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जीतेन्द्र सुमन





From Regional Desk:
अच्छे लेखकों को अहमियत देनी होगी
-- जीतेन्द्र सुमन


जिसने कभी बिहार-यूपी के गांवों में, पूस की ठिठुरती रात में सियारों का सप्तम सुर न सुना हो... सावन की झड़ी से लबलबाते खेतों के किनारे बैठे मेढकों का समवेत गान न सुना हो...जेठ की तपती दुपहरी में पीपल की फुनगी पर बैठी कोयल की कूक न सुनी हो...वह लेखक कभी भी अच्छी भोजपुरी फिल्म नहीं लिख सकता! और अच्छी भोजपुरी फिल्में लिखनेवाले चंद लेखकों में नाम आता है जीतेन्द्र सुमन का.

बिहार के ज़िला भोजपुर, ग्राम बड़कागाँव के मूल निवासी जीतेन्द्र सुमन ने पटना विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में एम.ए. किया. फिर सिन्हा लायब्रेरी, पटना से पुस्तकालय विज्ञान में डिग्री ली. रंगमंच पर बतौर अभिनेता राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय नाट्य प्रतियोगिताओं में कई पदक प्राप्त किये...और उसके बाद 1984 में सीधे मायानगरी मुम्बई का रास्ता पकड़ लिया. यहां आकर इन्होंने अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत सहायक निर्देशक के रुप में की. उसके बाद धीरे-धीरे लेखन से जुड़ गये. बतौर लेखक अबतक 50 से ज़्यादा भोजपुरी फिल्में दे चुके है. निस्संदेह इतने लम्बे अनुभव के पश्चात, सिनेमा के प्रति लेखक का नजरिया एक खास अहमियत रखता है. हम जीतेन्द्र सुमन के उसी नजरिये को इस साक्षात्कार के माध्यम से यहां प्रस्तुत कर रहे हैं. बातचीत की है भोजपुरी फिल्मों के  लेखक के. मनोज सिंह ने. 

  • भोजपुरी हर दस-पंद्रह किलोमीटर पर बदल जाती है. ऐसे में कहां की भोजपुरी ‘’मानक बोली”  मानी जाये ?

मानक किसी ने माना नहीं है...जबकि क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों के लिए   मानक भाषा का निर्धारण एकदम ज़रूरी है. अन्यथा जो लेखक-गीतकार जहाँ का होगा, जिस क्षेत्र का होगा, उस क्षेत्र की भाषा उस फिल्म में दिखेगी. और उसकी हानि यह होगी कि उस क्षेत्र के दर्शक के अलावा और किसी भाग का दर्शक उस फिल्म से जुड़ नहीं पाएगा...सभी क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों ने अपनी एक मानक भाषा रखी है...मैं अपवाद की बात नहीं करता...इसलिए मुझे लगता है कि हम तमाम लेखकों को एकमत होकर एक मानक भाषा ज़रूर तय करनी चाहिए ताकि फिल्म का आनन्द सभी क्षेत्रों और राज्यों के दर्शक भरपूर उठा सकें...वर्ना “अपनी डफली, अपना राग” से पाएंगे कुछ नहीं, सिवाए खोने के...मेरे विचार से मानक भाषा भोजपुर और पूर्वी उत्तर प्रदेश यानी बनारस की बोली का मिश्रण हो फिल्मों में तो संवाद मधुरता और लोकप्रियता दोनों ही बढ़ जाएगी...

  • समसामयिक कथानकों और बिहार-यूपी की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं पर फिल्में क्यों नहीं बनतीं ? विषय-प्रधान फिल्मों का निर्माण क्यों नहीं हो रहा ?

यह सवाल फिल्ममेकर की दृष्टि से जुड़ा हुआ है...जिसकी दृष्टि जितनी सम्पन्न और पैनी होगी, वह वहाँ तक पहुँचेगा...विषय-प्रधान फिल्में नहीं बनने का दूसरा कारण है- भय...आर्थिक नुकसान का भय...इसलिए फिल्ममेकर फॉर्मूले से बाहर नहीं आ पाते.

  • विषय-प्रधान फिल्में मराठी और तमिल में खूब बनती हैं, वहां आर्थिक क्षति का भय क्यों नहीं होता ?

