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From Film Desk:
आज की फ़िल्मों में मौलिकता
-एक विश्लेषण


 

आज की हिंदी फ़िल्मों की मौलिकता का विश्लेषण

सिने जगत में फिल्मों के रीमेक या किसी उपन्यास का फिल्मीकरण होना कोई नई बात नहीं है | फ़र्क सिर्फ इतना है कि विदेशों में यही काम बाक़ायदा कॉपी राइट्स लेकर किया जाता है इसलिए इसे जायज़ समझा जाता है और हमारे यहाँ यही काम ज्यादातर बिना बताए किया जाता है या फिर इसे प्रेरणा के नाम पर खपा दिया जाता है | हिन्दी फिल्म जगत में कई निर्माता – निर्देशकों ने विदेशी फिल्मों को हिन्दुस्तानी जामा पहनाया है और ये स्वीकार भी किया है कि उनकी फिल्में विदेशी फिल्मों से प्रेरित हैं | आश्चर्य होता है ये देखकर कि बड़े बड़े काबिल फ़िल्मकार उधार की कहानियाँ लेकर फिल्मे बना रहे हैं, क्या कहानियों का ऐसा अकाल पड़ गया है कि हमे एक ही कहानी को कई बार कहने वाले रीमेकस देखने पड़ रहे हैं या और घटिया sequels?

इस लेख की पहली कड़ी में हम आज के सफलतम फ़िल्मकार संजय लीला भंसाली की फिल्में पर नज़र डालेंगे कि वे कितनी मौलिक हैं..

 

खामोशी ‘द म्यूज़िकल’ (१९९६) की मूल कहानी १९९५ में बनी जर्मन फिल्म "जेंसिअत्स  देर स्तिल्ले" (अंग्रेज़ी – बियोंड साइलेंस) से मिलती जुलती थी | इस फिल्म के दौरान दलील दी गयी कि “बियोंड साइलेंस” १९९६ में खामोशी के बाद रिलीज़ हुई थी लेकिन सच्चाई ये है कि ये फिल्म १९९५ में आयी थी और इसके प्रमाण भी मौजूद हैं | हालांकि ये संभव है कि ये फ़िल्म पहले किसी अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में प्रदर्शित की गयी हो और बाद में इसे दुनिया भर में रिलीज़ किया गया हो | बहरहाल ये संजय लीला भंसाली की पहली फिल्म थी और कुछ एक जगह ये प्रमाण भी मिले कि ये फिल्म “बियांड साइलेंस” से पहले रिलीज़ हुई थी इसलिए सब खामोश रहे और उनकी “खामोशी – द म्युज़िकल’ भी बॉक्स ऑफिस पर खामोश ही रही |

 

हम् दिल दे चुके सनम (१९९९)  की कहानी १९८३ में बनी हिन्दी फिल्म “वो सात दिन“ पर आधारित थी, जिसमें सलमान ने अनिल कपूर, अजय देवगन ने नसीरुद्दीन शाह और ऐश्वर्या राय ने पद्मिनी कोल्हापुरे की भूमिका निभाई थी | “वो सात दिन“ को बड़े केनवास पर दर्शकों ने सराहा और चूंकि फिल्म हिट थी इसलिए उधार की इस कहानी को शायद नज़र अंदाज़ कर दिया गया | 
 

 

‘देवदास’ (२००२शरतचन्द्र के उपन्यास का कैसा फ़िल्मीकरण था ये साहित्य प्रेमी बेहतर जानते हैं | फ़िल्म देखकर लगता है कि फ़िल्मी रंगीनियों में एक अच्छे साहित्य की रूह को दफ़न कर दिया गया हो | और उस पर संजय लीला भंसाली ने ये दावा भी किया कि उन्होनें बिमल रॉय की "देवदास" नहीं देखी बल्कि उपन्यास पढ़कर फिल्म बनाई है लेकिन हैरत की बात ये है कि उनकी "देवदास" में बिमल रॉय की "देवदास" के दृश्य हू-ब-हू देखे गए जो शरतचंद्र के उपन्यास में नहीं थे | और विडम्बना तो इस बात की है कि इस फ़िल्म को ऑस्कर अवार्ड के लिए भेजा गया था |

 

 

ब्लेक (२००५), जो संजय लीला भंसाली ने हेलेन केलर को समर्पित की थी, असल मेंबहुत हद तक १९६२ में बनी अंग्रेज़ी फिल्म "द मिरेकल वर्कर" की नक़ल थी,ये फ़िल्म हेलेन केलर की असल ज़िन्दगी पर आधारित थी |

