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डॉ चंद्रप्रकाश द्व


मोहल्ला अस्सी फ़िल्


From Film Desk:
फ़िल्मों में साहित्य और इतिहास
-डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी से एक साक्षात्कार


‘मुहल्ला अस्सी’ के लिए बनारस उसकी आत्मा है :  डॉ.चंद्रप्रकाश द्विवेदी  

हिंदी फ़िल्म उद्योग में डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी की पहचान और फिल्मकारों से अलग है | कहा जाता है कि साहित्य और इतिहास पर आधारित फिल्मों की अगर कोई धारा होगी तो डॉ. द्विवेदी निःसंदेह उसके सिरमौर कहे जायेंगे | अपनी फिल्मों में ‘साहित्य और इतिहास’ के साथ न्यायोचित चित्रण करना कोई इनसे सीखे| इनकी आने वाली फ़िल्म “मुहल्ला अस्सी” जो लब्ध लेखक  डॉ.काशीनाथ सिंह के उपन्यास “काशी का अस्सी” पर आधारित है | डॉ. द्विवेदी की प्रवृति और प्रकृति के साथ साथ ‘मुहल्ला अस्सी’ पर विस्तृत बातचीत की युवा स्वतंत्र फ़िल्म पत्रकार रविराज पटेल ने, प्रस्तुत है प्रमुख अंश :  

रविराज : डॉ. साब ! मेरे ख्याल से आप हिंदी फ़िल्म उद्योग में ‘साहित्य और इतिहास’ पर काम करने वाले बेहद गंभीर फ़िल्मकार हैं | सिर्फ ‘साहित्य और इतिहास’ ही क्यूँ ?

डॉ.चंद्रप्रकाश : इस सवाल का जबाब मैं थोडा विस्तार से देना चाहूँगा | देखिये, अभूतपूर्व व्यक्तित्व और अभूतपूर्व परिस्थितियाँ दोनों साथ में आती हैं और उनके परस्पर संघर्ष, सामंजस्य और इंटरएक्शन के योग से जो घटनाएँ बनती हैं, वह इतिहास में आती हैं. सामान्य सी घटनाएँ इतिहास का हिस्सा नहीं होती हैं | यही अंतर है घटनाओं और इतिहास में | उदाहरण के तौर पर बताना चाहूँगा कि भारत में अभूतपूर्व परिस्थितियां और उसमें चाणक्य जैसे व्यक्तित्व का उभरना, मुग़ल भारत में अभूतपूर्व परिस्थितियां और उसमें अकबर जैसे व्यक्ति का आना | यानि ऐसी चुनौती भरी समस्या देश के सामने खड़ी होती है और वैसी परिस्थिति में एक अपूर्व नायक सामने आता है, जो हजारों वर्षों तक याद किया जायेगा |  इसलिए मुझे ऐसा लगता है कि लोगों को उन व्यक्तियों से परिचित करवाया जाय , जो कितनी बाधाओं और कठिनाइयों को सहने के बाद इतिहास रच पाते  हैं| वरना हम अपने इतिहास पुरुष को जानते ही नहीं हैं |  आप गाँधी को इसलिए जानते हैं कि एक व्यक्ति पूरे अंग्रेजी शासन के खिलाफ खड़ा होता है, वह भी एक ऐसे हथियार का इस्तेमाल करते हुए जो विश्व भर में अनूठा था |  अहिंसा का हथियार | इसलिए मुझे हमेशा यह लगता है कि हमारे पास एक ऐसी ज़मीन  होती है, जिस पर बहुत काम किया जा सकता है और कुछ हद तक वह देश की चेतना में भी रहता है और उसके प्रति आकर्षण भी रहता है |  हालाँकि, यह हमारा दुर्भाग्य रहा है कि भारत के दर्शकों में अभी तक उस तरह की ऐतिहासिक चेतना नहीं आई है कि वह ऐतिहासिक फिल्मों को हाथों हाथ लें या उनको देखें | अभी हम जिस दौर से गुजर रहे हैं वह रोमांटिसिज़्म का है | आप भारत में सिनेमा के सौ साल पर लिख भी रहे हैं, आप देखेंगे कि भारत की तमाम प्रारंभिक फ़िल्में इतिहास या साहित्य से आई हैं |  उसके बाद एक ऐसा दौर आया जब हमने इतिहास और साहित्य को सिनेमा से हटा दिया | लेकिन भविष्य में भी ऐसा होगा, यह ज़रुरी नहीं है | इस समय आप अमेरिका में भी देखें तो जो भी फ़िल्में श्रेष्ठता के लिए स्पर्धा करती हैं वह पब्लिश्ड वर्क पर होती है| यूरोप में भी जो अभी ट्रेंड है, वह सभी पब्लिश्ड वर्क, क्लासिक्स, नोबल्स पर ही काम हो रहे हैं | लेकिन जो मूल सवाल है, चूँकि उसमें बहुत बड़ी कहानी होती है इसलिए मुझे वह आकर्षित करती है| 

