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बम बम बोल रही है काश


विवादित फ़िल्म


From Regional Desk:
प्रियंका चोपड़ा पर
-अश्लीलता का आरोप बेबुनियाद


प्रियंका चोपड़ा पर ऊँगली उठाने से पहले  

अपने समाज और उनके स्टारों की तरफ देखिये

बाजीराव मस्तानी की 'काशी बाई' प्रियंका चोपड़ा अपनी भोजपुरी फ़िल्म 'बम बम बोल रहा है काशी' को लेकर विवादों में है. भोजपुरी सिनेमा से जुड़े बहुतेरे लोग उन्हें भोजपुरी फिल्मों की अश्लीलता के लिए कोस रहे हैं. प्रियंका हिन्दी सिनेमा की स्टार हीरोइन हैं. उनका जन्म जमशेदपुर में हुआ था, जो अब झारखंड का हिस्सा है, लेकिन तब बिहार का हिस्सा था, इसलिए प्रियंका चोपड़ा खुद को बिहारी मानती हैं. प्रियंका खुद को बिहारी मानती हैं, ये अपने आप में बड़ी बात है, क्योंकि कई जन्मजात बिहारियों को आज भी बिहारी कहने-कहलाने में शर्म आती है. बात सिर्फ बिहारी कहलाने की ही नहीं है, बात यह भी रेखांकित करने वाली है कि प्रियंका चोपड़ा ने जब अपनी प्रोडक्शन कम्पनी शुरु की तो शुरुआत बिहार की लोकप्रिय भाषा भोजपुरी में फिल्म बनाने का निर्णय के साथ ही की. इसे मैं प्रियंका का बिहार प्रेम मानता हूँ, बाकी आपको जो मानना हो मानें, स्वतंत्र हैं, क्योंकि बिहार के और भी बहुतेरे फिल्मकार और कलाकार हैं, जो हिन्दी में स्टार हैं, लेकिन कभी भोजपुरी फिल्म बनाने का मन भी नहीं बनाया. शत्रुघ्न सिन्हा अपवाद हैं, जिन्होंने 80 के दशक में “बिहारी बाबू” नाम की भोजपुरी फिल्म बनाई. इसलिए मैं प्रियंका चोपड़ा की तहे दिल से तारीफ करूँगा कि उन्होंने अपनी प्रोडक्शन कम्पनी की शुरुआत भोजपुरी फिल्म से की.

अब बात रही हो रही उनकी आलोचना की, लोग आरोप लगा रहे हैं कि प्रियंका ने "बम बम बोल रहा है काशी" नामक फिल्म बनाकर भोजपुरी सिनेमा की अश्लील छवि को आगे बढ़ाया है. संभव है. लेकिन मैं कुछ सवाल करना चाहूँगा उनसे, जो प्रियंका को राष्ट्रीय स्तर पर कोस रहे हैं. क्या भोजपुरी सिनेमा में अश्लीलता की शुरुआत प्रियंका चोपड़ा ने की है...? क्या प्रियंका की फिल्म आम भोजपुरी फिल्मों से ज्यादा अश्लील है ?

यहाँ अश्लीलता की परिभाषा भी स्पष्ट करता चलूँ. अश्लीलता मतलब क्या..? भोजपुरी फिल्मों में यह द्विअर्थी संवादों और स्त्री देह की नग्नता से जानी जाती है. कुछ लोग फूहड़ता और किसी पर की गई अमर्यादित भद्दी टिप्पणी को भी अश्लीलता के दायरे में रखते हैं. तो यह तो आजकल की हिन्दी फिल्मों में भी खूब रहती है. अभी जिस “उड़ता पंजाब” को लेकर पूरा हिन्दी साहित्य-सिनेमा समाज आन्दोलित है, उसमें भी कई पहलू अश्लीलता के दायरे में है. गालियाँ भले समाज की सच्चाई हो, लेकिन साहित्य और सिनेमा में गालियों को मान्य करना जरूरी है?  साहित्य में भी गालियाँ मान्य हो चुकी हैं और सिनेमा में भी. फिर भोजपुरी सिनेमा में गालियाँ क्यों अश्लील कहलायेंगी..?

