1
 


शैलेंद्र


राज कपूर के साथ



शैलेंद्र - डाक टिकि

Old is Gold
गीतों के गौरव भावुक शैलेंद्र

गाता रहे मेरा दिल

वैसे तो अपने गीत में हर गीतकार खुद को समाहित करना चाहता है लेकिन कुछेक गीतकार ही ऐसे होते हैं जो अपने गीत में खुद को समाहित करते हुए समाज को भी साथ समेटे। अगर बात फिल्मी गीतों की हो तो यह बड़ा दूभर कार्य होता है क्योंकि वहां किरदार होते हैं और गीतकार को उन किरदारों के लहजे के हिसाब से अपने बोलों को दिशा देनी पड़ती है।

हिंदी सिनेमा के गीतों के गौरव कहे जाने वाले शैलेंद्र एकलौते ऐसे गीतकार थे जिन्होंने फिल्मी गीतों में किरदारों के साथ समाज और अपने आपको भली भांति समाहित किया। चाहे “गर्दिश में हूं आसमान का तारा हूं”,  हो या “सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी”; जब पर्दे पर आप गाना देखते हैं तो अभिनेता के साथ शैलेंद्र का अपना व्यक्तित्व भी ध्वनित होता है। 

राज कपूर के विशेष आग्रह पर हिंदी फिल्मों के लिए गीत लिखने का सिलसिला शुरू करने वालो शैलेंद्र लगातार संगीतकारों से इस बात के लिए जिरह किया करते थे कि उनके गीतों में जब तक किरदार के साथ गीतकार की आत्मा की आवाज नहीं मिलेगी तब तक वह गीत अधूरा रहेगा और शायद तभी तो आज भले हीं शैलेंद्र हमारे साथ ना हों पर उनके गीतों के जरिये वो आज भी हर दिन हमारे साथ होते हैं।

रावल पिंडी से विस्थापित होकर श्री कृष्ण जन्मम्भूमि मथुरा में पले बढे शैलेंद्र के व्यक्त्वि पर फिल्मों में आने के बाद भी ब्रज की मिट्टी की झलक साफ दिखलाई पड़ती हैं। जब वो बूट पालिस के लिए लिखते हैं कि “चली कौनसे देशे गुजरिया तू सज धज के”; इसके साथ ही उनके नायक-नायिका की छेड़छाड़ वाले गीतों में राधा कृष्ण का प्रेम माधुर्य नजर आता था।     

 फिल्मकार राज कपूर पर उनकी सोच का बेहद प्रभाव रहा।  अगर हम राज कपूर के सिनेमा का सच्चाई से अध्ययन करे तो गरीबों के लिए उनकी फिल्मों में सर्वहारा वर्ग के लिए इतना स्पेस ,चार्ली चैपलिन के अलावा शैलेंद्र पर उनके प्रभाव के जरिए ही नजर आता था। वरना राज कपूर स्वयं तो कभी फाकाकशी या गरीबी से इतने करीब नहीं रहे। राज कपूर अपने जीवन में जिन व्यक्तित्वों से बेहद प्रभावित रहे उनमें उनके प्रिय मित्र शैलेंद्र प्रमुख थे। राज कपूर हमेशा उन्हें आदर से कविराज बुलाया करते थे।

सिने संगीत प्रेमी उनके मधुर गीतों से परिचित हैं। लेकिन गुस्से के साथ सच्ची बात कह देना भी शैलेंद्र के निश्छल व्यक्तित्व की निशानी बन गया था। राजकपूर उनसे कितने प्रभावित थे इसकी एक बानगी तो इसी से पता चलती है कि एक सिटिंग में राज कपूर , शैलेंद्र और के ए अब्बास साथ बैठे हुए थे। यहां पर शैलेंद्र किसी बात को लेकर अड़ गए तो अब्बास साहब ने परेशान होते हुए राजकपूर से कह दिया ...यार तुम किस आदमी को पकड़ लाए हो, मेरे पास ।  अब्बास साहब की इस बात से भावुक मन शैलेंद्र ने वहां से उठते हुए अपनी बेबसी प्रकट करते हुए बस इतना कहा  .. ..गर्दिश में हूँ, आसमान का तारा हूं। आवारा हूं।  अपनी मजबूरी को प्रकट करने वाली शैलेंद्र की इस पंक्ति से राज कपूर इतने प्रभावित हुए कि वही राज कपूर की आवारा की शीर्षक गीत की पक्तियां बन गई।

