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निर्देशक


याराना (१९८१)



धर्मेन्द्र उपाध्य

Just One Scene
याराना (1981)

कच्चा पापड़ पक्का पापड़

फिल्म- याराना 1981
एक प्रासंगिक हास्यमय सीन में हास्य पर हास्य चढ़ाना
GAG Building in a Situational Comedy (Sitcom) Scene 

 

निर्देशक राकेश कुमार

राइटिंग क्रेडिट- पटकथा- विजय कौल, संवाद -कादर खान

हिंदी सिनेमा की क्लासिक फिल्मों के क्लासिक सींस की चर्चा तो हम करते ही रहते हैं, लेकिन जरूरी तो यह भी है कि जनमानस की पसंद की मोहर लगी हुई फिल्मों के भी कुछ सींस पर भी चर्चा की जाए , जो अपनी रिलीज के समय भी हिंदी सिनेमा के दर्शकों का दिल जीत ले गए और आज भी यू ट्यूब पर खूब देखे जाते हैं। क्योंकि इन दृष्यों में सिनेमा के सुधि दर्शकों को ही नहीं बल्कि सिनेमा को ज्यादा नहीं समझने वाले इंसान को भी बांधने की क्षमता है। इसलिए Just One Scene की इस कड़ी में इस बार 1981 में रिलीज हुई राकेश कुमार निर्देशित और विजय कौल-कादर खान लिखित फिल्म याराना के कच्चा पापड़-पक्का पापड़ प्रसंग पर चर्चा करना चाहता हूँ।

निस्संदेह याराना मेरी प्रिय हिंदी फिल्मों से एक है। प्रस्तुत सीन ने जिस तरह बचपन में पहली बार टेलीविजन पर इस फिल्म को देखते समय हंसाया था आज मुझे उससे भी ज्यादा हंसाता है। क्योंकि आज समय के साथ इस सीन में छुपी अदृष्य ताकत मेरे लिए और ज्यादा ग्राह्य हो गई है। इस सीन को चुनने की खास वजह है Gag Building या हास्य का अम्बार लगाना. हास्य या कॉमेडी फ़िल्मों में ऐसा काफ़ी बार होता है जिसे सिटकॉम के नाम से भी जाना जाता है, जहाँ पर एक situation यानि प्रसंग फ़िल्म की कहानी में पैदा होता है फिर उसमें एक के बाद एक दिलचस्प वाकये होते है जिससे हास्य बढ़ता जाता है. सिटकॉम का हास्य का ये फ़ॉर्मूला कभी फ़ैल नहीं हो सकता बशर्ते आप उसे सही तरह से ट्रीट करे. हाल ही में प्रदर्शित ‘दिलवाले’ film में भी बाकी कुछ लुभाये या ना लुभाए पर टीवी वाला Gag लोगों को खूब हँसाता है.

खैर तो ‘याराना’ का यह सीन ऊपर से तो मात्र एक गंवई इंसान को बोलने का लहजा सिखाने की मशक्कत है, लेकिन इस सीन में हमें गंवई किरदार के माध्यम से यह भी पता चलता है कि गंवई रंग भी बड़े गहरे होते हैं, चढ़ जाएं तो उतरने का नाम नहीं लेते हैं। क्योंकि उनमें मौलिकता का समावेश होता है। जिस तरह शहर वालों के तौर तरीके और प्रस्तुतिकरण की एक अलग परिभाषा होती है। उसी तरह लोकानुभव और उससे निकले शिगूफे भी अपने आप में तलवार के धार के समान तेज होते हैं।   

किसी भी अच्छे scene या कहानी या joke भी, की तरह इस scene में भी हमारा 3 Act structure तो है ही, जो आपको scene देखने पर समझ आ ही जायेगा.

                   कथानक में दृष्य की पृष्ठभूमि 

अमिताभ बच्चन, नीतू सिंह स्टारर फिल्म याराना की कहानी दो दोस्तों किशन (अमिताभ) और बिशन (अमजद) खान की है। जो वैसे तो एक ही गांव के रहने वाले हैं पर किशन जहां गांव में ही रह गया वहीं बिशन शहर में जाकर पढ लिखकर बड़ा आदमी बन गया। कई साल बाद बिशन अपने दोस्त के पास गांव लौटता है। बिशन अपने दोस्त किशन के बड़बोले अंदाज से तो पहले से ही वाकिफ है पर इस बार वह उसकी सुरीली आवाज का शैदाई हो जाता है। वह उसे अपने पास शहर ले जाकर उसे बड़ा गायक बनाने के सपने देखने लगता है। इधर किशन है कि अपने गांव में ही रहना चाहता है। लेकिन अपने दोस्त की जिद के चलते उसे शहर आना पड़ता है । बिशन जानता है कि उसका दोस्त किशन तो ठेठ गंवार है। इसलिए अगर उसके सुरों को पहचान दिलवानी है तो इसके लिए उसे संगीत की बेहतरीन तालीम भी दिलवानी पड़ेगी। इसके लिए वह उसे शहर में स्थित संगीत विद्यालय ले जाता हैं। संगीत संस्थान की प्रमुख कोमल (नीतू सिंह) जब किशन से मिलती हैं तो पहली मुलाकात में समझ जाती है कि किशन को संगीत की तालीम के साथ उसके उच्चारण दोष को सुधारने की आवश्कता है। वह इसके लिए लिए एक टीचर की व्यवस्था करती हैं।

