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From Regional Desk:
भोजपुरी सिनेमा
-सपने , संघर्ष और सफलता


भोजपुरी फिल्मों पर विशेष शोध करने वाले युवा फिल्म लेखक  ,वृत्चित्रकार एवं स्वतंत्र पत्रकार रविराज पटेल के अनुसार कैसे बनी पहली भोजपुरी फिल्म "गंगा मईया तोहे पियरी चढैईबो" जाने इस महत्वपूर्ण लेख में : 

सर्वप्रथम जद्दनबाई ने देखे थे भोजपुरी फ़िल्म बनाने के सपने

यह प्रबल एवं प्रमाणित अवधारणा है कि सिनेमा समाज का आईना होता है | इस आईने में और भी स्पष्ट प्रतिछाया बने, इसके लिए एक सहज सम्प्रेषणशील भाषा की आवश्यकता समझी जाती हैएक ऐसी भाषा जिसमें हर दर्शक अपनी सोंधी माटी की महक आसानी से महसूस कर  उस चित्र में मिश्रित हो सके |

भारतीय सिनेमा  पांच दशक का स्वर्णिम  सफर तय चूका था इस अवधि तक उत्तर पूर्व की लोकप्रिय भाषा भोजपुरी सिनेमा जैसे सशक्त माध्यम तक  अपनी पहुँच नहीं बना पायी थी लेकिन इसकी कल्पना उस समय से होती रही जब हिंदी भी महज किशोरावस्था से निकल कर युवावस्था  को प्राप्त कर रही  थी भोजपुरी सिनेमा के प्रथम इतिहासकार श्री अलोक रंजन जी के अनुसार भोजपुरी सिनेमा का ख्याल सबसे पहले जद्दनबाई (अभिनेता संजय दत्त की नानी) के जहन में आया था इस कड़ी में अभिनेता कन्हैया लाल का भी नाम आता है कन्हैया बनारस से थे तथा  बम्बई फिल्म उद्योग में प्रतिष्ठित एवं विलक्षण कलाकार के रूप में उनकी पहचान थी लेकिन दोनों की कसक अधूरी रह गई |  कारण था, इनकी निजी सीमाएं और उम्रगत विवशताएं |

आएइस बात पर गौर करें कि जद्दनबाई भोजपुरी भाषा में फ़िल्म क्योँ बनाना चाहती थीं? यह साहस उनके अंदर कैसे उत्पन्न हुआ था? तो मालूम होता है कि उन्होंने अपनी जिद्द से सन 1943 ई. में महबूब खान द्वारा निर्देशित फ़िल्म तकदीर’  में एक  ठुमरी रखवाई थी, जो पूर्णतः भोजपुरी भाषा एवं लोकशैली में थी | हिंदी सिनेमा के इतिहास में यह पहली बार हुआ था कि भोजपुरी को किसी सिनेमा के फलक पर  इतना बड़ा स्थान मिला था |  गीत के  बोल थे बाबू दरोगा जी कौन कसूर पर धर लियो सैंया मोर ...’| इस गीत को आवाज़ दी थी शमशाद बेगम ने, गीतकार थे अंजुम पीलीभीतीऔर संगीतकार रफ़ीक गजनवी| अंजुम पीलीभीती को इस  फ़िल्म में यह गीत लिखने की प्रेरणा पूर्वी सम्राट महेंद्र मिसिर के गीतों से मिली थी फ़िल्म सुपरहिट रही थी और यह ठुमरी बेहद लोकप्रिय | इस गीत की  लोकप्रियता ने उन्हें यह सोंचने पर मजबूर किया कि जब इस भाषाशैली में एक गीत अदभुत प्रतिफल दे सकता है, तो अगर इसी भाषामें पूरी फ़िल्म बनाई जाय तब कितनी  धूम मच मचायेगी | ‘तकदीर’  जद्दनबाई  की बेटी एवं मशहूर अदाकारा नर्गिस की बतौर मुख्य नायिका पहली फ़िल्म थी और उनके विपरीत नायक थे मोतीलाल |  

