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Rajasthan Film Festival


प्रमुख अतिथि


From Regional Desk:
राजस्थान फिल्म महोत्सव २०१६
-Rajasthan film festival 2016


शब्दों के मामले में सिमट रहे हैं हम - जावेद अखतर

(राजस्थानी सिनेमा के कलाकारों, फिल्मकारों और तकनिशियनों से मुखातिब हुए जावेद अखतर)

“हम शब्दों के मामले में सिमटते जा रहे हैं। शायद भाषा के विकास में ये बड़ी परेशानी है। हम अपनी बात को कहने के लिए एक निंश्चित शब्दकोश के इर्दगिर्द ही अपनी जुबान को फैलाते रहते हैं। भाषा के बुरे दौर में यह बहुत जरूरी है कि हम अपना जुबानी शब्द कोष विस्तृत करें।“ यह विचार हिंदी सिनेमा के जाने माने लेखक जावेद अख्तर ने शनिवार को जयपुर में आयोजित राजस्थान फिल्म फेस्टीवल में प्रकट किए। समारोह में प्रमुख अतिथि के तौर पर आमंत्रित जावेद साहब से वरिष्ठ फिल्म पत्रकार कोमल नाहटा ने संवाद किया । पेश है बातचीत के प्रमुख अंश

 जज्बात से बनता है सफल सिनेमा

सिनेमा की सफलता के आवश्यक तत्व पर अपने विचार रखते हुए उन्होंने कहा, फिल्मों की सफलता का कोई मंत्र नहीं होता है, पर अपने अनुभवों के आधार पर कह सकता हूं कि जब फिल्म मेकर सिनेमा बनाते हुए सोचता है कि मैं एक महान फिल्म बनाने जा रहा हूं तो शायद सफल फिल्म ना बनें, या फिर आप ये सोच कर सिनेमा बनाएं कि मुझे तो बस सफल फिल्म बनानी है और सफलता के सिनेमाई फार्मूलों को टारगेट कर अपनी बात कहदूं तो भी आप सफल सिनेमा नहीं बना सकते हैं, एक मायने में बयां करूं तो सिनेमा की सफलता का रिश्ता जज्बात से जुड़ा है। अगर कोई फिल्मकार दिल से कोई फिल्म बनाता हैं जिसमें वह अपनी आत्मा की आवाज को रोप सके तो उसे सफलता जरूर मिलती है।

हिंदी सिनेमा के प्रभाव से बचें

उन्होंने क्षेत्रीय सिनेमा के फिल्मकारों और कलाकारों से मुखातिब होते हुए कहा,  हिंदी सिनेमा एक गढमढ संस्कृति और मनोरंजन के फलक को छूता है जिसमें देश भर की संस्कृतियों के अवयव है। क्योंकि हर प्रांत के लोग हिंदी सिनेमा में अपना योगदान दे रहे हैं।  ऐसे में अगर क्षेत्रीय सिनेमा का विकास करना है तो हमें अपनी परंपरा की कहानी कहनी होगी। ऐसे उसे कथ्य निकालने होंगे तो विश्वस्तर पर राजस्थान को परिभाषित करें। अगर बॉलीवुड से क्षेत्रीय सिनेमा के फिल्मकार , स्टोरी रायटर प्रभावित होंगे तो गाहे बगाहे उस संस्कृति को पेश करने लग जाएंगे जो उनकी क्षेत्रीय परंपराओं में कहीं शामिल हीं नहीं होती। इसलिए क्षेत्रीय सिनेमा की फिल्मो को सफल बनाना हैं तो जरूरी हैं कि फिल्मकार ना ज्यादा उपर देखे ना नीचे बस अपने कथ्य रूपी लक्ष्य पर नजर टिकाए रखें।  

 गीतकारों को मिले उनका हक

 जावेद साहब के मुताबिक, गीतकारों को उनके गानों की रॉयल्टी का हिस्सा नहीं मिल पाता है।  संगीत कंपनिया उनके हक को खा रही हैं और कई अच्छे गीत लिख चुके गीतकार, जिनके लिखे गीत लाखों लोगों की कॉलर ट्यून बन चुके हैं लेकिन वे अपने बुढापे के दौर में अभावग्रस्त जीवन जी रहे हैं। इसके लिए काफी लंबी लड़ाई लड़ी गई हैं। आखिर सरकार हमारे पक्ष में हुई है और जल्द ही गीतकारों को गानों की रॉयल्टी मिलने लगेगी।  

साइड इफेक्ट झेल रहा हूं

आजकल फिल्मी गीतों में उनकी सक्रियता में कमी के सवाल पर उन्होंने कहा, कुछ तो शारीरिक मजबूरियां है पर ये बात भी एक वजह बनी है कि गीतकारों के हक के लिए लगातार लड़ने के कारण संगीत कंपनिया मुझपे खार खाए बैठी हैं। कुछ लोग चाहते ही नहीं है कि मेरी कलम फिल्मी गीत उगले, वैसे उन्हें मेरी सृजनात्मक प्रतिभा पर कोई अविश्वास नहीं हैं पर मैं दूसरों की हक की बात कह देने की सजा पा रहा हूं।    

मंच पर छाई राजस्थानी संस्कृति

समारोह में जहां विभिन्न कैटगरीज में कलाकारों और तकनिशियनों को अवार्ड प्रदान किए गए वहीं मंच पर राजस्थानी संस्कृति जम कर बिखरी। राजस्थानी फिल्मी कलाकरों मोहित गौड़, नेहा श्री, क्षितिज कुमार, ने राजस्थानी गीतों पर नृत्य प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन जाने माने कलाकार अमन वर्मा ने किया। राजस्थान फिल्म फेस्टीवल की संयोजिका संजना शर्मा ने आगंतक अतिथियों का स्वागत किया।   


-Dharmendra Upadhyay

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं।

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