वैसे हेलेन केलर के जीवन पर सबसे पहले सन १९५४ में एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म “The Unconquered” (Helen Keller in Her Story) बनी थी जिसे बेस्ट डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म के लिए अकादमी अवार्ड (ऑस्कर), और फिर "द मिरेकल वर्कर" के नाम से विलियम गिब्सन ने एक टेली प्ले लिखा जो काफी चर्चित रहा , उसके बाद इस नाटक के पटकथा पर आधारित १९६२ में फीचर फिल्म "द मिरेकल वर्कर" बनी , इसी नाम से १९७९ में एक टेलीफ़िल्म और १९८४ में इसका सेमी सेकुअल “The miracle continues” बनाया गया,जिसमें हेलेन केलर की आगे की एजुकेशन पर रोशनी डाली गयी थी | इसके बाद एक बार फिर सन २००० में "द मिरेकल वर्कर" को आधुनिक अंदाज़ में बनाया गया | मगर इन सभी फ़िल्मों में १९६२ की  फीचर फिल्म "द मिरेकल वर्कर" सबसे चर्चित रही जिसमें हेलेन की भूमिका में थीं पैटी ड्यूक और उनकी असली महिला टीचर ऐनी सुलीवान की भूमिका ऐनी बन्क्रोफ्ट ने निभाई थी और उन्हें इस भूमिका के लिए अकादमी अवार्ड (ऑस्कर) भी मिला था |

“ब्लैक” में यही किरदार एक पुरुष टीचर के रूप में अमिताभ बच्चन ने बखूबी निभाया | मगर संजय लीला भंसाली शायद ये भूल गए कि एक पुरुष टीचर दिखाकर वो एक ऐसी महिला चरित्र को दफ़न कर रहे हैं जिसने असल में अपना सारा जीवन एक अंधी-बहरी लडकी के नाम कर दिया | यहाँ तक कि ब्लैक की बाल कलाकार आयशा कपूर की अभिनय शैली और किरदार का अंदाज़  हू-ब-हू "द मिरेकल वर्कर" की बाल कलाकार पैटी ड्यूक जैसा था |  हालांकि ये फिल्म सराहनीय रही लेकिन मौलिक नहीं थी | यदि ये फ़िल्म पूरी तरह हेलेन केलर और ऐनी सुलीवान जीवन पर आधारित होती तो शायद और भी ज्यादा सशक्त और पुख्ता होती |

 

 

सांवरिया (२००७) फ्योदर दास्तोव्स्की की लघु कहानी "व्हाईट नाइट्स" का फ़िल्मी रूपांतरण था लेकिन उससे पहले ये फिल्म इटली में "ले नोत्ति बियांशे" (१९५७), हिंदी में छलिया (१९६०), फ्रांस में "फोर नाइट्स ऑफ़ ए ड्रीमर" (१९७१), ईरान में व्हाईट नाइट्स (२००२), तमिल में "इयारकई" (२००३) नाम से बन चुकी है| और एक बार फिर हैरत की बात ये थी कि "सांवरिया" का पूरा सेट १९५७ में बनी "ले नोत्ति बियांशे" से मिलता जुलता है |

 

 

गुज़ारिश(२०१०) को भी वो अपनी मौलिक फिल्म बताते हैं जबकि ये १९८१ की अंग्रेज़ी फिल्म "हूज़ लाइफ इज़ इट एनीवे" और २००४ की स्पेनिश फिल्म "मॉर अदेंतरो" (अंग्रेज़ी- "द सी इनसाइड") की तरह लगती है | ये दोनों फिल्में ब्रायन क्लार्क के नाटक "हूज़ लाइफ इज़ इट एनीवे" पर ही आधारित थीं | इसके अलावा दो जादूगरों के बीच प्रतिद्वंदिता का आइडिया २००६ की अंग्रेज़ी थ्रिलर "द प्रेस्टीज" से लिया | सूत्र बताते हैं कि "द प्रेस्टीज" की डीवीडी उन्हें सलमान खान ने दी थी और फिल्म में मेजिक शोज की रूपरेखा अंग्रेज़ी फिल्म "द इल्यूजनिस्ट" की कॉपी लगती है | 

 

“गोलियों की रासलीला - रामलीला”(२०१३) जो शेक्सपियर के नाटक रोमियो-जूलियट पर आधारित थी | जिसे गुजरात के परवेश में बनाया गया था | इसके नाम ‘गोलियों की रासलीला ......’ में ही इसकी मौलिकता / रचनात्मकता दिखाई देती है और उसका हश्र भी हम देख चुके हैं |

 