हालाँकि, शोध के दौरान ज्ञात हुआ कि फिल्मों में भोजपुरी गीत संगीत का प्रवेश भारत की संभवतः दूसरी बोलती फ़िल्म इन्दरसभा’ (1932) से ही चुकाथा| जे. जे. मदन द्वारा निर्मित निर्देशित फ़िल्म इन्दरसभामें सबसे अधिक गीतों का विश्वरिकॉर्ड आज भी है, इस फ़िल्म में 72 गाने थे -जिसमें दो गाने भोजपुरी गमक के साथ गाये बजाये  गए थे | गीत के बोल थे सुरतिया दिखाये जाओ ओ बांके छैला...एवं कबसे खड़ी हूँ तेरे द्वार बुलाले मोरे साजन रे ...’ |

       

देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने की हौसला अफजाई

सन 1950 के उत्तरार्ध में बम्बई में एक फिल्म पुरस्कार समारोह आयोजित किया गया था इस समारोह में बतौर मुख्य अतिथि गणतंत्र भारत के प्रथम  तत्कालीन नवनिर्वाचित राष्ट्रपति  डॉ. राजेंद्र प्रसाद उपस्थित हुये थे इसी कार्यक्रम को संबोधित करते हुये उन्होंने कहा था मेरी मातृभाषा भोजपुरी है, हालाँकि साहित्यिक समृद्ध तो नहीं लेकिन सांस्कृतिक विविधता से पूर्ण बहुत ही प्यारी भाषा है अगर  आप फिल्मकारों की पहल इस ओर भी हो तो सबसे ज्यादा खुशी मुझे होगी’ |

Dr Rajendra Prasad Letter

 

उनका यह विचार सुन कर  उपस्थित कई फिल्मकारों में सुगबुगाहट तो हुई, किन्तु सबसे अधिक उद्वेलित जो हुये, वे  थे भोजपुरी माटी के खांटी लाल गाजीपुर (यु.पी.) निवासी एवं चरित्र अभिनेता नज़ीर हुसैन नतीजतन, उसी सभा में उनसे मिल कर उन्हें आश्वस्त किया कि समझिए हम अभी से ही इस दिशा में प्रयत्नशील हो गये हैं इस बात पर राजेंद्र बाबु ने उनसे कहा था कि ‘बात त बहुत नीक बा, बाकी एकरा ला बहुत हिम्मत चाहीं, ओतना हिम्मत होखे त ज़रूर बनायीं, हमार शुभकामना बा’ | 

यह बात नज़ीर साहब को और दृढ संकल्पित कर गयी|

नज़ीर हुसैन एक चरित्र अभिनेता के साथ साथ ख्यातिलब्ध निर्देशक बिमल रॉय के मुख्य सहायक एवं ए.आर.कारदार के साथ फिल्मिस्तान में बतौर लेखक भी संबद्ध थे |

ग्रामीण पृष्ठभूमि में पले बढे होने के कारण ग्राम्य्बोध की कूट उनके रगों में थी अपने इसी बोध के बूते  अपनी सोंधी मिटटी से निर्मित  सांचे में एक ऐसी कहानी को आकार दिया, जिसे सुनते ही भोजपुरी परिवेश में युक्त विवश परिस्थितियों ,समस्याओं, वेदनाओं एवं तपिश की जीती जागती तस्वीर मालूम पड़ती थी | वे  इस पर पटकथा एवं संवाद लिख कर निर्माता के तलाश में निकल पड़े लेकिन भोजपुरी जैसी नयी भाषा में फिल्म बनाने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ इस खोज में अभिनेता असीम कुमार का भी सम्मिलित प्रयास जारी था बिमल रॉय के फिल्मों में एक साथ काम करने एवं बनारस के होने के नाते दोनों में गहन दोस्ती थी यही वजह थी कि फिल्म में मुख्य अभिनेता असीम कुमार ही होंगे, दोनों में यह अटल वादा उसी वक़्त हो गया था