अब रही बात साहित्य की | साहित्य में भी एक लेखक पहले उन चरित्रों और उस कथा के साथ जी चुका होता है और उस कथा में समाज का इतिहास छुपा होता है | जैसे ‘मुहल्ला अस्सी’ या ‘काशी का अस्सी’ के लेखक काशीनाथ जी ने भी कहीं न कहीं वर्षों तक उस कथा को जीने के बाद, उन पात्रों से परिचित होने के बाद उसे पुस्तक में ढाला है |  और एक फिल्मकार के होने के नाते मुझे जो अच्छा लगता है उसे दर्शकों तक ले जाने का प्रयास करता  हूँ | इसलिए मुझे लगता है कि मेरा काम कठिन होता है और कठिन इसलिए भी होता है कि जिन लोगों ने उसे पढ़ा होगा, हालाँकि उनकी संख्या बहुत कम होती है, उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरना होता है |  दूसरी कठिनाई यह होती है कि आम तौर पर जो मसाला हिंदी फ़िल्में हैं, उनमें जो मसाले होते हैं, वह इन कहानियों में नहीं होते, लेकिन इन कहानियों में कुछ वैसी विशिष्ट बातें होती है जो मुझे लगता है कि दर्शकों को सुनाना ज़रुरी है | इसलिए हम घूम कर वापस साहित्य और इतिहास पर ही काम करने आ जाते हैं |  

रविराज : आज सिनेमा ही साहित्य है | क्यूंकि पढ़ने के लिए  लोगों के पास समय नहीं है, वह सिनेमा  देख कर ही साहित्य को समझना चाहते हैं | लेकिन हिंदी सिनेमा इस उम्मीद पर खरा नहीं उतर पा रहा है, उसका स्तर शुद्ध बाजारू हो गया है | वैसे में आपका ‘इतिहास और साहित्य’ के साथ चलना, खतरा नहीं लगता  ?    

डॉ.चंद्रप्रकाश : बिलकुल खतरा लगता है | इसलिए आप देखते होंगे कि मैं लंबे अंतराल के बाद फ़िल्में  बनाता हूँ | चार साल, पांच साल, दस साल बाद फ़िल्में बनाता हूँ | इसलिए कि ऐसे व्यक्तित्व को ढूँढना या ऐसे व्यक्ति को तैयार करना जो आपकी तरह सोचता हो, या उसको ऐसा लगता हो कि मैं कम से कम खतरा उठाने जा रहा हूँ |  जब कोई ऐसे व्यक्ति वापस मिल जाता है, तभी मैं फ़िल्म बनाता हूँ |  वरना मैं किसी कॉरपोरेट को जा कर अपनी कहानी नहीं सुनाता, क्यूंकि मैं जानता हूँ कि कॉरपोरेट को मेरी कहानियों में विश्वास नहीं होगा | 

रविराज :सुना है कि आप अंग्रेजी या विदेशी साहित्य को ज्यादा देर तक झेल नहीं पाते हैं, सही बात है?