बाजीराव मस्तानी”(2015) जो हाल ही में प्रदर्शित उनकी भव्य और शानदार फ़िल्म है | ये फ़िल्म बेशक बॉक्स ऑफिस पर सफल हुई हो और सभी इसका गुणगान कर रहे हों लेकिन एक बार फिर इसकी भव्यता में इतिहास  की मौलिकता दम तोड़ती नज़र आती है क्यों कि असलियत में मोहम्मद खान से युद्ध जीतने के बाद छत्रसाल ने अपना एक तिहाई राज बाजीराव को सौगात में दिया था जिसमें झांसी, सागर और कालपी भी शामिल थे और उसके बाद बाक़ायदा बाजीराव के साथ अपनी बेटी मस्तानी का विवाह किया था, जिसमें छत्रसाल ने बाजीराव को हीरों की खान दी थी | उसके बाद मस्तानी शनिवारवाड़ा में ही आकर बाजीराव के साथ रही लेकिन अपनी पहली पत्नी के विरोध की वजह से बाजीराव ने मस्तानी को एक अलग महल दिया जिसका नाम था “मस्तानी महल” | मगर जब  बाजीराव की माँ और पहली पत्नी को ये भी बर्दाश्त नहीं हुआ तो सन १७३४ में उन्होंने मस्तानी को शनिवारवाड़ा से दूर कोथरुड महल में ले जाकर रखा | ये जगह पूना के कर्वे रोड पर मृत्युंजय मंदिर के पास आज भी मौजूद है, जहां अब राजा दिनकर केलकर म्यूज़ियम है | बाजीराव की पहली पत्नी काशीबाई ने कभी मस्तानी को स्वीकार नहीं किया और ना ही कभी हल्दी-कुंकू लेकर उसके पास गयी | आखिर में खरगौन के रावरखेडी इलाके में अपनी भूमि का निरीक्षण करने गए बाजीराव जब बीमार पड़े तो मस्तानी उनसे मिलने गयी थी मगर उसे समझाकर वापस भेजा गया और मस्तानी की मौत बाजीराव के मरने के कुछ दिनों बाद पाबल गाँव में हुई थी, न कि शनिवारवाडा के कैदखाने में |अब अगर हम इसकी भव्यता को हटाकर इसकी पटकथा-संवाद और किरदारों पर गौर करें तो बड़े निर्देशकों की ऐतिहासिक फिल्मों में ये बेहद सतही और हल्की फ़िल्म नज़र आयेगी |

 

इसके गीतों और कई दृश्यों में “मुग़ल-ए-आज़म” की छाप भी नज़र आती है जैसे ; मस्तानी आईने के सामने बैठी हैं और एक कनीज़ आकर उसे बाजीराव से मिलने की तजवीज़ देती है जैसे कि “मुग़ल-ए-आज़म” में बहार आईने के सामने मलिका बनने के सपने देखती है और एक कनीज़ आकर उसकी तारीफ़ करती है या फिर बाजीराव का मस्तानी से अकेले में मिलने जाना जिस तरह सलीम जाता है अनारकली से मिलने और दोनों अपनी मोहब्बत का इज़हार करते हैं या फिर मस्तानी का  बाजीराव के साथ होना और आई साहेब का “मुग़ल-ए-आज़म”  के अकबर की तरह वहाँ पहुँचना | 

 

इस फ़िल्म के नज़ारे बेशक संजय लीला भंसाली की बाकी फ़िल्मों की तरह खूबसूरत हों लेकिन नजरिया बहुत हल्का है और इस तथ्य को समझाने के लिए १९५९ में आयी “मुग़ल-ए-आज़म” एक बढ़िया उदाहरण होगा, जिसके नज़ारे और नजरिया दोनों लाजवाब थे | इस फ़िल्म के किरदारों का शाही अंदाज़ और उनके संवादों के वज़न-व्याकरण बेमिसाल थे | “मुग़ल-ए-आज़म” ने इतिहास का दावा कभी नहीं किया बल्कि कुछ ऐतिहासिक किरदारों को लेकर एक काल्पनिक कहानी थी | गौरतलब है कि “मुग़ल-ए-आज़म” में १२ गीत थे लेकिन उनमे से एक भी अकबर , जोधा और सलीम ने नहीं गाया था |

अब ज़रा “मुग़ल-ए-आज़म” जैसी भव्य फ़िल्म को आज संजय लीला भंसाली के अंदाज़ में सोचकर देखिये :

सबसे पहले फ़िल्म का पहला हीरो अकबर जाकर सलीम चिश्ती की दरगाह पर ज़ोरदार कव्वाली गाये और चूंकि अकबर पर गीत फिल्माया है तो फिर सलीम जंग जीतकर लौटने के बाद नाच-नाचकर ‘दुश्मन की देखो जो वाट लावली...’ जैसा गाना गाये | फिर जन्माष्टमी पर अकबर और सलीम मिलाकर ‘गोविंदा आला रे...’ जैसा कोई गीत गायेंगे | दूसरी तरफ जोधाबाई और अनारकली भी कोई ‘पिंगा ग पोरी ’ गायें और चूंकि प्रेम कहानी है तो सलीम-अनारकली के एक-दो युगल गीत तो लाज़मीहैं | सोचिये कैसी लगेगी ये “मुग़ल-ए-आज़म” ?