वर्षों बीत गये लेकिन कोई भी निर्माता भोजपुरी में नई लीक गढ़ने की हिम्मत न जुटा सका निर्देशक बिमल रॉय को उनकी यह कहानी बेहद पसंद थी बिमलरॉय नेइसे भोजपुरी में न बना कर  हिंदी में बनाने कि पेशकश की, परन्तु धैर्यवान नज़ीर हुसैन ने इस सम्मानजनक प्रस्ताव की क़द्र करते हुये उनसे माफ़ी मांग ली लगातार भाषा से समझौता कर लेने एवं नकारात्मक सुझाव के बावजूद अपना हौसला बुलंद रखा | भटकाव और बहकाबे को दरकिनार करते हुए नज़ीर साहब दृढ़ता से अक्सर कहा करते थे  ‘इ फिलिमियां चाहे जहिया बनी, बाकि बनी त भोजपुरिये में...’. वहीँ असीम कुमार से जब भी मुलाक़ात होती तो उनसे कहते अरे असिममा! मरदे कोई मिल जाये तs कईसहूं इ फिलिमियां बना लेंतीं ...

 

बच्चा लाल पटेल की कोशिश  

एक दिन अचानक नज़ीर हुसैन से मिलने एक ऐसे सज्जन पुरुष आते हैं, जो जद्दनबाई से प्रेरित होकर खुद ही भोजपुरी फिल्म के सूत्रधार बनने के कल्पनालोक में पूरी तरह खोये हुये थे वह थे, मुंगेर (बिहार), निवासी बच्चालाल पटेलयों तो पटेल ने लंकादहन जैसी कुछ पौराणिक फिल्मों में अभिनय भी किया था,लेकिन मूलतः वे फिल्मों के निर्माण प्रबंधन, नियंत्रण और वितरण कार्यों से सम्बंधित थे इसलिए बिहार ,बंगाल के कई फिल्म वितरकों से उनकी अच्छी खासी जान  पहचान भी  थी बम्बई में नज़ीर हुसैन की भोजपुरी कहानी की चर्चा ही उन्हें उन तक खींच लायी थी |  उन्होंने कहानी सुनी और पसंद भी कर ली बावजूद उसके  बात आगे नहीं बढ़ पायी,क्योँकि पूरी फिल्म बनाने लायक पूंजी बच्चा लाल पटेल प्रबंध नहीं कर सके |

 

गंगा जमुनाने बढ़ाई हिम्मत  

इसी दरम्यान 1  जनवरी 1961 को एक फ़िल्म रिलीज हुई गंगा जमुनाजिसके पूरेपन में अवधी संवादों का प्रयोग था | यह इतिहास में पहली बार हुआ था कि किसी क्षेत्रीय बोली का बोलबाला हिंदी फ़िल्म में थाइस फिल्म ने व्यावसायिक तौर पर  व्यापक सफलता हासिल कीइसके निर्माता दिलीप कुमार के भाई नासिर खां एवं निर्देशक नितिन बोस थे | इस फ़िल्म में नज़ीर साब भी चरित्र अभिनेता रूप में थे.

