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राजस्थान रॉयल्स की

From Regional Desk:
राजस्थानी सिनेमा
-थोडा है थोड़े की ज़रूरत है


थोडा है थोड़े की ज़रूरत है

 पिछले शुक्रवार को काफी समय बाद ऐसा वक्त आया जब राजस्थान के सिनेमाघरों में राजस्थानी फिल्म कजरारी नखराली हिंदी फिल्मों के साथ रिलीज हुई। चाहे बॉक्स ऑफिस पर रिजल्ट कुछ भी रहे हों पर इस फिल्म ने दिखा दिया है कि राजस्थानी फिल्मों के दीवानों में अपनी भाषा और सिनेमा के लिए जूनून बाकी है।  अब वो दिन दूर नहीं, जब अपने ही लोगों द्वारा बिसरा दिया गया राजस्थानी सिनेमा फिर से अपनी जगह वापिस ले लेगा। क्योंकि आने वाले वक्त में प्रदर्शित होने वाली राजस्थानी फिल्में ना केवल राजस्थान की माटी में सनी है बल्कि तकनीक के स्तर पर भी हिंदी फिल्मों से कम नहीं हैं।

राजस्थानी सिनेमा के कल, आज और कल पर पेश है एक रिपोर्ट

राजस्थानी सिनेमा का सफर

राजस्थानी सिनेमा का निर्माण यूं तो स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व ही होने लगा था।  पहली राजस्थानी फिल्म नजराना थी जिसका निर्माण 1942 में हुआ।   इसके 18 साल के बाद 1961 में दूसरी राजस्थानी फिल्म बाबा सा री लाडली का निर्माण हुआ। 1961 के बाद राजस्थानी सिनेमा का निर्माण धीमी गति से चलता रहा । राजस्थानी सिनेमा के लिए राजस्थान के फायनेंसर जो हिंदी फिल्मों में धन लगाते थे वो राजस्थानी सिनेमा का निर्माण भी करते रहे। लेकिन 80 का दशक राजस्थानी सिनेमा के लिए बहार लेकर आया। 1981 में आई सुपातर बीनणी ने राजस्थानी सिनेमा में धूम मचा दी। इसके बाद राजस्थानी सिनेमा का निर्माण तेजी से हुआ जिसमें वीर तेजाजी, बाई चाली सासरिए, करमा बाई, घर में राज लुगांया कौ, रामू चनणा जैसी फिल्मों को राजस्थान में बसे दर्शकों के अलावा बाहर राजस्थान से बाहर कोलकाता, आसाम जा बसे राजस्थानीयों का खूब प्यार मिला। 

उस जमाने में राजस्थानी फिल्मों के अपने सितारे थे जिनमें अदाकारा नीलू तो मानो राजस्थानी सिनेमा की पहचान बन गई। इन दिनों स्टार प्लस पर दिया बाती और हम में भी भीभईो के किरदार में राजस्थानी संस्कृति का परचम फहरा रही हैं।  इसके अलावा अरविंद कुमार, क्षितिज कुमार, मोहन कटारिया, नाथू सिंह गुर्जर, रमेश तिवारी जैसे कई नाम थे जो उस समय राजस्थानी सिनेमा के जरिए अपनी पहचान रखते थे। राजस्थानी सिनेमा के इस स्वर्णिम दौर में गोविंदा, राकेश रोशन , रजा मुराद, शक्ति कपूर के साथ कई हिंदी फिल्मों में काम करने वाले कई अभिनेताओं ने अभिनय किया।

 90 के दशक के मध्य तक तो राजस्थानी सिनेमा का निर्माण होता रहा पर 90 के उत्तर्राद्ध में राजस्थानी सिनेमा अपनी चमक खोने लगा। इस दौरान कुछ अच्छी फिल्में बनी भी पर उन्हें अच्छी रिलीज ना मिल पाई। नई सदी आते आते तो राजस्थानी सिनेमा के नाम पर सिर्फ वीडियों फिल्में बनने लगीं जो सीडी में कैद होकर देहात में बिकती थीं, जिनके निर्विवाद सितारे थे दीपक मीणा जो पन्या सैपट के नाम से राजस्थान में खूब लोकप्रिय रहे।

