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राजेश दुबे


धनंजय कुमार



रूद्रभानु प्रताप स

From Film Desk:
हिंदी फ़िल्में - टीवी और हिंदी
-हिंदी पखवाड़े के उपलक्ष्य में


हिंदी पखवाड़े के अवसर पर..

प्रिय सदस्यों,

“राष्ट्रभाषा के बिना देश गूँगा है”- बापू (महात्मा गाँधी) का यह कथन मैंने अपनी अंग्रेज़ी पाठशाला की दीवारों पर लिखा हुआ पढा था. आज भी मुझे वह कथन  तब - तब याद आता है,  जब - जब हिंदी भाषा की वर्तमान स्थिति पर चर्चा होती है. और चिंतन करने लगता हूँ कि क्या इस कथन को सच माना जाये? उस तर्क से तो फिर यह महान देश बेज़ुबान है, क्योंकि आज भी हमारे देश की कोई अधिकारिक राष्ट्रभाषा नहीं है.

हिंदी के प्रचार और प्रसार के लिए सरकार हर साल सितम्बर में हिंदी पखवाड़ा मानती है जिसमें हिंदी में काम काज करने को प्रोसाहन दिया जाता है.  

फिल्म रायटर्स एसोसिएशन की वेबसाइट का संपादक होने के नाते मैंने सोचा कि हमारी  वेबसाइट पर भी हिंदी पखवाडा मनाया जाये. प्रेरणा मिली एक सदस्य रूद्रभानु प्रताप के एक आलेख ‘कहाँ खड़ी है हिंदी’ से, जिसे जो मैंने copy-paste किया है. और साथ ही फ़िल्म और टीवी जगत के कुछ लेखकों से, जो हिंदी में लिखते है, आलेख मँगवाये हैं.

प्रसिद्ध टीवी लेखक श्री राजेश दुबेजी और भोजपुरी टीवी और फ़िल्मों के लेखक श्री धनंजय कुमारजी ने लेख भेजे है और हमारे एक लेखक पत्रकार सदस्य श्री रुद्रभानु प्रताप सिंह ने भेजा हुआ लेख भी इसमें शामिल है. इनके अलावा भी अगर कोई अन्य सदस्य इस विषय पर लिखना चाहें, तो उनका स्वागत है.

‘फ़िल्मों और टीवी में हिंदी की स्थिति’ ये अपने आप में वाद-विवाद, तर्क-वितर्क का मुद्दा है. जहाँ एक तरफ हम अंग्रेज़ी की शुद्धता और क्लिष्टता को अंग्रेजी के विशेष ज्ञान से जोड़ते हैं, वहीं दूसरी तरफ हिंदी की शुद्धता का मज़ाक उड़ाते हैं.

पर फ़िल्मों के बारे में एक चीज़ साफ रहती है कि फिल्में जीवन को दर्शाने की चेष्टा करती हैं. लोग जिस तरह से बातचीत करते हैं, वैसे ही संवाद लिखे जाते है. इसलिए जिस परिवेश (milieu)में फ़िल्म की कहानी घटित हो रही है, संवाद उसी तरीके के होते है. अगर आम लोग शुद्ध हिंदी में बातें नहीं करते हैं, तो फ़िल्मों के किरदारों की भाषा भी वैसी ही होगी.

जहाँ महाभारत वाली हिंदी लोगों ने पसंद की, वहीं वो लोग मुन्नाभाई वाली हिंदी से भी प्रेम करते है. मैं इसे भाषा के अलग अलग रंग मानता हूँ और हर रंग का आनंद लेता हूँ. लेकिन जैसे जैसे अंग्रेज़ी स्कूलों में पढ़ी पीढ़ी फ़िल्मों की बागडोर अपने हाथों में थाम रही है, वो वही भाषा बोल रही है, जो वो समझ सकती है. फलस्वरूप हिंदी के शब्दों को अंग्रेज़ी के ‘words’ से ‘replace’ करके ‘simple’ बनाया जा रहा है. इस सब से यही डर लगा रहता है कि कहीं आने वाले कुछ दशकों में सारी हिंदी ही ना अंग्रेज़ी से ‘replace’ हो जाये.

1980 में FWA का रजतोत्सव मनाया गया था. जिसकी पत्रिका भी निकली थी. उसी में प्रकाशित महेंद्र सरलजी के लेख ‘Down Memory Lane’ से हिंदी-अंग्रेज़ी का एक दिलचस्प किस्सा सुनिए.

बात FWA के बचपन की है (1950 के दशक की) जब हमारा कोई दफ्तर नहीं हुआ करता था और हमारी कार्यकारिणी समिति की सभाओं के लिए ढंग की जगह तलाश करना मीटिंग का पहला एजेंडा होता था. मतलब यूँ समझ लीजिये कि जगह इतनी अहम होती थी कि मीटिंग की तारीख और समय भी उसकी उपलब्धता पर निर्भर हुआ करते थे. उस दिन दादर स्टेशन (पश्चिम) के बाहर एक कोचिंग सेंटर का classroom मीटिंग के लिए उपलब्ध हो पाया. चूँकि रविवार को classes की छुट्टी होती थी, classroom सिर्फ उसी दिन मिल सकता था इसलिए मीटिंग भी रविवार को रखी गयी.