डॉ.चंद्रप्रकाश : हाँ ! लेकिन उसका यह कोई कारण नहीं है कि मेरा उनके प्रति कोई पूर्वाग्रह है और यह भी नहीं कि मुझे अंग्रेजी नहीं आती | दरअसल, मेरी पढ़ाई-लिखाई हिंदी माध्यम से हुई है, इसलिए मेरे  चिंतन की प्रक्रिया हिंदी है | मुझे याद नहीं है कि हमने एक भी अंग्रेजी उपन्यास पढ़ा हो | कभी कोशिश करता  भी हूँ तो कुछ पन्नों के बाद रुक जाता हूँ, क्यूंकि मैं ज्यादा सहज हिंदी में ही हूँ | कई और भारतीय भाषाओँ में भी जैसे गुजराती, मराठी साहित्य पढ़ने समझने में मुझे बहुत मज़ा आता है | अपने देश में ही इतना कुछ लिखा है, इतनी सारी भाषाएँ हैं, विविधताएं हैं, फिर विदेशी भाषाओँ में साहित्य क्यूँ पढूं या उसके बारे में क्यूँ सोंचू ? मैं यहाँ की ज़मीन से वाकिफ हूँ इसलिए उसी पर काम भी करता हूँ | हमारे कई दोस्त हैं जो विदेशी साहित्य पर फ़िल्में बनाते हैं, लेकिन वापस ज़मींन हिन्दुस्तान में तलाश रहे होते हैं, यानि उसका इंडीनाइजेशन करने में लग जाते हैं | मुझे लगता है कि यह आस्था का संकट मेरे साथ नहीं है | 

रविराजआपकी आने वाली साहित्यिक फ़िल्म ‘मुहल्ला अस्सी’ बनारस की पृष्ठभूमि पर है, बनारस ही क्यूँ ?  

डॉ.चंद्रप्रकाश : देखिये, ‘मुहल्ला अस्सी’ की कहानी बनारस की पृष्ठभूमि पर नहीं है | वह कहानी बनारस की ही है | अंतर है | कई बार मैं लोगों से कहता हूँ कि जो भी लोग फ़िल्में बना रहे हैं, उन्हें पूरा अधिकार है बनारस में जा कर फ़िल्में बनाने का | लेकिन वे बनारस को एक बैक-ड्रॉप के तौर पर ले रहे हैं | हो सकता है कि उनमें से कई कहानियों को आप जौनपुर में रख लें, कानपुर में रख लें, पटना में रख लें, वह किसी भी शहर की कहानी हो सकती है, लेकिन ‘मुहल्ला अस्सी’ या ‘काशी का अस्सी’ को मैं बनारस के आलावा कहीं और नहीं रख सकता हूँ | क्यूंकि पात्र वहाँ का है. कथा वहाँ की है. संघर्ष वहाँ का है. उनकी आकांक्षाएं वहाँ की हैं | और फिल्मकारों  के लिए बनारस एक लोकेशन रहा है, लेकिन ‘मुहल्ला अस्सी’ के लिए बनारस उसकी आत्मा है |  

रविराज : अभी अभी आपके मुँह से ‘आत्मा’ शब्द का उच्चरण हुआ है | बनारस की आत्मा के बारे में एक प्रसिद्ध कहावत प्रचलित है - काशी विश्वनाथ, कबीर, कीनाराम और औघड़ का घर बनारस, तो वहीँ रांड, सांड, सीढ़ी एवं संतों का नगर बनारस | क्या ‘मुहल्ला अस्सी’ इस पूर्णता के साथ उस ‘आत्मा’ तक पहुँच बनाई है ?   