 2010 में फिर राजस्थानी सिनेमा के मुकद्दर ने करवट बदली और से फिर से राजस्थानी सिनेमा को सिनेमाघरों में पहुचाने की मुहिम शुरू हुई। जिसमें मुंबई से जयपुर आ बसे निर्देशक लखविंदर सिंह ने खासी भूमिका अदी की। उन्होंने ना केवल राजस्थानी फिल्में बनाई बल्कि सिनेमाघरों तक पहुंचाई। इस कड़ी में माटी का लाल मीणा गुर्जर, भँवरी, हुकुम, और तांडव आदि उल्लेखनीय फिल्में रहीं। 2012 से तो  राजस्थान में राजस्थानी फिल्में फिर से बनने का सिलसिला चल निकला। जो 2016 में रिलीज हुई पहली राजस्थानी फिल्म कजरारी नखराली तक जारी है। 

सिनेमा और सरकार

राजस्थानी सिनेमा के विकास के लिए राजस्थान सरकार द्वारा घोषित पांच लाख के अनुदान को पिछले साल 10 लाख कर दिया है। इसके तहत यू सॢटफिकेट प्राप्त फिल्म को रिलीज से पहले राज्य सरकार अनुदान स्वरूप 10 लाख रुपए देगी। ये अनुदान निर्माताओं के फिल्म बनाने के लिए नहीं बल्कि फिल्म के प्रदर्शन के लिए दिया जाता है। लेकिन राजस्थानी फिल्मों के बढ़ते बजट को देखते हुए ये अनुदान ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रहा है। राजस्थानी सिनेमा से जुड़े लोगों की चाहत है कि अगर अनुदान को बढाकर कम से कम 25 लाख किया जाए तो राजस्थानी फिल्मों का विकास और तेजी पकड़ेगा।

भामाशाहों का साथ

राजस्थानी सिनेमा के वर्तमान का गहराई से अवलोकन करें तो ये भामाशाहों की शै पर ही चल रहा है। कई निर्माता तो ऐसे भी हैं जो राजस्थानी सिनेमा में धन कमाने की आस लेकर नहीं आए, वे तो बस चाहते हैं कि राजस्थानी सिनेमा बनता रहे और हमारी संस्कृति के दर्शन हमारे अपने सिनेमा में हों।

राजस्थानी सिनेमा से जुड़े अभिनेता-निर्माता राहुल सूद के मुताबिक, सबसे बड़ी बात है कि हम अच्छी फिल्में बनाएं। बॉलीवुड की फिल्मों को अपने सिनेमा में ज्यादा ना घुसेड़ें। क्योंकि हमारी राजस्थान की संस्कृति क्या कम है।

निर्माता अभिनेता के रूप में फिल्म थोर बना चुके राहुल सूद का मानना है कि 2016 में राजस्थानी सिनेमा एक लंबी छलांग मारने को आतुर है। सरकार  मल्टीप्लेक्सेज को ताकीद करें कि वो राजस्थानी फिल्मों को निर्माता के साथ साझे में रिलीज करें। अभी सिनेमाघरों को किराए पर लेकर फिल्में रिलीज हो रही हैं जिनसे निर्माताओं पर आर्थिक दबाब बन रहा है।       

भाषायी मान्यता का संघर्ष

 यू तों राजस्थानी भाषा साहित्य की दृष्टि से खूब समृद्ध है लेकिन फिर भी राजस्थानी भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में नहीं होने के कारण सिनेमा को काफी संकट का सामना करना पड़ा रहा है। क्योंकि राजस्थान में अच्छी लोकेशनस् और कहानियाँ है लेकिन उस यथार्थ से लबरेज कंटेट को बॉक्स आफिस को ध्यान में रखते हुए निर्माता सिनेमा में उतारने से दूर हैं। अपने बेहतरीन कंटेट से सजी फिल्म भोभर (2012) के लिए काफी प्रशंसा पा चुके निर्देशक गजेंद्र क्षोत्रिय के मुताबिक, किसी भी सिनेमा के विकास के लिए अच्छा कंटेट होना बेहद जरूरी है। भोभर देश भर के फिल्म फेस्टीवल्स के अलावा विदेशों में आयोजित फिल्म महोत्सवों में प्रदर्शित होने वाली पहली राजस्थानी फिल्म बनी क्योंकि हमने राजस्थानी कहानी को यथार्थ के साथ जोड़कर पेश किया। अगर भाषा को मान्यता मिल जाए तो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की सूची में राजस्थानी फिल्मों को नॉमिनेशन मिले। तभी साहसी फिल्मकार बॉक्स ऑफिस की परवाह किए बिना अच्छे कंटेट को लेकर दर्शकों के सामने आएंगे.