कई बार संगीतकार शंकर को शैलेंद्र के बोलों पर थोड़ी बहुत आपत्ति होती थी और उस पर होने वाली जिरह में अंतिम निर्णय राज कपूर शैलेंद्र के ही हक में दे देते थे, क्योंकि शैलेंद्र उन्हें अपनी कहीं बात से मुतमईन करके छोड़ते थे। फिल्मों में राज कपूर का ढपली बजाना भी शैलेंद्र से प्रेरित था। दरअसल शैलेंद्र अपने मथुरा के दिनों से ही ढपली बजाया करते थे। ।  उन्हें ताल का ज्ञान था और उन्होंने अपने कई गीतों को तो ढपली पर ताल देते हुए ही तैयार किया था । सिनेप्रेमियों को याद होगा “दिल का हाल सुने दिलवाला।“ खासकर जन नाट्य के लिए लिखे गए गीतों को वे ढपली बजा बजाकर ही तैयार किया करते थे। वो कोई गीत जब तक नहीं लिखते थे, तब तक कि उनकी आत्मा और प्रकृति  एक साथ मिलकर उस गीत को लिखने की इजाजत नहीं देती थीं। 

एक बार काला बाजार फिल्म के लिए गीत लेने के लिए युवा आर डी वर्मन उनके पास पहुंचे। वो अपनी आदत के मुताबिक सचिन देव वर्मन से वादा करने के बावजूद गीत नहीं लिख पा रहे थे। वो पंचम को समुंदर के किनारे ले गए और उनसे सिगरेट की डिब्बी पर ताल देने के लिए कहा।  प्रकृति को महसूस कर कविराज ने समुद्र की लहरों और सामने छटा बिखेरे चांद को गीत में समेटते हुए तुरंत कालजयी मुखड़ा लिख दिया कि

खोया खोया चांद, खुला आसमान

आंखों में सारी रात जाएगी। तुमको भी कैसे नींद आएगी। 

शैलेंद्र के गीतों में सरलता के साथ, एक बेचैनी का आलम दिखता है, वो किरदारों के साथ साथ उनके अंदर बैठे उस भावुक इंसान की पहचाना भी था है जो निरंतर स्वयं की परतें खोलता जा रहा है। मसलन...
घायल मन का पागल पंछी , उडऩे को बेकरार,
पंख है कोमल, आंख है धुंधली जाना है सागर पार ।

शैलेंद्र के गीतों की प्रारंभिक  लोकप्रियता के बाद उन्हें अवाम के दुख दर्द समझने वाले गीतकार के रूप में रेखांकित किया जाने लगा तो उन्होंने विमल राय की यहूदी के लिए “ये मेरा दीवानापन है” जैसा गीत रचकर बता दिया कि इस क्रांतिकारी के सीने में  भी  एक दिल धडक़ता है जिसमें प्यार करने और टूट के चाहने वाले जींस मौजूद है । शैलेंद्र को इस गीत के लिए फिल्म फेयर अवार्ड मिला।

 

“दोस्त दोस्त ना रहा”

राज कपूर और शैलेंद्र का साथ बहुत अच्छा चल रहा था लेकिन अचानक उनकी दोस्ती को मानो जमाने की नजर लग गई - जब देव आनंद के महत्वाकांक्षी  प्रोजेकट ‘गाइड’ में शैलेंद्र ने मनमर्जी के दाम लेकर गीत लिखे। हालांकि वे पहले भी देव आनंद के बैनर लिए 1960 में ‘काला बाजार’ के लिए गीत लिख चुके थे। जानकारों की मानें तो देव-आनंद ने इसके बाद ‘हम दोनों’ के लिए साहिर और ‘तेरे के घर सामने’ के गीत हसरत से लिखाए गए इससे शैलेंद्र आहत थे। और वे अब नवकेतन के लिए आगे कोई गीत नहीं लिखना चाहते थे। और इसकी कसम उन्होंने राजकपूर के साथ किसी महफिल में खा ली थी पर विजय आनंद ने देव साहब को साफ कह दिया कि अगर गाइड बनेगी तो गीत शेंलेंद्र ही लिखेंगे। सो झक मारके देव और विजय शैलेंद्र के घर आए तो उन्होंने भी अपनी माकेंट प्राइस से ज्यादा पैसे की मांग रखदी लेकिन विजय आनंद ने एक झटके में ही उनकी मुंहमांगी कीमत को फाइनल कर दिया। अब शैलेंद्र क्या कहते पर ये बात शायद राज कपूर को पसंद नहीं आई थी।  क्योंकि पहले देव आनंद किसी और से गीत लिखवा रहे थे और अचानक शैलेंद्र ने  विजय आनंद और देव आनंद के आग्रह को स्वीकार कर लिया। इस का खामियाजा निर्माता शैलेंद्र को भुगतना पड़ा। उनके अपने नीली आंखों वाले दोस्त राज कपूर ने कविराज को उनकी फिल्म ‘तीसरी कसम’ की डेट के लिए तरसा दिया। जो राजकूपर चाहे जब उनके घर दौडक़र पहुंच जाया करते थे , उसी राज का वो सेट पर कई बार घंटों इतंजार करते थे। 

