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लक्ष्मण शाहाबादी






जितेन्द्र सुमन

From Regional Desk:
लक्ष्मण शाहाबादी
-भोजपुरी सिनेमा की अप्रतिम शख्सियत


लक्ष्मण शाहाबादी भोजपुरी सिनेमा की अप्रतिम शख्सियत थे. पहले गीतकार, फिर स्क्रिप्ट राइटर और फिर संगीतकार. तीनों विधाओं में उन्होंने अपना लोहा मनवाया. एक फिल्म दुल्हा गंगा पार के का निर्माण भी किया. भोजपुरी फिल्मों की सफलता में गीत संगीत का अद्भुत रोल रहा है. लक्ष्मण शाहाबादी वह व्यक्ति थे, जिनके लिखे गीतों ने कई फिल्मों की सफलता को बुलंदी पर पहुँचाया, संगीतकार के तौर पर भी उन्होंने ऎसी कई फिल्में दीं, जिनके गाने आज भी सुपरहिट और कर्णप्रिय हैं. उन्होंने 40 से अधिक भोजपुरी फिल्मों के लिए गीत लिखे. आज यानी 19 दिसंबर को उनकी पुण्यतिथि है, इसी बहाने हम उन्हें याद कर रहे हैं, श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं. पढ़िए लेखन में उनके सहयोगी स्क्रिप्ट राइटर जितेन्द्र सुमन की यादें.

लक्ष्मण शाहाबादी यानी सबके भईया...! मृदुभाषी, मिलनसार, पहली मुलाक़ात में सबको अपना बना लेने वाला व्यक्तित्व...! शब्द और सरगम के अद्भुत मेल वाला व्यक्तित्व...!

आज पच्चीस वर्ष हो गए, उन्हें इस संसार से गए, पर आज भी वो जीवित हैं हमारी यादों में, अपनी उन्हीं दमदार उपस्थिति के साथ, तो कुछ न कुछ बात तो होगी ही...! मेरा सौभाग्य रहा कि मैंने अपना फ़िल्मी करियर उनके ही सान्निध्य में शुरू किया. हम दोनों एक ही शहर आरा के रहने वाले थे. मध्यम वर्गीय नौकरीपेशा वाले परिवार से थे लक्ष्मण भईया. गाने-बजाने में उनकी सानी नहीं थी उन दिनों. बहुचर्चित नाम था उनका, जिसके कारण उनके ऊपर उनके वरीय अफसरों की कडाई नहीं रहती थी. एक तरह से ऑफिस की शान थे वो. भोजपुरी जन मानस के वे चहेते कलाकार थे. उनकी फ़िल्मी यात्रा शुरू हुई धरती मईया से, जिसे हमारे ही शहर के फिल्म वितरक-निर्माता स्व. अशोक चंद जैन ने बनायी थी. जैन साहब की बतौर निर्माता यह पहली फिल्म थी, इससे पहले वह फिल्म डिस्टीब्यूशन से जुड़े हुए थे. चूंकि लक्ष्मण शाहाबादीजी की लोक गीत संगीत पर अच्छी पकड़ थी, सो जैन साहब ने उन्हें अपने साथ रखा और गीत लिखवाया. संगीतकार थे भोजपुरी फिल्मों के महान संगीतकार चित्रगुप्त. गीत अच्छे बने, फिल्म अच्छी चली और कामयाबी का सेहरा लक्ष्मणजी के सर भी बंधा. फिर जैन साहब ने दूसरी फिल्म बनायी गंगा किनारे मोरा गाँव, जिसके गाने लिखने की ज़िम्मेदारी फिर लक्ष्मणजी ने ही उठायी और इस फिल्म ने डायमंड जुबिली सफलता हासिल की. भोजपुरी फिल्म इतिहास की यह आजतक की सबसे बड़ी हिट फिल्म है. फिल्म की सफलता का श्रेय एक बार फिर लक्ष्मण जी को मिला. सबने गाने की तारीफ़ की और आज भी उन गानों की तारीफ़ होती है.

माटी की महक को अगरबत्ती की खुशबू की तरह फैलाना लक्ष्मणजी की कला थी. कारण था कि वे भोजपुरी की माटी की महक और महत्ता को गहराई से समझते थे. उन्हें पता था भोजपुरी की ताकत का, उसके असर का. खोजी प्रवृत्ति थी उनकी. बहुत कुछ जानने के बावजूद उन्हें मैंने देखा है पुरानी पीढी के लोगों से घंटों बातें किया करते थे. लोकोक्तियों मुहावरों को जानने और निकालने की कोशिश करते हुए. उन दो फिल्मों के बाद कई निर्माताओं की फिल्मों के लिए गाने लिखे, कुछ के लिए स्क्रिप्ट भी लिखी और लगभग सारी फिल्में सफल रहीं. गाने न सिर्फ हिट सुपरहिट हुए, बल्कि कालजयी भी रहे.