दिलीप कुमार एवंवैजयंती माला अभिनीत गंगा जमुनाने यह विश्वास कायम कर दिया था कि अगर कोई उत्तर भारतीय बोलियों-भाषाओँ में भी फ़िल्में बनाये तो वह घाटे का सौदा नहीं होगा | आज भी गंगा जमुना के गीत लोगों के जुबान पर उतने ही ताज़ा है जितनेतब थे|   नैन लड़ जैहिहें तो मनवाँ में कसक होइबे करी...(रफ़ी ) किसे याद नहीं होगा?  इतने सफल उदाहरण के बावजूद भी नज़ीर हुसैन के साथ कोई खड़ा होने को तैयार न हुआ |

विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी सिद्ध हुए मसीहा और  बनी गंगा मैया तोहे पियरी चढैईबो

गंगा मैया का पेंटिंग पोस्टर

भोजपुरी में फ़िल्म बने, यह  हिम्मत और हिमाकत जिस व्यक्ति ने की वह बम्बई से लगभग दो हज़ार किलोमीटर दूर गिरिडीह (तत्कालीन बिहार) में कोयला खानों के व्यवसाय से सम्बंधित थे और उन्हें सिनेमा का भी नहीं पता था इस दिलेर हस्ती का नाम विश्वनाथ प्रसाद शाहबादी था | कहा जा सकता है कि बात घूम कर फिर वहीँ पहुंची जहाँ से यह मुहीम शुरू हुई थी | पुनःडॉ. राजेंद्र प्रसाद शाहाबादी जी तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र बाबु के करीबी समर्थक मित्रों से एक थेइस नाते दोनों की अक्सर मुलाकातें होती रहती थी |

