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मुकेश


नक्श लयालपुरी



रविराज पटेल

Old is Gold
गायक की कहानी, गीतकार की ज़ुबानी

गीतकार की जुबानी

गायक की कहानी
 गीतकार की जुबानी

 मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूँगा सदा जैसे सैकड़ों मशहूर गीतों के गीतकार व शायर नक्श लयालपुरी साहब से दर्द भरे आवाज़ के जादूगर पार्श्व गायक  मुकेश की कुछ यादें, कुछ बातेंलिये प्रस्तुत है मूलतः बिहार से युवा फिल्म लेखक एवं कला समीक्षक रविराज पटेल इस विशेष साक्षात्कार में” 

(उस्ताद नक्श लयालपुरी साहब के बारे में इसी feature में पहले सविस्तार लेख हम प्रकाशित कर चुके है जो पाठक यहाँ पढ़ सकते है).  

रविराज : नक्श साब, दर्द भरे आवाज़ के जादूगर पार्श्व गायक मुकेश जी से आपका खास ताल्लुकात रहा है, नायक बनने की इच्छा से उनका बम्बई आना और गायक बन जाना, इस पर आपका संस्मरण चाहूँगा |

नक्श लयालपुरी :   मुकेश जब दिल्ली से बम्बई आये उन दिनों चरित्र अभिनेता और निर्माता मज़हर खान ने अपनी मुस्लिम सोशल फ़िल्म ‘पहली नज़र’(1948) का ऐलान किया था, जिसमें मोतीलाल, मुकेश के क़रीबी रिश्तेदार थे | मुकेश उनसे मिले और फ़िल्म में आने का अपना इरादा जाहिर किया | मोतीलाल ने समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन मुकेश ने एक न सुनी | मजबूर होकर मोतीलाल, मुकेश को संगीतकार अनिल विश्वास के पास ले गए | फ़िल्म ‘पहली नज़र’ का संगीत अनिल विश्वाश दे रहे थे | अनिल विश्वास, मुकेश की आवाज़ सुनकर चौके और उनसे एक गीत गवाने का फैसला कर लिया |  उन दिनों गीत पहले लिखे जाते थे, उनके धुन बाद में बनती थी | गायक और साजिंदों की खूब अभ्यास होती थी | जब गीत उन्हें अच्छी तरह से याद हो जाता था, तब रिकॉर्डिंग होती थी | अनिल विश्वास जी ने गीत की आठ–दस रिहर्सलें  मुकेश जी से करवाकर गीत तैयार किया | रिकॉर्डिंग हुई तो सुनकर लोग अश अश कर उठे | वो गीत डॉ. सफ़दर आह ‘सीतापुरी’ का लिखा हुआ था | उस गीत के बोल थे- 
“दिल जलता है तो जलने दे, आंसू ना बहा फ़रियाद न कर"

रविराज : उन दिनों नये गायकों पर शुरआत में मशहूर गायकों का प्रभाव दीखता था, इस गीत ‘दिल जलता है’ पर सहगल साहब का थोडा असर तो दीखता है?

नक्श लयालपुरी : बिल्कुल मुकेश तो खुद के. एल. सहगल के शैदाई थे | वे उन्हीं के गीत सुनते थे और फिल्मों में आने से पहले महफ़िलों में  उन्हीं के गीत गाया भी  करते थे | अच्छी आवाज़ के साथ उनका चेहरा भी खूबसूरत था | वे के.एल सहगल की तरह  ही फिल्मीं दुनियां पर छा जाने का ख्वाब लेकर बम्बई आये थे | वे के.एल सहगल तो न बन सके लेकिन पार्श्व गायक के तौर पर दिन दिन उनका  मुकाम बनता चला गया | उन्होंने  हजारों  गीत गाये हैं | जब भी फिल्मीं गीतों की तारीख लिखी जायेगी उनके गाये गीत सुनहरी लफ़्ज़ों में लिखे जायेंगें |

रविराज : आपके लिखे गीत और मुकेश जी के साथ कोई खास घटना, जो आज भी आपको रोमांचित करता हो ? 