प्रेम में अपनों से चोट खाया हुआ हुआ भावुक इंसान दूसरों को कुछ कहने की बजाय स्वयं को आघात पहुंचाता हैं और शायद शैलेंद्र ने भी खुद को चोट पहुंचाना शुरू कर दिया। जो शराब का प्याला शौकिया उनके लब को छूता था अब वो लत बनकर उनके होंठों से चिपक गया। दिन रात की शराबनोशी ने उनका हाल बेहाल कर दिया। अपने अंतिम दिनों में उनके लिखे गीतों में वे अपनी परिस्थितियों का मानो हवाला सा देते हैं।  जब वे गाइड के लिए कहते हैं “रुलाके गया सपना मेरा।“

उनका फिल्म ‘तीसरी कसम’ से निर्माता होने का मतलब सिनेमा से पैसे की उगाही करना नही था,  वो तो ग्रामीण जीवन के चितेरे कहानीकार मित्र फणीश्वर नाथ रेणु के ग्राम गीत को सिनेमा की शक्ल देना चाहते थे। इस निर्माता होने की कड़ी में निर्देशक के बारे में भी उनका निर्णय भावुकता भरा था। बिमल दा के सहायक रहे बासु भट्टाचार्य से वे वात्सल्य भाव रखते थे। बिमल राय कैंप के कई लोगों ने बासु भट्ट्चार्य को फिल्म के निर्देशन के बागडोर देने के निर्णय को गलत बताया लेकिन वे तो दिल से सोचने वाले व्यक्ति थे। उन्होने ना केवल सबके सुझावों को दरकिनार किया बल्कि बासु भट्टाचार्य को एक निर्माता के तौर पर भरपूर सहयोग किया।  लेकिन यार दोस्तों की बेवफाई के कारण फिल्म को बनने में चार साल लग गए और इस समय में उनकी आर्थिक स्थिति काफी जर्जर हो गई थी। उन्होने फिल्म तीसरी कसम को बनने के बाद वितरकों के हाथों में छोड़ दिया।  ताज्जुब होता है कि एक ऐसा फिल्म निर्माता जो किसी ग्राम गीत को सिनेमा में कहने की शिद्द्त से कोशिश करता है परंतु उसके पहले प्रदर्शन में उपस्थित नहीं हो पाता है। 

 कहना गलत नहीं होगा अपने प्यारे दोस्त के साथ परिस्थितिवश मुंह मोड़ लेने की सजा राजकपूर को भी मिली जब उनकी मृत्यु के कुछ समय बाद रिलीज फिल्म मेरा नाम जोकर को घोर व्यावसायिक असफलता मिली और राजकपूर ने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया था।  विविध भारती पर दिए गए एक साक्षात्कार में उनके पुत्र अभिनेता ऋषि कपूर याद करते हुए कहते हैं, उन दिनों पिताजी अक्सर शराब पीकर शैलेंद्र अंकल और उनकी अंतिम परिस्थितियों के बारे में याद करते हुए बेहद उदास होकर रोने लग जाते थे। बार बार कहते थे कि मैं अपने दोस्त को बचा नहीं पाया।  

शैलेंद्र 14  दिसंबर 1966 जहाने फानी से रुखसत कर गए। पर वो पीछे छोड़ गए गीतों की विरासत जो हमें दशकों तक उनके साथ होने अहसास कराती रहेगी।    

लेखक - धर्मेन्द्र उपाध्याय
 
पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं।   धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनोंं मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं।   
ई मेल आई डी -jprdharmendra@gmail.com
 फोन न- 9667983852, 9928434141

 



Click here to Top