हमेशा की तरह उनसे एक मुलाक़ात में अनायास यह चर्चा शुरू हुई कि  ‘अब तक भोजपुरी फिल्म नहीं  बन पायी’ | राजेंद्र बाबु ने वर्षों पहले बम्बई में भेंट हुये नज़ीर हुसैन को याद करते हुये वह संस्मरण साझा किया शाहाबादी जी पक्के एवं सच्चे भोजपुरिया इंसान थे,ऊपर से ठहरे राजेंद्र बाबु के व्यक्तित्व के मुरीद कुल मिला कर भाषा प्रेम ने उन्हें इतना उद्वेलित कर दिया कि वे उसी वक़्त यह फैसला लेने पर मजबूर हो गये, कि हम बहुत जल्द ही बम्बई जा कर नज़ीर हुसैन से मिलेंगे |  परेशानी बस इतनी थी कि नज़ीर हुसैन बम्बई में रहते हैं, लेकिन कहाँ रहते हैं, यह पता ठिकाना नामालूम था फिर भी सन 1961 के वर्षांत में एक दिन अपने एक मित्र के साथ रेल गाड़ी में बैठ पटना से बम्बई के लिए रवाना हो गये | शाहाबादी जी अपने मन में दो विचार लेकर बम्बई रवाना हुए थे | एक तो यह कि अगर नज़ीर साहब मिल गए और उनके साथ बात बन गई तो फ़िल्म निर्माण करेंगे, दूसरी बात यह कि अगर नहीं मिले या मिले भी तो बात नहीं बनी सकी तो वैसे स्थिति में कोई फ़िल्म खरीद कर फ़िल्म वितरण का व्यवसाय करने पर विचार करेंगे  और पहुँच गए बम्बई ‘ |  वे  बम्बई के दादर स्थित चर्चित गेस्ट हॉउस प्रीतम होटल में ठहरे |  इसी होटल में इसलिए क्यूँकि यहाँ आने के पूर्ववे यह भी जानकारी लेकर आये थे कि यह होटल महज एक होटल नहीं, बल्कि फ़िल्मी लोगों का एक चौकड़ी भी है यह होटल सस्ता स्वादिष्ट चाय ,नास्ता एवं खाना मिलने के साथ साथ ठहरने की उत्तम व्यवस्था के लिए मशहूर थीयहाँ ठहरने का इंतजाम ऊपर तथा चाय चौकड़ी नीचे में लगती थी शाहाबादी जी के  विवेक में यहाँ से नज़ीर साहब को ढूँढना शायद आसान होगा इसलिए यहीं ठहरे  | स्थानीय पूछताछ के क्रम में पता चला कि यहीं पास में ही एक फिल्म स्टूडियो है जहाँ हर रोज किसी न किसी फिल्म की  शूटिंग चलती रहती है, वहाँ नज़ीर साहब का अक्सर आना जाना भी होता है वे घूमते टहलते स्टूडियो पहुंच गए तो देखा कि सचमुच वहाँ किसी फिल्म की  शूटिंग चल रही है |  वे अपने मित्र के साथ कहीं  किनारे खड़े हो कर शूटिंग देख कर रोमांचित हो रहे थे, साथ ही उनकी नज़रें नज़ीर साहब को ढूँढ रही थी | लेकिन नज़ीर साहब कहीं नज़र नहीं आये | वे उस स्टूडियो में नज़ीर साहब के बारे में किसी से पूछते भी तो बहुत सोंच समझ कर क्यूँकि उनके मन में यह आशंका थी कि कहीं बिहारी होने का खामियाजा न भुगतना पड़ जाये उनका लिबास (धोती ,कुर्ता ,गमछा) एवं भाषाई उच्चारण यह स्पष्ट कर दे रहा था कि वह बिहार के  भोजपुरी भाषी व्यक्ति हैं लगभग तीन चार दिनों के शिद्दत इंतज़ार के बाद उसी स्टूडियो में नज़ीर साहब से उनकी मुलाक़ात हुई | शाहाबादी जी का प्रयोजन सुन नज़ीर साहब को खुशी का ठिकाना न रहा उनके चेहरे खिल उठे थे | नज़ीर साहब के लिये तो यह एक ईश्वरीय चमत्कार जैसा था | नजीर साहब ने उन्हें कहानी सुनाई, सुनते ही शाहाबादी जी को कहानी घर कर गई और संकल्पित भाव से नज़ीर साहब को अटल वादा करते हुए उन्हें हरी झंडी दे दी | हालाँकि उनके कुछ करीबी लोगों ने शाहाबादी जी को गैर फ़िल्मी लोग समझते हुये यह जोखिम लेने से मना भी  किया | लेकिन उन्होंने किसी की एक न सुनी हँलांकि  ‘गंगा जमुनाकी अपार सफलता भी उन्हें अब काफी बल दे रही थी | उसी प्रीतम होटल के एक कमरे में पहली भोजपुरी फ़िल्म के निर्माण पर लगभग हफ्ते भर बैठकें चलीं |  बैठक में नज़ीर साहब ने जब  शाहाबादी जी से फ़िल्म पर उदगार  माँगा तो उन्होंने सिर्फ एक ही बात को  पुरजोर तरीके से कहा कि सम्बंधित कलाकारों में वही हों जो भोजपुरी भाषा एवं संस्कृति से भिज्ञ हों, जिसे नज़ीर साहब ने भरपूर तबज्जो दि| फलस्वरूप , उसी मानसिकता और मापदंड के आधार पर कलाकारों का चयन किया गया |

फ़िल्म के मुख्य पात्र असीम कुमार बंगाली परिवार से ज़रूर थे लेकिन बनारस में पले बढे थे | कुमकुम तत्कालीन हिंदी फिल्मों के शिखर पर बिहार की प्रतिनिधि अदाकारा थीं,जो तत्कालीन मुंगेर जिला एवं वतर्मान में शेखपुरा जिला स्थित हुसैनाबाद नामक रियासत से सम्बंधित थीं पद्मा खन्ना भी बनारस से  थीं और यह उनकी परिचयात्मक फ़िल्म थी जिसमें वह कुमारी पद्मा के नाम से फिल्मों में प्रवेश  कीं | चरित्र अभिनेता रामायण तिवारी पटना जिला अंतर्गत मनेर से तो भगवान सिन्हा पटना से थे | लीला मिश्रा उत्तर प्रदेश की तो स्वयं नज़ीर साहब गाजीपुर के समीप उसिया ग्राम के वासी थे |