लक्ष्मणजी में किसी भी चीज़ को जानने की अद्भुत लगन थी. जिसमें जुड़ते और जिससे जुड़ते, डूब कर जुड़ते. सतही काम करते हुए मैंने उन्हें कभी नहीं देखा. दो फिल्मों के निर्माण के क्रम में लक्ष्मणजी तबकी बंबई से भी परिचित हो चुके थे और फिल्म निर्माण की प्रक्रिया से भी. संगीतकार को संगीत बनाने में भी उनसे काफी मदद मिलती थी. गीतकार के तौर पर अबतक उनकी अच्छी खासी पहचान बन गयी थी. हर व्यक्ति एक सीढ़ी के बाद दूसरी सीढ़ी चढ़ना चाहता है, सो उनके मन में भी यह इच्छा जागी और उन्होंने संगीतकार बनाने की दिशा में सोचना शुरू किया. इसी दौरान अशोक चंद जैन अपनी तीसरी फिल्म का प्रपोजल लेकर उनके पास पहुंचे. उन्होंने जैन साहब से गीत के साथ-साथ संगीत देने की भी बात कही. लेकिन जैन साहब ने उनका यह प्रस्ताव यह कहकर ठुकरा दिया कि तुम्हारा वह क्षेत्र नहीं है, तुम नए हो और नए के साथ संगीत बनाना रिस्क है और मैं वह रिस्क नहीं लूंगा. लक्ष्मणजी के यह कहने के बाद भी कि जैन साहब आप ने तो संगीत बनाने में मेरे योगदान को देखा है, फिर कैसा रिस्क ? लेकिन जैन साहब ने उनकी बात नहीं मानी.

और यही वह बिन्दु था, जहां से जन्म हुआ एक जिद्दी और जुनूनी संगीतकार लक्षमण शाहाबादी का. और बीज पडा दुल्हा गंगा पार के का. हम चार दोस्त मिले. बातें हुईं, योजना बनी और सब करने लगे मेहनत. उस दौरान मैं रंगमंच पर अभिनय किया करता था. उन्होंने मेरे कई नाटकों को देखा था,  मेरी अभिनय प्रतिभा से वह खूब प्रभावित भी थे. लेकिन जब मैंने जब सिनेमा में अपनी दिलचस्पी उनके सा,मने प्रकट की, तो उन्होंने मुझे अपने साथ राइटिंग में रख लिया. और फिल्म के निर्देशक राजकुमार शर्माजी के हाथों में सौंप दिया यह कहकर कि ये मेरा छोटा भाई है इसे डायरेक्शन सिखाइए. और इस प्रकार मेरी फ़िल्मी यात्रा यहाँ से शुरू हुई. इस सन्दर्भ का आशय केवल इतना है कि एज अ मार्गदर्शक, एज अ मेंटर उन्हें पता था कि किसमें क्या प्रतिभा है ! वह किस दिशा में जाए तो क्या प्राप्त करेगा, यह परखने की दृष्टि थी विलक्षण दृष्टि थी उनमें. कई कवियों गीतकारों को मैंने देखा है उनसे दिशा लेते हुए. उनमें से एक नाम याद आ रहा है ब्रज किशोर दुबेजी का, जिन्होंने बाद में कई फिल्मों में गाने लिखे.

काम के इतने धुनी कि समय की परवाह तक नहीं रहती. साथ रहकर मैंने अनुभव किया कि गीत हो या  संगीत हो, जबतक उसे अंजाम तक नहीं पहुंचा देते, शांत नहीं बैठते थे. दिन रात उसीमें डूबे रहते. कोई आता तो उसे सुनाते, उसकी राय लेते. फिर जब मुतमईन हो जाते, तब उसकी डेलिवरी करते. सृजनकर्ता की प्रसव-वेदना की अनुभूति मुझे उनको ही देखकर हुई.

दुल्हा गंगा पार के रिलीज हुई. हिट हुई. गाने आज भी सदाबहार हैं. लक्ष्मणजी को मेलडी का मास्टर कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी.

उसके बाद फिर दूसरी फिल्म तो नहीं बना पाए पर फिल्मों में गीत संगीत देते रहे. कुछ बड़ा, मेहनत वाला काम न कर पाने के पीछे उनकी अस्वस्थता एक बड़ा कारण बनी.

रिश्तों और भावनाओं की उनकी नज़र में बहुत क़द्र थी. उनको दरकिनार कर या उन्हें दांव पर रखकर कभी काम नहीं किया. और ऐसा केवल वह अपने लिए ही नहीं सोचते थे अपने साथ काम करने वाले की भावनाओं का भी ख़याल रखते थे कि उसकी भावनाओं को भी कोई ठेस न पहुंचे. अपने जीवन के अंतिम समय में, जब स्वास्थ्य बिल्कुल ही साथ नहीं दे रहा था और पैसे काम से ही आते. इसलिए उन्होंने काम पकड़ा भी. करना शुरू किया पर अपने साथी लेखक के साथ प्रोड्यूसर के भावनाहीन व्यवहार के कारण काम छोड़ दिया और वापस रांची से आरा चले आए. उसके बाद उनकी तबीयत दिनोंदिन बिगड़ती ही गयी और अंततः आज से पच्चीस वर्ष पूर्व आज ही के दिन हम सबसे विदा हो गए...एक अपूरणीय क्षति हुई भोजपुरी समाज को. भोजपुरी फिल्म जगत को...!

उस महान विभूति को मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि....


-Dhananjay Kumar

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