डॉ.चंद्रप्रकाश : (हँसते हुए) देखिये, मैं आपको यह बता देना चाहता हूँ कि ‘काशी का अस्सी’ में कई कहानियां है | यह पांच कहानियों का एक संकलन है | उसे आप उपन्यास भी कह सकते हैं, रिपोतार्ज भी कह सकते हैं या संस्मरण भी कह सकते हैं | लेकिन जब मैं ‘काशी का अस्सी’ पढ़ी तो  उसमें एक कहानी, जिस पर अभी हमने काम भी किया है - ‘पांड़े कौन कुमुदी तोहे लागी’ इसके केंद्र में धर्मनाथ पाण्डेय की कहानी है, जो बनारस का एक पंडा है | मैं पूरे उपन्यास को एक ही फ़िल्म में नहीं रखना चाहता हूँ | यह बहुत ही अच्छा सवाल किया है आपने | आपके माध्यम से मैं दर्शकों को पूरी ईमानदारी से बताना चाहूँगा, ताकि उन्हें यह पता चल सके कि मैं कर क्या रहा हूँ | फिलहाल हमने ‘काशी का अस्सी’ से एक कहानी को चुना है और कई कहानियां को छोड़ दिया है, इसलिए कि वह मेरी दूसरी फिल्मों का विषय है |  जैसे “कौन ठगवा नगरिया लूटल हो” पात्र तो उसमें भी वही है, जो ‘मुहल्ला अस्सी’ में है, लेकिन ‘कौन ठगवा नगरिया लूटल हो’ कहानी का जो कथ्य है, जो उसका उद्देश्य है, वह दूसरी कहनियों से बिलकुल अलग है |  इसमें तन्नी गुरु की कहानी है | हालाँकि तन्नी गुरु कई और कहानियों में भी दिखते हैं |  लेकिन लेखक काशीनाथ जी ने ‘कौन ठगवा नगरिया लूटल हो’ में एक दूसरी कहानी कह रहे हैं, जो ‘पांड़े कौन कुमुदी तोहे लागी’ की कहानी नहीं है | मुझे ऐसा लगा कि एक ही फ़िल्म में पूरे उपन्यास को रख देना उपन्यास के साथ अन्याय होगा| मैं बता दूँ कि ‘कौन ठगवा नगरिया लूटल हो’ अपने आप में एक स्वतंत्र कहानी है | साथ ही उसमें चरित्र की निरंतरता है और कथा की भी | अगर ‘मुहल्ला अस्सी’ को अच्छा प्रतिसाद मिलता है, जिसकी मुझे उम्मीद भी है, तो मेरी अगली फ़िल्म “कौन ठगवा नगरिया लूटल हो” होगी | मैं आपको आश्वस्त कर दूँ कि हमने इसका लेखन भी पूरा कर लिया है | मौका मिलते ही मैं इसके प्रोडक्शन पर काम करने लगूंगा | जिन्होंने भी “काशी का अस्सी” पढ़ा है, मैं उन पाठकों से कहना चाहूँगा कि आप एक ही फ़िल्म में पूरे उपन्यास को देखने की कोशिश मत करियेगा | धैर्य रखियेगा, हो सकता है मैं इस पर दो या दो से भी ज्यादा फ़िल्में आपको दूँ |

रविराज : बनारस की ठेठ संस्कृति में सनी इस कहानी के लिए ‘सन्नी देओल’ जैसे अभिनेता का चुनाव  चुनौतीपूर्ण नहीं लगा ? 

डॉ.चंद्रप्रकाश :  बहुत चुनौतीपूर्ण था | इन्फैक्ट फ़िल्म में काम कर रहे कई साथी कलाकारों ने भी यह संदेह ज़ाहिर किया था | लेकिन मुझे विश्वास था और यह विश्वास इसलिए था कि मैं एक अभिनेता से ज्यादा धर्मनाथ पाण्डेय का व्यक्तित्व को देख रहा था | मुझे लगता है अक्सर जिस वस्तु को हम फिल्मों में पसंद करते हैं, वह होता है उसका चरित्र | जैसे मैंने चाणक्य का अभिनय किया मेरे अलावा कोई और भी इस किरदार को करता तो वह अभिनेता को नहीं, चाणक्य को ही देखता | जिसने भी चाणक्य धारावाहिक देखा है उसके जेहन में ‘चाणक्य’ की छवि बसी है, न की चंद्रप्रकाश की | उसी प्रकार धर्मनाथ पाण्डेय में जो गुण मैं देख रहा हूँ, जो आकार देख रहा हूँ, वह सन्नी के पास है | एक ऊँचा कद, गोरा रंग और जिसको देखते ही आपको लगने लगेगा कि यह एक ईमानदार आदमी होगा | सन्नी में जो इन्टरनल गुण है, वह मुझे धर्मनाथ पाण्डेय में दिखता है |  यह मान सकता हूँ कि उससे ज्यादा बेहतर अभिनेता हिंदी फ़िल्म उद्योग में है, लेकिन जब एक अभिनेता को अपनी फ़िल्म में रखते हैं, तो एक पैकेज के रूप में आपको एक एक कर रखना होता है| सन्नी के बारे में कहूँ तो लोग यह अक्सर भूल जाते हैं कि वे न केवल प्रसिद्ध अभिनेता हैं, बल्कि बेहतर अभिनय के लिए दो - दो राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित हैं | 