किसी ज़माने में गीतकार शैलेन्द्र ने अपना  काफी वक्त शाहाबाद प्रक्षेत्र में बिताया  हुआ था तो वहीँ तत्कालीन हिंदी सिनेमा जगत के संगीतकार  जमात  में सबसे पढ़े लिखे एवं पटना विश्वविद्यालय में व्याख्याता  रह चुके संगीतकार चित्रगुप्त गोपालगंज जिले के कमरैनी गांव के निवासी थे गायिकी विभाग पर बात करें तो चित्रगुप्त के संगीत में लता मंगेशकर इतनी सहज होती थीं कि उन्होंने ही यहाँ भी अपनी माधुर्यता से उनका साथ दिया | इतिहासकार कहते हैं कि लता जी ने इस फ़िल्म में गाने के लिए चित्रगुप्त जी से कोई रूपये-पैसों का मांग नहीं कीं थी |उनकी चाहत केवल  चित्रगुप्त जी की सुमधुर धुन को स्वर देना था | हालाँकि निर्माता द्वारा उन्हें पारिश्रमिक दिया गया था | इसी प्रकार मो. रफ़ी, उषा मंगेशकर एवं सुमन कल्याणपुर से इस फ़िल्म को अतुलनीय स्वर सहयोग मिला

 दुबारा फिर उस बैठक में चलते हैं जहाँ फ़िल्म के आकार विस्तार पर चर्चा हो रही थी प्रीतम होटलके उस कमरे में बातचीत का सिलसिला जारी था कि उसी बीच होटल के गलियारे में एक युवक गुजरते हुये कमरे के खिड़की से दिखाई पड़ा| नज़ीर साहब उस युवक की ओर इशारे करते हुये  विश्वनाथजी से कहते हैं - की   लईकबा के देखा तनी, बहुते होनहार लईका बा, इ भी आपन बनारसे के बा, सोंचा तनी इ फिलिम के निर्देशन ऐकरे से कराईं ...वह लड़का थेकुन्दन कुमारजी, जिन्होंने वास्तव में इस ऐतिहासिक फिल्म गंगा मैया तोहे पियरी चढैईबोका जीवंत निर्देशन किया | इसके पूर्व कुन्दन कुमार कई और हिन्दी फिल्मों का निर्देशन कर चुके थे |

हफ्ता-दस दिनों का समय लगा होगा , जिसमें लगभग कलाकारों का चयन एवं शूटिंग स्थल तय करने के बाद फ़िल्म का कुल बजट हुआ एक लाख पचास हज़ार रूपये किन्तु फिल्म पूरी होने तक यह बजट पूर्व निर्धारित से तीन गुना से भी अधिक यानि पांच लाख रूपये तक चला गया |

मुकम्मल तैयारी के पश्चात 16 फरवरी 1961 को बिहार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री सत्येन्द्र नारायण सिन्हा एवं उनकी धर्मपत्नी किशोरी सिन्हा जी के उपस्थिति में इस फिल्म का शुभ मुहूर्त पटना स्थित शहीद स्मारक परिसर में संपन्न हुई, जहाँ फिल्म में अभिनेत्री कुमकुम के साथ चरित्र अभिनेता नज़ीर हुसैन तथा मुख्य अभिनेता असीम कुमार का अकेले छोटे से दृश्यों का फिल्मांकन भी किया गया | बाद में, संपादक यहाँ लिए गए दृश्यों में केवल असीम कुमार का ही दृश्य फ़िल्म में शामिल कर पाये |  इसके बाद फिल्म की आउटडोर शूटिंग मनेर (पटना) में हुई | जहाँपंचायत ,ताड़ीखाना (निरालय) तथा पालकी आदि के दृश्यों को फिल्माया गया वहीँवाराणसी में गंगा घाट,कबीर चौरा, चौक आदि के आलावा गाजीपुर में भी फिल्म के कुछ महत्वपूर्ण दृश्यों को कैमरे में समेटा गया आधिकांश शूटिंग बम्बई के प्रकाश तथा श्रीकांत स्टूडियो में की गई थी |