दूसरी बात, स्त्री देह का प्रदर्शन कलात्मक और सौन्दर्यपरक माना जाता है. लेकिन वही देह दर्शन भोजपुरी में अश्लीलता कहला जाता है. क्यों ? यह सवाल भोजपुरी फिल्मों से जुड़े लोगों को सालता है. लेकिन यह सच्चाई है कि भोजपुरी फिल्में स्त्री को संवेदना और सौन्दर्य के साथ पेश करने के बजाय माल की तरह पेश करती है और उसे मात्र शारीरिक उपभोग की वस्तु बताती है. यह भोजपुरी सिनेमा का सबसे अधिक भयावह पहलू है. यही वजह है कि पढ़े लिखे और संभ्रांत घरों के लोग भी भोजपुरी फिल्में नहीं देखते हैं और यह सिर्फ टपोरियों, मजदूरो, अनपढ़ों और अशिष्ट लोगों का सिनेमा बनकर रह गया है. अब सवाल है ऎसा क्यों है..?

लम्बे समय से भोजपुरी को संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल करने की मुहिम चल रही है, लेकिन अभी तक भोजपुरी अनुसूची से बाहर है. हालाँकि यह अलग मसला है, लेकिन सच्चाई यह है कि भोजपुरी न सिर्फ बिहार के भोजपुर और पूर्वी उत्तरप्रदेश में बोली जाने वाली भाषा है, बल्कि दुनिया के कई अन्य देशों, यथा मॉरीशस, त्रिनिनाद, फिजी और सूरीनाम आदि देशों में भी बोली जाती है. कुछ देशों में भोजपुरी राष्ट्रीय भाषा के तौर पर भी मान्य है. लेकिन भारत में यह घरों तक सीमित है. घर के बाहर भोजपुरिया लोग भी भोजपुरी नहीं बोलते. बोलते भी हैं,  तो भोजपुरी साहित्य और सिनेमा से उनका जुड़ाव नहीं है. यही वजह है कि भोजपुरी भाषी हिन्दी में साहित्य लिखना या सिनेमा बनाना पसंद करते हैं.

भोजपुरी भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की भी भाषा थी. वह ठेठ भोजपुरिया जिला सीवान के जीरादेई के रहनेवाले थे. कहते हैं, उन्हीं की प्रेरणा से हिन्दी सिनेमा के चर्चित चरित्र अभिनेता नजीर हुसैन ने पहली बार भोजपुरी फिल्म बनाने की शुरुआत की थी. चित्रगुप्त जी ने संगीत दिया था और गीत लिखा था हिन्दी फिल्मों के महान गीतकार शैलेन्द्र जी ने. "गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो" लेखन और मेकिंग के स्तर पर बहुत महान फिल्म नहीं थी, लेकिन उस फिल्म ने उस समय के भोजपुरी समाज की संवेदना और समस्या को गहरे छुआ था. फिल्म सुपरहिट रही थी. उसके बाद बनी फिल्म "लागी नाहीं छूटे राम" अपने विषय और प्रस्तुतिकरण को लेकर “गंगा मैया....” से बेहतर थी. इस फिल्म ने भी अच्छा बिजनेस किया. लेकिन उसके बाद जो फिल्में बनीं, वह विषय के स्तर पर भोजपुरी समाज से जुदा होती चली गईं और हिन्दी फिल्मों की कहानी को मारकर भोजपुरी में कहानी कहने की कोशिश होती रही. प्रजेंटेशन के स्तर पर भी भोजपुरी फिल्में उठने के बजाय गिरती चली गईं. बावजूद इसके भोजपुरी फिल्में अपने सुमधुर गीतों की वजह से घर की महिलाओं के बीच प्रशंसा और प्यार पाती रहीं.

भोजपुरी फिल्मों में अश्लीलता घुसाने का श्रेय 80 के दशक में आई फिल्म "पिया के प्यारी" को जाता है. उसमें एक गीत था, "चक्का चलेला सारी रतिया हो, साढ़े तीन बजे " इस गीत में हुमा खान का बेहद अश्लील चित्रण किया गया था. कैमरामैन का सारा ध्यान हुमा खान के वक्ष पर ही था. हालाँकि उसके बाद भी स्त्री देह का फूहड़ प्रदर्शन कोठे पर नाचनेवालियों तक सीमित था. लेकिन 2000 के बाद भोजपुरी सिनेमा में स्त्री देहों का भोंडा प्रदर्शन स्त्री चरित्रों का मूल हो गया. इसकी बड़ी वजह रही, भोजपुरी समाज में शिक्षा के स्तर पर समाज का वर्गीकरण. एक तरफ वो समाज था, जो पढ़ लिख कर आगे बढ़ रहा था और बाजार में हिन्दी और अंग्रेजी जिसकी अभिव्यक्ति का माध्यम थी. दूसरा समाज वो था, जो अपढ़ था या कम पढ़-लिख कर मजदूरी करने के लिए दिल्ली-मुम्बई-पंजाब और राज्य व देश के अन्य शहरों में पलायन कर गया था. जिसकी भाषा गलत सलत हिन्दी और भोजपुरी थी. बाजार में वह तोड़ जोड़कर हिन्दी बोल लेते थे, लेकिन भोजपुरी में वह ज्यादा सहज थे. परदेश में भोजपुरी फिल्में उन्हें घर-गाँव और ताकत का अहसास कराती थीं. इसी दौर में भोजपुरी गीतों के अलबम खूब प्रचलित हुए. म्यूजिक कम्पनी टी सीरिज ने मजदूर्रों की इस भावनात्मक जरूरत का खूब दोहन किया. और गीतों में द्विअर्थी बोलों और भावों का धड़ल्ले से समावेश होने लगा. नीतीश कुमार की पिछली सरकार के आखिरी साल के मंत्रिमंडल में कला संस्कृति मंत्री बने विनय बिहारी ऎसे गीतों और अलबमों के मुख्य रचनाकार थे.

