैठाकर कहानी सुनाने के लिए कह देते थे और खुद लेट जाते थे। अगर उन्हें कहानी सुनाने के दौरान कहानी का कोई पंच प्रभावित कर गया तो झटके के साथ उठ खड़े होते थे। लेकिन अगर उन्हें अगर कहानी में कोई पंच नहीं दिखा तो वे ऐसे सोते थे कि फिर उनका सहायक ही आकर लेखक को तुरंत परिणाम बता देता था कि महोदय आपकी कहानी सर को पसंद नहीं आई। 

युवा प्रतिभाओं को प्रोत्साहन

With Pancham Da

नासिर हुसैन की फिल्मों के गीत संगीत ने श्वेत श्याम से लेकर सिनेमा के रंगीन होने तक जर्बदस्त धूम मचाई। उनकी शुरूआती फिल्मों में ओ पी नैयर, ऊषा खन्ना और शंकर जयकिशन ने संगीत दिया पर उनके साथ संगीतकार के रूप में लंबी पारी खेली आर डी वर्मन ने। ये बात हरेक सिने संगीत प्रेमी जानता है लेकिन इस लंबे साथ के पीछे नासिर हुसैन साहब की भली सोच और युवाओं को प्रोत्साहन देने की भावना छुपी हुई थी।  गौरतलब है कि अपने पिता के साथ किशोरावस्था से ही सहायक के रूप में जुड़े रहे पंचम को पहला स्वतंत्र संगीतकार के रूप में अवसर गुरुदत्त के सहायक निरंजन की स्वतंत्र निर्देशक के रूप में बनने वाली फिल्म राज से मिला था पर ये फिल्म बन नहीं पाई और संगीतकार पंचम का करियर बनने से पहले ही बिगड़ने लगा। इस दौरान गुरुदत्त फिल्मस से ही निकले अभिनेता महमूद ने उन्हें छोटे नवाब (1961) में बतौर संगीतकार पेश तो कर दिया था। पर ये सिर्फ सांत्वना पुरस्कार जैसा था।  उस दौरान अपनी असफलताओं से जूझते पंचम खूब सिगरेट पीने लगे थे और अपनी इस आदत के कारण पिता सचिन देव वर्मन से खूब डांट खाते थे । ऐसे में चचा मजरूह सुल्तानपुरी देख रहे थे कि किस तरह सचिन देव के स्वर सम्राज्य में युवा प्रतिभा खत्म हो रही है। उन्होंने इस बात की चर्चा नासिर साहब से की तो उन्होंने पंचम को एक फिल्म के लिए नहीं बल्कि अपनी पांच फिल्मों के लिए बतौर संगीतकार अनुबंधित कर, एक दम तोड़ती युवा प्रतिभा को एक झटके में प्राणदान दिया। इस कड़ी में पंचम की पहली फिल्म थी तीसरी मंजिल।      

लेखन से लेखन तक  

1985 में रिलीज हुई फिल्म जबर्दस्त के बाद उन्होंने फिल्में निर्देशन से सन्यास ले लिया । उन्होंने अपने प्रोडक्शन हाउस की कमान बेटे मंसूर और बेटी नुजहत को दे दी। यहां एक बार फिर उन्होंने पंचम की तरह अपने भतीजे आमिर की दिल में उफन रही सिनेमाई कशमकश को समझा। नासिर साहब ने फिल्मों में अपना करियर बतौर लेखक शुरू किया और फिर एक बार लेखक बनकर उन्होंने तफसील से फिल्म कयामत से कयामत तक की कहानी लिखी।  कयामत से कयामत तक की लेखनी में भी उन्होंने अपनी लकीर नहीं छोड़ी और यहां भी नायक से नायिका का मिलना बड़ी अजब परिस्थिति में हुआ।

 आमिर-जूही के चेहरे की मासूमियत के साथ इस पर भी सिनेप्रेमी गौर करें तो पाएंगे कि माऊं ट आबू में सूरज के डूबते समय नायक-नायिका मिलते हैं। उसी दौरान एक संवाद के जरिए लेखक नासिर प्रकट करते हैं कि सूरज डूबते समय नायक नायिका का मिलन होता है तो उनकी जोड़ी नहीं बन पाती है। आगे फिल्म देखते समय दर्शक ये बात भूल से जाते हैं लेकिन उसी संवाद के मर्म पर नायक- नायिका का मृत्यु दृष्य रचकर लेखक नासिर अपना जादू जगा देते हैं।  उन्हें फिल्म कयामत से कयामत तक में अपने लेखन के लिए पहली बार फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। इसके बाद नई पीढी में उनकी आस्था ने ही उन्हें ‘जो जीता वही सिकंदर’ के लिए बेस्ट फिल्म का अवार्ड दिलाया। इसके बाद उन्होने अपने मित्र शममी कपूर के हाथों जी सिने लाइफटाइम एचीवमेंट पुरस्कार ग्रहण किया।

नासिर हूसैन ने पूरी आत्मीयता के साथ हिंदी सिनेमा को अपना सर्वस्व दे दिया। 13 मार्च 2002 को वो जहाने फानी से रुखसत कर गए। उनकी फिल्मों के संगीत पर कदम थिरके बिना नहीं रहते वहीं उनकी फिल्मों के गीत रिश्तों के रंग प्रकट करते हैं। उनकी यादों के सिलसिले सिनेसंगीतप्रेमियों के जेहन से मिटने वाले नहीं है। ङ्क्षहदी सिने रसिकों के लिए उनकी यादों के साए सच में यादों की बारात जैसे हैं जो दूर तक साथ रहते हैं।

 

धर्मेंद्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं।   धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनोंं मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं।   
ई मेल आई डी -jprdharmendra@gmail.com
 फोन न- 9667983852, 9928434141

 

 

 



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