क़मर जलालाबादी उन दिनों FWA के सेक्रेटरी थे और मीटिंग के दौरान ख्वाजा अहमद अब्बास ने सुझाव दिया कि Association के सेक्रेटरी को अंग्रेज़ी भाषा में प्रवीण होना चाहिए. इस सुझाव से मीटिंग में बहस छिड़ गयी. कमर जलालाबादी, जो आम तौर पर शांत स्वभाव के थे, अचानक भड़क गए और पूछने लगे, “क्या आप ये कहना चाहते हैं कि मुझे अंग्रेज़ी नहीं आती?” और उन्होंने आगे सवाल भी किया, “अच्छा चलिए, हमें समझाइये कि भला अंग्रेज़ी में महारत क्यों ज़रूरी है? क्या हम अंग्रेज़ी में फ़िल्में बनाते हैं? या अंग्रेज़ी फ़िल्मों के लेखकों का संघ है?”
फिर पंडित सुदर्शन जी की मध्यस्थता से मामला ठंडा हुआ.  

बहरहाल, आज तो FWA का सारा काम अंग्रेज़ी में हो रहा है और हमारी website पर भी लगभग आलेख और सूचनाएँ अंग्रेज़ी में ही होते हैं. क्योंकि website के templates/fonts English में आसानी से मिल जाते है, निर्माताओं के agreements English में हो रहे है, court में इंग्लिश बोली जा रही है, संसद में भी और यहाँ तक कि हिंदी फ़िल्म के script का narration भी इंग्लिश में हो रहा है.  

हिंदी सरल है पर हिंदी की राह कठिन. English में काम आसानी से हो जाता है, मोबाइल पर message लिखने से लेकर किसी भी software में Script लिखने तक. हमें हिंदी को अपनाना भी सरल करना होगा. जो जानते हैं उन्हें औरों को सिखाना होगा. सभी के मोबाइल में, कंप्यूटर पर, Script software में, हर जगह हिंदी में लिखने की सुविधा है. हमे इसका इस्तेमाल बढ़ाना होगा, अपनी अगली पीढ़ी को हिंदी पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना होगा. और सबसे ज्यादा ज़रूरी, हिंदी बोलते समय गर्व महसूस करना होगा. मेरा मानना है शुद्धता को लेकर बखेड़ा खड़ा करने के बजाये लोगों को पहले हिंदी से जोड़ना ज्यादा ज़रूरी है. फिर वही समझ जायेंगे की हिंदी ज्यादा तर्कसंगत भाषा है.     

संजय शर्मा

 

हिंदी दिवस के बहाने

सिर्फ दिल बहलाव है हिंदी दिवस

- धनंजय कुमार

हिंदी के नाम पर 14 सितंबर को हर साल प्रायोजित सरकारी और गैर सरकारी विलाप होता है, लेकिन हिंदी निरंतर खतरे के निशान की तरफ बढ़ती जा रही है. और विडम्बना यह है कि इसे रोकने के लिए न तो निरीह हिंदी भाषी जनता कुछ कर पा रही है और न ही हमारी शक्तिशाली भारत सरकार. दोनों मजबूर हैं ! और हिंदी बहादुरी के साथ वीरगति के पथ पर अग्रसर है!

देश के रोजगार की भाषा हिंदी नहीं है, इसलिए हमारे बच्चों की शिक्षा का माध्यम भी हिंदी  नहीं है. अपने समाज और देश में सम्मान पाने की भाषा हिंदी नहीं है, इसलिए आपसी बोलचाल की भाषा भी हिंदी नहीं है. देश के सारे समझदार लोग या तो अंग्रेजी में बोलते हैं या रोमन हिंग्लिश में. फिर कैसे बचेगी हिंदी ? बहरहाल, हिंदी के नाम पर सरकारी गैर सरकारी ढोंग का कोई मतलब नहीं. हिंदी अब हमारी अस्मिता की भाषा नहीं रही, इसलिए उसके निरंतर ह्रास से भी हमें कोई परेशानी नहीं होती. हम उसके क्षय के मौन दर्शक बने हैं. और बस दिल बहलाने के लिए हम हर साल 14 सितम्बर को हिंदी दिवस मना लेते है. आम तौर पर, किसी को याद करने की परम्परा उसके नहीं होने के बाद निभाई जाती है, लेकिन हिंदी के होते ही यह परम्परा हम निभा रहे हैं ! क्या यह अपनी भाषा के प्रति हमारा उत्कट प्रेम और अद्भुत सम्मान है ?!