यही हुआ है बाजीराव मस्तानी के साथ | जो मस्तानी दो साल बाजीराव के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ी | उस राजपूतानी को दरबार की नर्तकी बनाकर रख दिया | बाजी राव, जो ४० युद्ध जीता हो वो “वाट लावली...” गा रहा है जिसमें वो एक योद्धा से ज़्यादा भांड नज़र आता है | और ये सब सिर्फ़ इसलिए कि फ़िल्म के हीरो-हीरोइन के पास गाने होने चाहिए | और अगर दीपिका पर दो गीत फिल्माए गए तो प्रियंका पर भी दो गीत फिल्माए जाने चाहिए, भले ही वो बाजीराव की पत्नी पेश्वाइन की भूमिका में क्यों न हो | जिस्मानी तौर पर बेशक ये सारे किरदार शानदार नज़र आते हों लेकिन रूहानी तौर पर ये सारे किरदार बड़े हलके लगते हैं अगर एक ऐतिहासिक शाही खानदान को लेकर किसी फ़िल्मकार की ये सोच है, तो माफ़ कीजिये ये बड़ी ही सस्ती सोच है | क्या मनोरंजन के नाम पर इतिहास को सूली पर चढ़ा देना लाज़मी है ?यहाँ एक और प्रश्न बार-बार ज़हन में आता है कि क्या हमारा सेंसर बोर्ड सिर्फ़ हीरोइन की इज्ज़त लुटने पर कैंची चलाता है और जहां हमारे इतिहास की आबरू लुट रही हो वहाँ इतनी भी ज़हमत नहीं उठाता कि फ़िल्म के प्रारंभ में एक नोट डालने का निर्देश दे कि इस कहानी के प्रसंग काल्पनिक हैं और इनका इतिहास से कोई सम्बन्ध नहीं है |

इन सारी फिल्मों की सिर्फ कहानियाँ ही नहीं बल्कि ज़्यादातर दृश्य , किरदार और रूपरेखा भी किसी न किसी फ़िल्म से उधार ली गयी है | "गुज़ारिश" जैसी फ़िल्म में क़रीब २७ करोड़ का मेहनताना लेने के बाद भंसाली का बयान था कि वो पैसा नहीं बनाते बल्कि फ़िल्म बनाते हैं | हैरत तो इस बात की है कि इन सारी चीज़ों के बावजूद कुछ नामचीन फ़िल्मी आलोचक उनके गुणगान करते नज़र आते हैं |   

संजय लीला भंसाली अपने मौलिक होने का दावा करते हों लेकिन यह सब देखकर सुनकर इस मौलिकता के दावे पर माथे  पर बल पड़ना लाज़मी है.

 

बहरहाल जाते जाते इस पुराने वाले "पिंगा गं पोरी पिंगा" गीत का आनंद लीजिये...

गाना मराठी फ़िल्म 'चंदनाची चोली अंग अंग जाळी' से है जिसे संगीत दिया था विश्वनाथजी ने और गाया था उषा मंगेशकर के साथ पुष्पा पगधारे ने.

(बाजीराव मस्तानी का सबसे लोकप्रिय गीत भी 'पिंगा ग पोरी पिंगा' यही है).




Article Written by : Ajay Dikshit “Nishant”
talktonish@gmail.com (पाठक सिर्फ इस लेख या ऐसेही विषय पर केवल लेखक से संपर्क करें). 

 

Disclaimer - उपरोक्त विचार लेखक की अपनी निजी राय है, उनके अपनी मेहनत, अपने संशोधन का स्वयं का विश्लेषण है. FWA अपने सदस्य लेखक को उनके विचार उनकी research को आम पाठकों तक पहुँचाने का मंच प्रस्तुत कर रहा है. इसमें FWA की अपनी कोई राय नहीं है. आम पाठक अपने कमेंट्स / feedback हमे दे सकते है. उन्हें भी हम इसके साथ या अलग से; जैसे उचित हो साझा करेंगे.


-Nishant

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