आशाओं के आंगन में

राजस्थानी सिनेमा को साल 2016 से काफी आस है। कजरारी नखराली के बाद पगड़ी, लाड़ली, नानी बाई कौ मायरौ, कंगना, म्हारो घर म्हारो मंदिर, थाने काजलियौ बणालूं, मजौ आ गयौ आदि एसी फिल्में हैं जो इस साल रिलीज होने को तैयार है। । इसके अलावा कई फिल्मों की शूटिंग राजस्थान की लोकेशन पर जल्द शुरू होने वाली है।  जिनमें राजस्थानी सिनेमा के चर्चित सितारे अरविंद कुमार की फिल्म पक्की हीरोगिरी प्रमुख हैं। अरविंद कुमार के मुताबिक, फिल्म पक्की हीरोगिरी भगवान और इंसान के बीच की भावनाओं का बंबडर है। जिसमें आपकों हास्य के साथ मानवीय संवेदनाओं की झलक मिलेगी।

इसी कडी में राजस्थानी सिनेमा के प्रचार प्रसार के लिए जी जान से जुटे अभिनेता- निर्माता राज जांगिंड़ के मुताबिक,  हम सिनेमा को लगातार बेहतरीन करने में जुटे हुए हैं। हम सब लगातार इस प्रयास में हैं कि राजस्थानी सिनेमा को बढावा मिले। इस कड़ी में व्यक्तिगत स्तर पर भी पूरे राजस्थान के सिनेप्रेमियों से मिलकर राजस्थानी सिनेमा से जोड़ने का प्रयास कर रहा हूं।  पिछले काफी अर्से से राजस्थानी सिनेमा से जुड़े रहे लेखक-निर्देशक सुरेश मुदगल के मुताबिक, अब राजस्थानी सिनेमा ऐसे मुकाम पर आ चुका है जहां से तेज गति पकड़ते अब देर ना लगेगी।       

राजस्थानी फिल्मों से जुड़े राजनेता

 राजस्थानी फिल्मों के नए दौर में राजस्थान सरकार से जुड़े नेता भी राजस्थानी फिल्मों में यथोचित अभिनय कर सिनेमा को सहयोग कर रहे हैं। इस कड़ी में राजस्थान राज्य महिला आयोग की अध्यक्षा सुमन शर्मा जल्द रिलीज होने वाली फिल्म कंगना में नजर आएंगी वहीं राजस्थान सरकार के मंत्री राज कुमार रिणवा फिल्म पगड़ी में नजर आएंगे। फिल्म पगड़ी के लेखक- निर्देशक निशांत भारद्वाज के मुताबिक, अच्छी बात है , अगर अभिनेताओं के साथ नेता भी कदम से कदम मिलाकर राजस्थानी सिनेमा को सहयोग करें तो बिगड़ी बातें और जल्द बनेंगी।         

राजस्थानी सिनेमा की नई पौध

एक बार फिर राजस्थान के सिनेमाघरों में नजर आने लगी राजस्थानी फिल्मों में पहले से दिखे रहे अरविंद कुमार, नीलू, क्षितिज कुमार, राज जागिंड़, के अलावा नए कलाकार जिन्होंने कुछ सालों में अपनी पहचान बनाई हैं। इनमें प्रमुख हैं  नेहा श्री, अंदाज खान, श्रवण सागर, प्रतिष्ठा ठाकुर, परी शर्मा, अमिताभ तिवारी, हीरल जैन, ऊषा जैन, सचिन चौबे, इमरान कोहरी, शांतनु सुरौलिया, सिंकदर चौहान, आदि।  

धर्मेंद्र उपाध्याय 

सार

राजस्थान में हर वो बात है जो एक फ़िल्म को ज़रुरी है.. यहाँ के पहरावे में, इमारतों में, असमानों में रंग है; इतिहास है, संस्कृति है, जिससे जन्म लेती एक से बढ़कर एक कहानी है, रोजाना जीवन में भी गीत संगीत है, उत्सव है, और सबसे बड़ी बात पैसों की कोई कमी नहीं है. कुल मिलकर राजस्थान सिनेमा का भी गढ़ है. पर अफ़सोस कि चिराग तले अँधेरा है. इसी वजह से राजस्थानी लोकसंगीत, संस्कृति हिंदी फ़िल्मों / टीवी धारावाहिकों में जमकर छाई रहती है पर अपने ही घर में उसका आभाव हर राजस्थानी को खलता है.
अगर राजस्थानी फिल्मे फिर से जोर शोर से बनने लगे, दूसरी राज्य सरकारों की तरह राजस्थान सरकार भी इन्हें प्रोत्साहन देने के लिए कदम उठाये, तो यहाँ से भी बड़ी बड़ी कहानियाँ सिल्वर स्क्रीन को चार चंद और कई सितारे लगा सकती है.

जाते जाते सुनते जाईये राजस्थान का सदाबहार लोक गीत..

 


-Dharmendra Upadhyay

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं।

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