इसलिए कि वहाँ के लोग “जात भी गँवाया और भात भी न खाया” वाली मानसिकता के नहीं हैं... वो पहले काम करते हैं रिज्लट नहीं सोचते. क्योंकि एक फैक्टर है- अच्छे काम का अच्छा नतीज़ा. वो रिस्क लेते हैं, हम नहीं लेते. रिस्क उठाने का माद्दा भी तो होना चाहिए. या फिर जुनून हो. आप जिस अंतर की बात कर रहे हैं, उस अंतर का कारण है कहीं न कहीं असंतोष, चाहे वो जिस भी चीज़ का हो. दूसरा हमने इसे केवल अपने प्रोफेशन के रूप में अडोप्ट किया है. भोजपुरी फिल्म को पैशन नहीं बनाया है, जबकि वहीं मराठी या तमिल या अन्य किसी भी भाषा की फिल्म से जुड़े लोगों में पैशन है. उनमें अपने काम के प्रति समर्पण भाव  है.

  • आजकल की फिल्मों के मुख्य चरित्र (नायक-नायिका-खलनायक) विचित्र वेश-भूषा में नज़र आते हैं. इस तरह से वे खुद को स्वाभाविकता से कोसों दूर कर लेते हैं. इसके पीछे क्या कारण है ?

देखिए, ये सारी बातें व्यक्ति के सोच पर निर्भर करती हैं, उसके आत्मविश्वास पर निर्भर करती हैं. स्वाभाविकता की सही परिभाषा जानना ज़रूरी है कि आखिर यह स्वाभाविकता भला है क्या बला? वेश-भूषा से शीर्ष पर पहुँचने या स्टार बनने के सोच रेत पर महल बनाने के समान है. निर्देशकों को लगता है कि हम अपने इन तीन पात्रों को सामान्य से अलग कर देंगे, तो किसी बहुत भारी फल की प्राप्ति हो जाएगी, जबकि ऐसा होता नहीं है. यह कथानक और मौलिकता से अलग जाने का संकेत है. यह दोष स्टारों की चापलूसी की वजह से है. फिल्मकारों को इससे निकलना होगा. निर्देशक को अपना महत्व समझना होगा. लेखक को महत्व देना होगा, तभी यह अस्वाभाविक प्रक्रिया बंद होगी, अन्यथा तो जै-जै सियाराम चल ही रहा है.

  • आपके अनुसार चरित्र की स्वाभाविकता क्या है ?

चरित्र की स्वाभाविकता से मेरा अभिप्राय है कि चरित्र को हम किस तरह से गढ़ रहे हैं. हम फिल्म किसकी और किसको ध्यान में रखकर बनाते हैं. जैसे हम superficial चरित्र दिखाते हैं, तो क्या हमारे जीवन में या हमारे आस-पास, वैसे चरित्र होते हैं क्या? निश्चित रूप से नहीं. और जो इत्तफाकन होते हैं, वे अपवाद होते हैं. वे मुख्यधारा के चरित्र नहीं गिने जाते, फिर भी जब उसे हम कथानक का पात्र बनाते हैं, उसका चरित्र गढ़ते हैं, तो हम उसमें विश्वसनीयता समोते हैं. अवास्तविक से चरित्र को भी वास्तविक सा गढ़ते हैं. जैसे हनुमान के चरित्र को ही लीजिए. बेहद अवास्तविक सा चरित्र है, मगर उस चरित्र को इस तरह से गढ़ा गया है कि वह हमें वास्तविक लगता है. 

  • लगभग हर निर्देशक भोजपुरी फिल्म बनाने के समय कहानी में लेखक से भोजपुरी संस्कृति का समावेश करने पर ज़ोर देता है. पर फिल्मी पर्दे पर वह “संस्कृति” गायब दिखाई देती है. आपकी दृष्टि में संस्कृति क्या है ?

संस्कृति तब दिखेगी, जब फिल्म में मानवीय संस्कार और संस्कारवान व्यक्तियों-परिवारों की कहानी कही जाएगी, जब आप कहानी ही लफंगों की कहेंगे, तब संस्कार और संस्कृति कैसे दिखेगी ? संस्कार और संस्कृति का तात्पर्य खान-पान और पहनावे के साथ-साथ मानवीय विचार, व्यवहार और उसकी सुधारवादी परंपराओं से है. देश में औद्योगीकरण और नगरीकरण की प्रक्रिया ने हमारे जीवन-स्तर में कई सकारात्मक और नकारात्मक परिवर्तन किये हैं, उनका प्रभाव हमारी संस्कृति पर भी पड़ा है और हमारी फिल्में भी उनसे अछूती नहीं हैं. अब संस्कृति और अपसंस्कृति का फर्क लेखक को समझ में आना चाहिए. दुखद यह है कि भोजपुरी फिल्मों में जड़ता को ही संस्कृति समझ लिया जाता है. लेखक खुद संस्कृति को नहीं समझ पा रहे हैं. और भोजपुरी फिल्मों में दिक्कत यह है कि अच्छे लेखकों की कीमत नहीं है. यहाँ हीरो का चमचा सबसे बड़ा लेखक है. 