कई बार फिल्मकार भी दोषी होते हैं, वे अभिनेताओं के प्रति अन्याय करते हैं, वे उन्हें चुनौती  देते ही नहीं हैं, मैंने सन्नी को चुनौती दी | (हँसते हुए) और मैं सच कहता हूँ, मुझे यह भय था, क्योंकि इसके पहले उन्होंने इस तरह का अभिनय कभी किया ही नहीं था | जिस तरह से वे पंक्तियों को याद करने के लिए संघर्ष कर रहे थे, मुझे डर लगता था कि कहीं वे चौथे या पांचवें दिन मुझसे कहें कि भाई इस कहानी के लिए आप कोई और अभिनेता को ले लो, मुझे माफ करो | लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, फ़िल्म में उन्होंने वही कहा जो शब्द और वाक्य लिखे गए थे | यहाँ तक कि वे का, के, की, हे, है, हैं को भी परिवर्तित नहीं किया | उन्होंने पूरे संवाद को घोंट लिया था | मुकेश तिवारी, राजेंद्र गुप्ता से तो चूक होती भी थी लेकिन सन्नी से नहीं | 

रविराजबनारस एक और चीज़ के लिए प्रसिद्ध है गालियों के लिए, वहाँ की गालियों में जो सहजता और सरलता है वह अस्वाभाविक नहीं लगता, मुहल्ला अस्सी इस स्वभाव से परहेज तो नहीं रखा है ?           

डॉ. चंद्रप्रकाश : (हँसते हुए) बिलकुल नहीं | ‘मुहल्ला अस्सी’ में बहुत सारी गालियाँ हैं और गालियों के कई प्रकार हैं | लेकिन मेरा उद्देश्य फ़िल्म में गालियाँ देना नहीं था | और आपने सही कहा कि बनारस में गालियाँ देना एक स्वभाव है, वह वहाँ की संस्कृति का हिस्सा है | बनारस में छः साल बच्चा भी अपने दोस्तों को बड़े प्यार से गालियों से पुकारता है | वहाँ के आम बोलचाल की भाषा में गालियाँ बहुत ही सहज रूप से आती है |  वे उनकी अभिव्यक्ति का हिस्सा है |  ‘मुहल्ला अस्सी’ में मैंने जिन गालियों को चुना है वह बनारस की अभिव्यक्ति का ही हिस्सा है, प्रेम का लेन-देन है,  जिसे मैं अभद्र नहीं कह सकता | इसलिए एक जिम्मेदार फिल्मकार होने के नाते मेरा कर्त्तव्य बनता है कि मैं इस सभ्यता और संस्कृति से उनका परिचय करवाऊँ | और यह ‘मुहल्ला अस्सी’ एक पीढ़ी है, मेरी अगली फ़िल्म इसकी दूसरी पीढ़ी होगी |  जिसमें मैं और भयंकर साहस कर पाउँगा | 

रविराज : सुना है,  गालियों के कारण आप ‘मुहल्ला अस्सी’ का एडिट वर्जन भी बनाने वाले हैं, अपनी बेटी की वजह से ? सच है ? 