नक्श लयालपुरी : यूँ तो मेरे बहुत से गीत मुकेश जी ने गाये हैं | फ़िल्म ‘चेतना’ (1970) के गीत रिकॉर्ड होने के बाद जब सुना गया तो सबने मुकेश जी को खूबसूरत आदायगी के लिए मुबारकबाद दी | मुकेश जी कब लिफ्ट से उतर गए किसी को पता न चला | निर्माता उनकी पेमेंट हाथ में लिए उन्हें तलाश कर रहा था कि किसी ने बताया कि वे अभी अभी लिफ्ट से नीचे गए हैं | निर्माता भागता हुआ उनकी कार के पास पहुंचा | वे  कार स्टार्ट कर चुके थे | निर्माता ने दरख्वास्त की हुजुर अपनी पेमेंट तो लेते जाइये | मुकेश जी ने आगे बढाते हुये सिर्फ इतना कहा कि गीत खुबसुरत हो गया है, समझिये  मेरी पेमेंट मुझे मिल गई |  वह गीत मेरा था – मैं तो हर मोड़ पे तुझको दूँगा सदा, मेरी आवाज़ को दर्द के साज़ को ,तू सुने ना सुने ...”

 एक और वाकया है | मैं कल्याण जी आनंद जी के साथ फ़िल्म “निर्लज” के गीत लिख रहा था, उसमें जो गीत मुकेश जी को गाना था, उसका एक मिसरा था – “ जो खामोश रहने की खा ली है तुमने, खुदा के लिए वो क़सम भूल जाओ”

मुकेश जी की रिहर्सल में मैं भी निर्माता के साथ मौजूद था | मुकेश जी गाना याद कर रहे थे कि अचानक कल्याण जी ने मुझसे सवाल किया – नक्श साहब इस कहानी के सभी किरदार हिंदू है | आपने ‘खुदा के लिए’ क्या सोंच कर इस्तेमाल किया है ? इससे पहले कि मैं कुछ जवाब दूँ मुकेश जी बोल उठे अक्सर पढ़े लिखे हिंदू भी मुहावरे के तौर पर ‘खुदा के लिए’ इस्तेमाल करते हैं | अगर नक्श साहब ने इस्तेमाल किया है, तो इसमें बुराई  क्या है ? और शायद फ़िल्म निर्माता युसूफ ने चुटकी लेते हुये कहा – एक मुसलमान निर्माता की फ़िल्म के गीत में से अगर खुदा निकाल जायेगा, तो बाकी क्या रह जायेगा | वह गीत जैसे मैंने लिखा था, वैसे ही रिकॉर्ड हुआ |

(नोट - फ़िल्म 'निर्लज' रिलीज़ नहीं हुई थी, हमे इस गीत का यही एक रिकॉर्ड नेट पर मिल पाया).

रविराज : सुना है, मुकेश जी हार्ट अटैक से उठे होने के बाबजूद आपके गीत गाने को राज़ी हो गए थे, वह भी कम समय में ?  

नक्श लयालपुरी: जी, वह वाकया भी बड़ा दिलचस्प है | संगीतकार बृजभूषण के साथ मैं फ़िल्म ‘मिलाप’ (1972) कर रहा था |  हमलोग फ़िल्म का चौथा यानी आखिरी गीत मोहम्मद रफ़ी साहब की आवाज़ में रिकॉर्ड कर रहे थे | फ़िल्म की शूटिंग बंगलौर में हो रही थी | अचानक बंगलौर से फ़ोन आया – इशारा साहब बात कर रहे थे | उन्होंने फ़रमाया कि मैं सोंचता हूँ फ़िल्म में शत्रुघन सिन्हा के दो रूप हैं, एक रूप के लिए गाना आप रफ़ी साहब की आवाज़ में रिकॉर्ड कर रहे हैं, दूसरे रूप के लिए मुकेश जी की आवाज़ चाहता हूँ और हाँ, एक शर्त और भी है, शत्रुधन सिन्हा चार दिन और मेरे साथ हैं | अगर गाना कल रिकॉर्ड हो जाये तो ही उसे फिल्मा कर फ़िल्म में शामिल किया जा सकेग | मैंने यह कहकर फ़ोन रख दिया कि हम पूरी कोशिश करेंगे | बृजभूषण से मशबरा   किया, उन्होंने रिकॉर्डिंग थियेटर की  पोजीशन पूछी | थियेटर अलगे रोज शाम को चार बजे खाली मिल गया | फिर मुकेश जी को फ़ोन किया उन्होंने भी अगली शाम गाना मंज़ूर कर लिया | बृजभूषण ने मुझसे एक बड़ी काम की बात कही कि गीत का मुखड़ा सोचते वक़्त इस बात का ख्याल रखियेगा कि मुकेश जी हाल ही में हार्ट अटैक से उठे हैं | अगर मुखड़ा टुकडों  में होगा तो मैं धुन में साँस लेने के लिए मुनासिब जगह बना सकूंगा |