सीन की शुरुआत कुछ यूं होती हैं कि किशन का उच्चारण सही करवाने के लिए मास्टर जी पास खड़े हैं।  गंवार किशन की स्नानादि कराके वेशभूषा बदल दी गई है। उसके लुक को लेकर कोमल थोड़ी संतुष्ट है। लेकिन उसके उच्चारण दोष को ठीक कराने से पहले उसके बड़बोलेपन से वो खुद परेशान है। क्योंकि गंवार किशन कोमल की किसी बात के पूरे होने से पहले ही बोल पड़ता है।

एक बानगी

कोमल (किशन को घूम फिरकर देखते हुए)- हूं, अब अच्छे लग रहे हो

किशन- हैं, ना, अरे ई तो कुछ भी नहीं है मैमसाब,  हमें जरा एक बार और घिस कर नहाय दीजिए,  फिर देखिए हमार सरीर सोने की तरह चमकने लगेगा। अब का है कि

कोमल (परेशान होते हुए) बस

किशन - मुंह पर चुप्पी

कोमल- मास्टरी आप जरा,  इन्हें पढना लिखना सिखाइए। 

किशन (बात काटते हुए )- पढ़ना आवत है, लिखने में थोड़ा गड़बड़ है, क्योंकि हमार हाथ पिराटीस(प्रैक्टिस) में नहीं हैं।

कोमल- मास्टर जी, आप जरा इनकी जबान सुधारिए, इनका तलफफुज बहुत ही खराब है।

किशन- (बात काटते हुए) अरे का बात करती हैं मैमसाहिब, हमारा तलाफुज तो गांव में सबसे बढिया है। 

सीन के पहले हिस्से में ही निर्देशक राकेश कुमार नायिका कोमल को किशन के बड़बोलेपन से परिचित करा देते हैं। मसलन किशन मास्टर जी और कोमल की आपसी चर्चा से पहले ही खुद ही जुबान खोलकर अपनी खूबियां बता रहा हैं। नायिका कोमल उसे सुधारने के लिए लायी है पर गंवार किशन को यह गुमान है कि वह तो पहले से ही अच्छा है। यहां अमिताभ बच्चन का अभिनय काबिले गौर है कि वो किस तरह बात को रखते हैं। उन्होंने शानदार तरीके से गंवई अंदाज को पकड़ा है। 

आगे सीन और हास्यप्रदायक हो जाता है। मास्टजी किशन की जुबान साफ करने के लिए एक शेर को उससे पढ़वाते हैं। शेर कुछ यूं हैं।

जिंदगी सोज बने साज ना होने पाए।

साजेदिल जब भी बजे आवाज ना होने पाए।

किशन तो पहले ही शब्द जिंदगी को जंदगी बोलता है। दो चार बार परेशान होकर मास्टर जी उसे डांटते हैं तो वह इसका तोड़ मास्टर जी को ही परीक्षा के भंवर में डालकर निकालता है।

मास्टर जी- (गुस्से में) एक लब्ज भी तुम्हारी जुबान से सही नहीं निकलता है।

किशन- अरे कैसे नहीं निकलता है जी, कमाल करते हैं आप,  जो हमार मुंह से निकलता हैं का वो आपके मुंह से निकल सकेगा? चलिए बोलिए हमारे पीछे कच्चा पापड़ पक्का पापड़

मास्टरी जी- अटकते हुए कच्चा पाचड़ पक्का पाचड़

जाहिर है कि गंवई व्याकरण में जुबान साफ करने के लिए बोले जाने वाले इस शब्द पर मास्टर जी अटक जाते हैं। लेकिन वे इसे इसे चुनौती मानते हुए लग जाते हैं और किशन को मुसीबत से छुटकारा मिल जाता है। खासकर यहीं से शहर पर गांव के रंग चढने का एक नजारा मिलता है।