गंगा मैया तोहे पियरी चढैईबोको बनने में कुल अवधि लगभग एक वर्ष लगी थी | इस फ़िल्म को सेंसरप्रमाण पत्र 27 नवंबर 1962  को मिला | इसके पूर्व एक रोचक तथ्य यह कि पटना फ़िल्म सोसाइटी (वर्तमान सिने सोसाइटी ,पटना’ ) की संस्थापिका विजया मुले जी बम्बई सेंसर बोर्ड में तत्कालीन पीठासीन पदाधिकारी थीं और इन्होनेही इस फ़िल्म को देख कर प्रमाण पत्र निर्गत हेतु अध्यक्ष को अग्रसारित किया था | इस फ़िल्म को U ,35 एम.एम. के साथ सेंसर प्रमाण पत्र संख्या 37056 / 1962  इंगित प्राप्त हुआ  |

पूरी तरह से तैयार फिल्म निर्माता विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी ने तत्कालीन पूर्व  राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी को समर्पित की और समर्पण तिथि 21 फरवरी 1963 को ही पटना स्थित कांग्रेस मुख्यालय सदाकत आश्रम में इसका उदघाटन प्रदर्शन भी हुआ| उन दिनों कलकत्ता की मशहूर फ़िल्म वितरण कंपनी कृति फिल्म्स में जमालपुर (बिहार) निवासी श्री आनंदी मंडल जी बतौर प्रबंधक कार्यरत थे, इन्होनें ही इस फ़िल्म को रिलीज भी किया था.फ़िल्म22 फरवरी 1963 को वीणा सिनेमा पटना में लगी और लगातार उन्नीस सप्ताह तक चली चली थी| वहीँ वीणा सिनेमा के मालिक श्री बिरेन्द्र कुमार सिन्हा उर्फ  हिरा बाबू आँखों देखा हाल बताते हैं कि हॉल की बैठक क्षमता से चारगुना अधिक दर्शक बाहर इंतज़ार कर रहे होते थे “गंगा मैया...” को देखने के लिए | रिलीज के कुछ ही दिनों बाद कलकत्ता के हिन्द सिनेमा में भी लगी जहाँ इस फ़िल्म को अनगिनत भाषाओँ के दर्शकों का स्नेह मिला | दिन दुगुनी रात चौगुनी जैसी व्यावसायिक सफलता से अभिभूत निर्माता विश्वनाथ शाहाबादी जी और नज़ीर साहब के व्यतिगत संबन्ध पर 4 अप्रैल 1963 को प्रकाश सिनेमा (अब बंद हो चूका है ),लहुराबीर, वाराणसी में भी लगी

एक महत्वपूर्ण संस्मरण यह भी है कि फ़िल्म के रिलीज के तीसरे दिन यानि 25 फरवरी 1963 को डॉ. राजेंद्र बाबु ने सदाकत आश्रम से ही इस फिल्म को बधाई देते हुये एक प्रसंशा पत्र लिखा था और मौखिक तौर पर 1 मार्च 1963 को आश्रम में ही फिल्म के तमाम कलाकारों से मिलने की तिथि तय की थी लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था.इस निर्धारित तिथि के ठीक एक दिन पूर्व यानि 28 फरवरी 1963 को ही उनकी  ह्रदय गति रुक गई और हमारे देशरत्न अमरत्व को प्राप्त कर गये | निर्धारित तिथि 1 मार्च को ध्यान में रखते हुए फ़िल्म के अधिकांश कलाकार दल के सदस्यगण पटना में मौजूद थे, लेकिन दुःख ये कि जिस तिथि को उनके साथ खट्टे मीठे अनुभव साझा करने थे , ठीक उसी तिथि को उन्हें उनकी अंत्येष्ठी में शामिल होना पड़ा | उनके शोक में एक दिन के लिए  गंगा मैया तोहे पियरी चढैईबोका प्रदर्शन पूर्णतः बंद रहा था| उसके बाद प्रदर्शन के प्रथम दिन के सभी शो के प्रारंभ में दर्शक सहित 1  मिनट का मौन धारण रखने के साथ गंगा मैया... देख पाए थे |