रफ़ी साहब की रिकॉर्डिंग खत्म हुई तो चलते वक़्त मैंने उन्हें गीत का मुखड़ा लिख कर दे दिया-

“ कई सदियों से, कई जन्मों से,

तेरे प्यार को तरसे मेरा मन ,

आजा आजा ...कि अधूरा है अपना मिलन”

वादे के मुताबिक रात नौ बजे जब बृजभूषण के घर पहुंचा तो गीत की धुन तैयार थी | मैंने रात साढ़े ग्यारह बजे तक बैठकर पूरा लिखा दूसरी शाम गीत रिकॉर्ड हो गया और उसी रात बंगलौर के लिए रवाना कर दिया गया | मुकेश जी गीत इतने प्यार  से गाये कि वह गीत उनके गाये हुये अच्छे गीतों में शुमार हो गया |

रविराज : आपके मोहल्ले में मुकेश जी स्टेज शो करने गए थे, उसके बारे में कुछ संस्मरण साझा करें कृपया ?

नक्श लयालपुरी: मैं किसी ज़माने में बम्बई के सबर्व मुलुंड में रहा करता था | मेरी खामोश तबियत की वजह से उस बस्ती में सिर्फ चंद फिल्मों के शौकीन नौजवान ही थे जो मुझे जानते थे कि मैं कौन हूँ, क्या हूँ | एक संस्था ने मुकेश जी का एक संगीत कार्यक्रम रखा था |  उस रात  मुकेश जी पंडाल में दाखिल हुये तो लाउडस्पीकर पर मेरा गीत “मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूँगा सदा” बज रहा था | गीत सुनकर उन्हें मेरा नाम याद आ गया और नाम याद आते ही उन्हें यह भी याद आ गया कि मैं उसी बस्ती में रहता हूँ | उन्होंने आयोजक को बुलाकर पूछा कि आपकी बस्ती में हमारे एक शायर नक्श लायलपुरी साहब रहते हैं, क्या आप उन्हें जानते हैं ? उन्होंने कहा जी हाँ, जानता  हूँ | मुकेश जी फिर पूछा- क्या वे इस कार्यक्रम में आयेंगें ? क्या आपने उन्हें बुलाया है ? उन्होंने कहा, आप कहें तो अभी जाकर उन्हें बुला लायें |  मुकेश जी ने  कहा, मैं उनसे मिलना चाहता हूँ | कुछ लड़के कार में सवार हो कर मेरे घर पहुंचे | मैं खाना खाने  बैठा ही था कि अचानक दरवाजे की घंटी  बजी, बीवी ने दरवाजा खोला तो अजनबी चेहरे देखकर घबरा गई | वो बोले कि मुकेश जी ने नक्श साब को याद किया है | मुलुंड में हमलोगों  ने मुकेश जी का कार्यक्रम रखा है | हम माफ़ी चाहते हैं कि आपको दावत नहीं दे सके | मुकेश जी के लिये  आपको हमारे साथ चलना होगा |  मैं खाना खाकर कपडे बदलकर   उनके साथ हो लिया | मुकेश जी मुझे देख कर बहुत  खुश  हुये और कहा कि चारो तरफ अजनबी चेहरे दिखाई दे रहे थे | इसलिए मैंने  आपको ज़हमत दी, माफ़ी चाहता हूँ | कुछ देर गपशप हुई और कार्यक्रम शुरू हो गया | पहले दो गीत उन्होंने आर. के. की फिल्मों के गाये, फिर ऐलान किया कि अब जो गीत मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ उस गीत के शायर आपकी बस्ती के ही रहने वाले हैं |  मैं उनसे दरख्वास्त करूँगा कि वे मंच पर आयें | उन्होंने मेरे दो गीत गाये | उस रात से सारी बस्ती मेरी दीवानी हो गई |


द्वारा रविराज पटेल,
09619545703 / 09470402200,
ravirajpatel.india@gmail.com

साभार - आजकल पत्रिका (यह लेख इसी लेखक द्वारा किसी भिन्न रूप में 'आजकल' पत्रिका में २०१३ में प्रकाशित हुआ था).


संकलन - संजय शर्मा

 

 



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