कट टू- थोड़ी देर बाद संगीत विद्यालय की संचालिका कोमल की इंट्री होती है। वो देखती है तो पाती है कि बिल्डिंग का गोरखा, लिफटमैन सभी कच्चा पापड़ पक्का पापड़ रटने में लगे हुए हैं। हद तो तब हो जाती है जब मास्टरी जी भी कच्चा पापड़ पक्का पापड़ रट रहे हैं। कोमल को इस बात से बड़ा झटका लगता है कि जो सीखने आया था, उसे कुछ सिखाने के बजाय सब उसके गंवार अंदाज को सीखने में लग गए।

अब यहाँ पर जो Gag build-up हो रहा है उसपर गौर करें – कैसे एक के बाद एक शख्स इसमें उलझता जा रहा है और कॉमेडी आ रही है. दर्शक के तौर पर हमें इतने सारे लोगों को ऐसा करते देख हास्यास्पद आश्चर्य होता है.

Gag आगे और विकसित होता है जब कोमल अन्दर आती है और मास्टरजी को देख अचंभित होती है और फिर टेबल के नीचे छुपा हुआ किशन बाहर निकल कर आता है।

कोमल- (गुस्से में) तुम यहां पढने आए हो या इन्हें पढाने आए हो?  

किशन- नहीं नहीं, मैं तो इन्हें जुबान साफ करने का आसान तरीका बता रहा था। 

इस पर सीधा किशन मेज पर कहरवा ताल देते हुए कच्चा पापड़- पक्का पापड़ को बिना अटके हुए ताल में बोलता जाता है । इस सीन में ये बात भी निर्देशक साफ कर देते हैं कि जुबान पर अटकने वाले शब्द को अगर ताल में पिरोकर बोला जाए तो वह सहज हो जाता है। जिस प्रकार संस्कृत का कोई क्लिष्ट श्लोक सुर-ताल से सजते ही हिंदी के दोहे जैसा हो जाता है।

लेकिन इसके बाद गुस्से में चुप्पी साधे हुए कोमल को देख किशन खुद को काबू में करता है । दृश्य संगीत ध्वनि के प्रभाव के साथ ही , वो जिंदगी शब्द को सहीं बोलने का प्रयास कर डालता है। वैसे असली सच्चाई ये भी है कि किशन शहर में नहीं रहना चाहता हैं । वो सोचता है कि अगर वह शहर के तौर तरीके, गीत-संगीत में अव्वल नहीं बनेगा तो थक हारकर बिशन उसे वापस उसके गांव भेज देगा।

किसी भी सीन के अंतिम हिस्से में वो बात होनी चाहिए कि अगले सीन के आने के बाद भी कुछ क्षण तक तो पिछला दृष्य मानस पर जमा रहे। इस कड़ी में यह दृश्य बड़ा शानदार बन पड़ा है। Gag building के अंतिम चरण में scene का गियर फिर और उपर जाना चाहिए जो इस scene में भी जाता है और scene एक अनोखे surprise के साथ समाप्त होता है..

कट टू- किशन को मास्टर जी के पास छोड़कर परेशान कोमल अपने केबिन में पहुंचकर कोट उतारती है । लेकिन वो भी इस कच्चा पापड़ पक्का पापड़ के उच्चारण रहस्य को मानो जानना चाहती हैं सो वह भी अपनी जुबान से कच्चा पापड़ -पक्का पापड़ बोलती हैं। लेकिन अटकती है।

कोमल - कच्चा पापड़-पक्का चाचड़, कच्चा पाचड़-पक्का पाचड़

इतने में नायक किशन दरवाज़ा हल्का से खोलकर, अन्दर झांक कर उसको मासूमियत से सही करता है..

किशन- नहीं,नहीं, नहीं,.. .. .. कच्चा पापड़ पक्का पापड़

कोमल- (गुस्से में खिसियाती हुई कोट को दरवाजे की तरफ फेंकती है)

              यू गेट आउट फ्रॉम हियर 

                        (कट)

किशन का इस तरह से कोमल को सही करना दर्शकों को हँसता हुआ छोड़ देता है..

देखने वाली बात यह भी है कि कोमल जो इस मसले पर दुसरे छोर पर थी वो भी किशन के इस बचपने मज़ाक की शिकार हो गयी. यही किसी gag की चरम सीमा होती है जिस पर scene को पहुँचाना लेखक के जिम्मे होता है क्योंकि वो ही उस scene का जनक होता है और उससे बेहतर scene का पूरा विनोद कोई और नहीं निचोड़ सकता है.



धर्मेंद्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं।   धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनोंं मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं।   
ई मेल आई डी -jprdharmendra@gmail.com
 फोन न- 9667983852, 9928434141

 


-Dharmendra Upadhyay

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं।

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