गंगा तट पर बसे  देवभूमि बनारस के बारे में प्रतक्ष्यदर्शी बताते हैं कि आलम यह हो गया था कि प्रकाश सिनेमा के बाहर मेले जैसा दृश्य बना रहता था | लोग दूर दराज से खाना, बिछावन के साथ एक दिन पूर्व ही सिनेमा हॉल परिसर में डेरा जमा कर इसे देखने के लिए इंतज़ार करते थेअवसर आते ही समस्त परिवार के साथ देखते और फिल्म के किसी न किसी पक्ष को अपने जीवन से जोड़ते  हुये  बाहर आते थे उस समय एक नयी कहावत भी चल पड़ी थी  गंगा नहा, बिसनाथ दरसन करा, गंगा मैया देखा, तब घरे जा ...  

  कहा यह भी जाता है कि बनारस से इस फ़िल्म की गूंज विश्व भर में गुंजायमान हुई कुमकुम की करुणा, असीम का अभिनय, नज़ीर के मुरीद कौन नहीं हुये थे? वहीँ इस फिल्म में शैलेंद्र के गीत और चित्रगुप्त के संगीत ने भी लोगों को कभी भाव विह्वल किया तो कभी खूब खिलखिलाया | सकी संदेशात्मक लोकप्रियता एवं आकर्षण का ही प्रतिफल कहें की तत्कालीन पूर्व केन्द्रीय विदेश एवं गृह मंत्री लालबहादुर शास्त्री (बाद में देश के द्वितीय प्रधानमंत्री बने) , केन्द्रीय सुचना एवं प्रसारण तथा संसदीय कार्य मंत्री सत्यनारायण सिन्हा  एवं परिवहन मंत्री जगजीवन राम जी जैसे विभूतियों ने भी इसे देखने की इच्छा जाहिर की थी फलतः 11 अक्टूबर 1963 को दिल्ली के गोलचा सिनेमा में इसका विशेष प्रदर्शन आयोजित  कीया गयाथाफिल्म की कहानी इतनी प्रभावक और ह्रदय विरादक थी कि शो के दौरान उन सभी राजनेताओं की आँखे नम होती देखी गई थी |

गोलचा सिनेमा दिल्ली में गंगा मैया देखने के बाद अपने उदगार व्यक्त करते लाल बहादुर शास्त्री

इसके पूर्व इस फिल्म को बिहार के तत्कालीन तृतीय मुख्यमंत्री विनोदानंद झा, वित्त मंत्री अम्बिका शरण सिंह आदि नेताओं का सहयोग,सराहना एवं सहानुभूति प्राप्त हो चुके थे |

भोजपुरी भाषा में बनी यह पहली फिल्म किसी भी अन्य भाषाओँ के मुकाबले में कम सफलता एवं लोकप्रियता ही हासिल नहीं की थीबल्कि समाज में दहेज, बेमेल विवाह, विधवा विवाह, सामंती विचारों, सूदखोरी, शिक्षा एक सामाजिक जिम्मेदारी तथा अन्धविश्वास परम्पराओं से उत्पन्न सामाजिक समस्याओं का एक ऐसा वास्तविक और संवेदनशील चित्र उपस्थित किया कि दर्शकों को यह महज एक फिल्म नहीं बल्कि अपनी ही जिंदगी कि अनकही कहानी लगी

 

सम्पर्क : ravirajpatel.india@gmail.com +91-9619545703 / 09470402200 


-रविराज पटेल

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