  • भोजपुरी फिल्मों में तकनीकी गुणवत्ता का अभाव तो है ही, कथानक में मौलिकता का भी जबर्दस्त अभाव है. ज़्यादातर कहानियां हिन्दी फिल्मों से चुराकर लिखी जा रही हैं. आप इसकी क्या वजह मानते हैं ?

नहीं, अब तो तकनीकी गुणवत्ता आ गयी है. ऐसा नहीं कह सकते कि उसका अभाव है. आज के सारे निर्देशक उस तकनीक का बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं. हाँ, यह बात अवश्य विचारणीय है कि उसका उपयोग कैसे और कितनी दक्षता से किया जा रहा है. किसी भी तकनीक का उपयोग व्यक्ति की बुद्धि और कौशल पर निर्भर करता है. रही बात कहानियों की तो हमें खुद पर विश्वास नहीं है. हम मान चुके हैं कि भइया हमारे पास इतनी बुद्धि नहीं है कि अच्छी कहानी, समसामयिक कहानी लिख सकें. बिना चोरी किये फिल्म लिखने के लिए हमें खोजी बनना होगा. हमें पढ़ना होगा. बिना उसके नकल तो नहीं रुकने वाली. और दूसरी बात जो सबसे महत्वपूर्ण है, वह यह कि जो भाषा लिखना-पढ़ना जानता है, सी. डी. देखकर लिख सकता है. लेकिन सीडी देखकर कोई भी लेखक नहीं बन सकता. अगर ऎसे लेखकों के भरोसे भोजपुरी फिल्में बनती रहीं, तो फिर स्वर्णिम भविष्य की आशा मत कीजिए. अरे भाई, लेखकों पर भरोसा तो करो, उसे अपना सर्वोत्तम देने का मौका तो दो. ठीक है आप पैसे लगा रहे हैं, आप निर्णय लेने को स्वतंत्र हैं, मगर फिल्म प्रोडक्ट नहीं है, यह रिश्तों और भावनाओं से गढ़ा गया जीवन है. और जीवन गढ़ना व्यापारियों का नहीं शिल्पकारों का काम है.  

  • कहानियों में मौलिकता बिल्कुल नहीं है. पटकथा भी बिना चप्पू की नाव की तरह इधर-उधर डोलती नज़र आती है. संवाद की तो पूछिये ही मत. अक्सर कई फिल्मों में इस तरह के संवाद सुनने को मिलते हैं, “रऊआ कहां जात बाड़S”. आखिर दर्शकों को ये सब कबतक झेलना पड़ेगा ?

तबतक जबतक साँप और रस्सी का फर्क समझ नहीं आ जाएगा. मौलिकता के लिए ज्ञान का होना ज़रूरी है. पठन-पाठन ज़रूरी है लेखक के लिए. जबतक हमारे पास ज्ञान का भंडार नहीं होगा हम नहीं समझ पाएंगे कि मौलिक क्या है और नकल क्या. रही बात पटकथा की तो सर, पटकथा लेखन बहुत ही technical विधा है, बिल्कुल सर्जरी की तरह. इसके साथ खिलवाड़ समझ लीजिए प्राणघाती ही है. आज तो हाल यह है कि सबके पास कहानी है और सभी पटकथा लिखते हैं. बिल्कुल मास्टरी है सबकी. दुर्भाग्य है कि हम बिना तैरना सीखे देखा-देखी में सागर में कूद जाते हैं. फिल्म की रीढ़ होती है पटकथा. मगर दुखद तथ्य यह है कि भोजपुरी फिल्मों में स्किल्ड लेखक नहीं के बराबर ही काम कर रहे हैं.

  • आजकल भोजपुरी फिल्मों के नाम हिन्दी फिल्मों से उड़ाकर रखे जाने का प्रचलन चल पड़ा है. भोजपुरी सिनेमा पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा ?

बुरा असर पड़ेगा, बल्कि पड़ रहा है. गालियाँ मिल रहीं हैं. यह भी एक प्रकार से संस्कृति को रौंदना ही है..

  • शुरुआती दौर की फिल्मों और वर्त्तमान दौर की फिल्मों में लेखन के स्तर पर कैसा अंतर नज़र आता है आपको ?