इन गीतों और अलबमों की लोकप्रियता दिन ब दिन बढ़ती ही गई और गायक के तौर पर उभरे मनोज तिवारी, सुनील बिहारी छैला, दिनेश लाल यादव निरहुआ, पवन सिंह, खेसारी लाल यादव और कल्लु जी. फिल्म “ससुरा बड़ा पैसेवाला” में पहली बार मनोज तिवारी हीरो बने. फिल्म सुपरहिट हो गई, माना गया कि मनोज तिवारी की बतौर गायक लोकप्रियता की वजह से यह फिल्म सफल हुई. मनोज तिवारी स्टार बन गये. 50 लाख तक लेने लगे. इस तरह जब मनोज तिवारी आम निर्माताओं से दूर होते गये तो निर्माताओं ने दूसरे लोकप्रिय गायकों पर दाव लगाना शुरू कर दिया.

इन गायकों की सफलता चूँकि द्विअर्थी गीतों की वजह से ही थी, इसलिए अभिनेता के तौर पर भी उन्हें उसी तरह परोसा गया. इन अलबमों में भाभी, साली जैसे रिश्तों और गाँव की गोरी, पड़ोस की बेटी को माल की तरह देखा गया. गीत के शब्दों में उनकी देह के अंगों के साथ मजे करने के भाव मुख्य तौर पर अभिव्यक्त हो रहे थे, इसलिए फिल्मों में भी उसी तरह की कहानियाँ लिखी जाने लगी और स्त्री देहों का भोंडा प्रदर्शन किया जाने लगा. वह परम्परा आज भी जारी है.

भोजपुरी गीतों में अश्लीलता फिल्मों से कई गुणा ज्यादा है. गाँव जबार से लेकर शहर और इंटरनेट तक ऎसे गीतों की धूम है. आप इंटरनेट पर भोजपुरी गीत सर्च कीजिए, सैकड़ों अश्लील, गंदे और भद्दे गीतों के वीडियो आपके स्क्रीन पर बेखौफ प्रकट हो जायेंगे. भोजपुरी समाज और संस्कृति को बचाने की दुहाई देनेवालों को पहले वैसे प्राइवेट अलबमों पर लगाम लगाने की मुहिम चलानी होगी. भोजपुरी फिल्मों को नग्नता से बचाने और उसकी छवि को सुधारने के लिए मनोज तिवारी, निरहुआ, खेसारी लाल, पवन सिंह और कलुआ को घेरना होगा. इस स्टारों को लेकर ऎसी फिल्में बनानेवाले अभय सिन्हा जैसे निर्माताओं को कोसने-गलियाने की हिम्मत दिखानी होगी. वेव और टी सीरिज जैसी म्यूजिक कम्पनियों के खिलाफ मुहिम छेड़नी होगी. और सबसे जरूरी बात भोजपुरी के मजदूर समाज में स्त्री देहों को लेकर चेतना और संवेदना जगाना होगा. क्या आप इसके लिए तैयार हैं..?

प्रियंका चोपड़ा को गाली देने और उन्हें लानत मलानत भेजने से भोजपुरी सिनेमा का बुरा ही होगा. मुझे लगता है प्रियंका चोपड़ा की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने भोजपुरी में फिल्म बनाने का निर्णय लिया. प्रियंका कितना भी नीचे गिरेंगी, तो भोजपुरी के गिरे हुए स्टारों से ऊपर ही रहेंगी.

 


-Dhananjay Kumar

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