डॉ.चंद्रप्रकाश : बिलकुल सच है | और यह मेरे साथ बहुत बड़ा संकट है | मेरी बेटी बार बार कह रही है मुझे कब फ़िल्म दिखाओगे और मैं उसे दिखा नहीं पा रहा हूँ | वह अभी ग्यारह साल की है | हमलोगों ने निर्णय किया है कि हम उसे एडिट वर्जन दिखायेंगे, लेकिन एडिट रूम में नहीं सिनेमा घर में |  फ़िल्म का सेंसर अभी नहीं हुआ है | जब सेंसर के लिए फ़िल्म जायेगी तो मैं सेंसर अधिकारीयों से कहूँगा कि अब हमलोगों को इस बारे में सोंचना चाहिए कि हम ‘ए’ सर्टिफिकेट दे कर हम अपने बच्चों को एक अच्छे और बड़े विषय से रु-ब-रु होने से वंचित कर देते हैं |  उसके लिए यह प्रावधान होना चाहिए ‘एडिट वर्जन’, और वह अपने पालकों के साथ ऐसी फिल्मों को देखें और पालक उन्हें कहें कि वे अपने दैनिक जीवन में इसका प्रयोग न करें |

रविराजकाशी का अस्सी उस कालखंड में लिखी गई जब देश में उदारवाद का उदय हो रहा था|  इस उपन्यास को मंडल, कमंडल, कर्मकांड, पाखण्ड और कट्टरपंथ का दर्पण भी कहा जाता है | क्या मुहल्ला अस्सी में इस मूल से भी मुलाक़ात होगी ? 

डॉ.चंद्रप्रकाश : इस उपन्यास के बारे में बिलकुल सही कह रहे हैं आप |  लेकिन ‘मुहल्ला अस्सी’ में इसकी कुछ ही झलकियाँ देख पाएंगे आप | क्योंकि जैसे मंडल, कमंडल या रामजन्मभूमि का आंदोलन आदि | यह तमाम चीजें उपन्यास की पृष्ठभूमि में जो आप देख रहे हैं, वह मेरा फोकस नहीं है, बल्कि वह प्रवाह का हिस्सा है | काशीनाथ जी ने जिस जगह पर थम कर विचार रखे हैं वह बनारस में पप्पू की चाय दुकान है | जिस ओर आपका इशारा है उसके बारे में कहूँ कि आम तौर पर हमारा दर्शक राजनैतिक फ़िल्में देखना बहुत पसंद नहीं करता है | धर्मनाथ पाण्डेय की कहानी में पप्पू की चाय दुकान कहीं नहीं है, लेकिन मैं किसी तरह पप्पू की चाय दुकान को ले आया हूँ | उसके कारण हैं, वह यह कि पप्पू की चाय दुकान में जो बहसें, लड़ाई - झगडे होते हैं, जो फत्तवे जारी किये जाते हैं, उसे रखना ज़रुरी है | पप्पू की दुकान के बिना ‘काशी की अस्सी’ की कल्पना नहीं की जा सकती है |

रविराज : ऐसा अक्सर देखा जाता है कि इतिहास या साहित्य पर बनाई गई फ़िल्में अपनी मूल से भटकर कहीं और उलझ जाती है, मेरे ख्याल से उसका यह कारण होता है कि फिल्मकार अपनी कहानी से ज्यादा व्यवसाय पर ध्यान देने लग जाता है | कहीं मुहल्ला अस्सी भी अपनी कहानी से इतर बात तो नहीं करने लगेगी ?         

डॉ.चंद्रप्रकाश : नहीं, बिलकुल नहीं | ‘काशी का अस्सी’ को हमने चुना ही इसलिए था कि इसमें वह सबकुछ है जिसे दर्शक देखना चाहता है |  फ़िल्म की पूरा अंदाज़-ए-बयां हास्य और व्यंग्य से भरा है |   और आप तो जानते हैं कि व्यंग्य में चोट भी होते है और अपनी बात को भी हँसते हँसते कहा भी जाता है | इसलिए यह खतरा मुझे नहीं लगता है | न ही मुझे दूर दूर तक यह नुकसान का सौदा लगता है | आत्मविश्वास के साथ कहता हूँ कि यह सौ प्रतिशत प्रॉफिट मेकिंग फ़िल्म है|   

द्वारा - रविराज पटेल

संपर्क : +919470402200  E-mail : ravirajpatel.india@gmail.com

 


-रविराज पटेल

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