इस विषय पर क्या कहूँ... समय के साथ लेखन भी बदलता है, लेकिन भोजपुरी फिल्मों में जिस तरह का बदलाव आया वह फूहड़ है, गंदा है, लिजलिजा है. भोजपुरी समाज में कहानियों की कमी नहीं है, किंतु आज के भोजपुरी फिल्मकार और लेखक उसे पहचान नहीं पा रहे हैं. सब कुछ जीवन में है, समाज में है. अच्छा भी और बुरा भी.सुन्दर भी और लिजलिजा भी लेकिन किसको कब, कहाँ और कैसे प्रस्तुत करना है, इसका ज्ञान बहुत ज़रूरी है. फिल्म भी एक तरह का डॉक्यूमेंटशन ही है, जो सदियों बाद भी हमारे समाज, हमारी संस्कृति का प्रमाण देगी. इसे सोचना ज़रूरी है.   

  • भोजपुरी सिनेमा में रोमांस के नाम पर सिर्फ अश्लीलता दिखाई जाती है. क्या कोई ऐसी भी साफ-सुथरी फिल्म याद है आपको जिसका रोमांस आपके दिल को छू जाता हो ?

यदि कहूंगा तो अपने मुँह मियां मिट्ठू बनना हो जाएगा.

  • ज़्यादातर फिल्मों में हर दस मिनट पर गाना और पंद्रह मिनट पर माड़धाड़ दिखाया जाता है. निर्माता-निर्देशक यह भी कहते हैं, आयटम सॉंग के बिना फिल्में बिकती नहीं. कथानक पर उतना बल नहीं दिया जाता. क्या फिल्मों को चलाने का यही एकमात्र फॉर्मूला है ?

यह प्रदूषित मानसिकता का प्रमाण है. जबकि सच्चाई यह है कि item song  वाली फिल्म भी बिकती नहीं है. निर्माता-निर्देशक मुगालते में जीते हैं. यह सबको समझना चाहिए कि गुलाब का महत्व, उसकी सुन्दरता जितनी समग्रता में है, उतनी उसकी टूटी हुई पंखुड़ियों में नहीं है. हम बहुमंजिली इमारत बनाने का इरादा तो रखते हैं, पर जब बनाने चलते हैं तो दलदल पर बनाने लग जाते हैं. और नतीज़ा यह होता है कि एक दिन जब इमारत गिरती है तो दबकर मरनेवाले की चीख भी नहीं निकलती. ये आयटम सांग, फाइट, कॉमेडी, ये सब अंग हैं, मूल आत्मा नहीं. आत्मा कहानी है, उसको पकड़ने की ज़रूरत है.  

  • ऐसा कौन-सा आपका पसंदीदा विषय है, जिसपर भोजपुरी फिल्म लिखने की आपकी हार्दिक इच्छा है ?

मानवीय संबंधों को उजागर करती फिल्म. संबंधों की मधुरता को मैं दिखाना अवश्य चाहता हूँ.

  • भोजपुरी इंडस्ट्री में लेखकों की वर्त्तमान दशा पर आपकी टिप्पणी ? उनकी दशा को बेहतर बनाने के लिए फिल्म राईटर्स असोसिएशन क्या ठोस कदम उठा सकता है ?

जब निर्मातों-निर्देशकों ने भोजपुरी फिल्म के स्टैंडर्ड को इतने ऊपर तक उठाया है, तो भोजपुरी फिल्म के लेखकों को भी मुंशी के पद से ऊपर उठाएँ. यह समझें कि वह ही आपके राजमहल की नींव का पहला पत्थर है जिसके कारण आप उस राजमहल के मालिक होते हैं और उसके सुख को भोगते हैं. प्लीज पहचानें लेखक की अहमियत को मित्रों. निश्चित तौर पर फिल्म राईटर्स असोशिएशन बहुत कुछ कर सकता है और कर रहा है. पिछले दिनों भोजपुरी के शेक्सपीयर भिखारी ठाकुर पर कार्यक्रम हुआ, फिर भोजपुरी फिल्म लेखकों के लिए लेखन को लेकर एक दिन का वर्कशॉप हुआ. सुना है अगले महीने पुरबी के जनक महान भोजपुरी गीतकार महेन्दर मिसिर पर एक कार्यक्रम करने जा रहा है. ये सब बड़े ही सकारात्मक कदम हैं फिल्म रायटर्स एसोसिअशन के. जरूरत है हम लेखकों का जागने की.

 

 


-के. मनोज सिंह

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