हिंदी की गति ऎसी क्यों हुई, इसके कारणों पर किसी शोध की आवश्यकता नहीं है. इसके कारण हम सबको अच्छी तरह पता हैं. स्वतंत्रता के 68 साल बाद भी हिंदी को हम अपने भारत की राष्ट्रभाषा नहीं बना पाये हैं. यह अपने आप में दिलचस्प है कि भारत दुनिया का संभवतः एक मात्र ऎसा देश है, जिसकी कोई अपनी आधिकारिक राष्ट्रभाषा नहीं है. देश का संविधान लागू होने से पहले राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हार्दिक इच्छा थी कि हिंदी को भारतवर्ष की राष्ट्रभाषा घोषित किया जाय, लेकिन कुछ गैर हिंदी प्रदेशों के राजनीतिज्ञों ने इसे अपनी क्षेत्रीय अस्मिता के भाषाई और सांस्कृतिक अस्तित्व से जोड़ लिया और हिंदी को राष्ट्रभाषा के बजाय देश की राजभाषा के तौर पर अंग्रेजी के बाद का दूसरा स्थान मिला. इसमें भी विडम्बना (हालाँकि मैं इसे षडयंत्र मानता हूँ) यह रही कि पूरे देश तो छोड़िये, हिंदी प्रदेशों में भी सरकारी कार्यालयों के कामकाज की मूल भाषा अंग्रेजी ही बनी रही. हिंदी को आगे बढ़ाने के लिए हिंदी विभाग अवश्य खोले गए, लेकिन यह काम हिंदी अधिकारियों के भरोसे छोड़ दिया गया. और हिंदी अधिकारी महज अनुवादक की भूमिका निभाते रहे. वह अनुवाद भी इतना तकनीकी और बनावटी रहा कि आम हिंदी भाषियों के लिए भी सरकारी हिंदी समझना दुरुह था. परिणाम हुआ आम हिंदी भाषियों ने भी अपनी जरूरत के समय हिंदी के स्थान पर अंग्रेजी को ही अपनाना सरल समझा. इस तरह हिंदी आगे बढ़कर भी पिछड़ती गई. हिंदी अनपढ़ों या कम पढ़े लिखों की भाषा भी न बन सकी. लोगों ने अपना काम तो किसी तरह चलाया, लेकिन देश में अच्छी नौकरियाँ पाने का आधार अंग्रेजी शिक्षा ही बनी रही, इसलिए हिंदी भाषियों को भी अपने बच्चों का भविष्य अंग्रेजी में ही दिखा. उदारीकरण के बाद नौकरियाँ पाने में अंग्रेजी की भूमिका और भी बड़ी हो गई. हिंदी  भाषियों ने भी अपने बच्चों को हिंदी माध्यम के स्कूलों-कॉलेजों में पढ़ाने के बजाय अंग्रेजी माध्यमों में पढ़ाना आवश्यक समझा. नतीजा हुआ कि बच्चों की शिक्षा का माध्यम भी हिंदी की जगह अंग्रेजी बन गई.

देश भर में (खासकर गैर हिंदी भाषी प्रदेशों में) हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए सरकारी स्तर पर कुछ संस्थान खोले गये, लेकिन उनका काम भी रस्मी ही रहा. क्योंकि जब आम आदमी को अपने दैनिक जीवन में हिंदी की आवश्यकता ही नहीं, तो फिर वह हिंदी समझने और सीखने पर अपना समय क्यों नष्ट करें!

हिंदी के प्रचार प्रसार में इन संस्थानों से ज्यादा योगदान हिंदी फिल्मों माना जाता रहा है और यह सच भी है. जहाँ लोग हिंदी नहीं जानते, वहाँ भी हिंदी फिल्में देखी जाती रही हैं. दूरसंचार क्रांति और उदारीकरण से पहले भी राजकपूर की फिल्में और उनके गाने विदेशों में लोकप्रिय थे. टीवी कार्यक्रमों में प्रायः रशियन और चाइनीज हिंदी गाने गाते दिख जाया करते थे. लेकिन अब फिल्मों की भाषा भी तेजी से बदल रही है. उदारीकरण के बाद फिल्मों को भी दुनिया का बड़ा बाजार मिला, परिणाम हुआ फिल्मों के संवाद और गाने हिंदी में लिखे जाने के बजाय हिंग्लिश में लिखे जाने लगे. टीवी सीरियलों में भी बोलचाल की हिंदी यानी हिग्लिश लिखने पर जोर दिया जा रहा है. इससे हिंदी विभाग में अंधेरा बढ़ने का खतरा बढ़ता जा रहा है.

हालाँकि देश में अभी भी कई ऎसे हिंदी प्रेमी हैं, जो मानते हैं कि हिंदी का भविष्य अंधकारमय नहीं, बल्कि संभावनाओं से भरा है, इसलिए एक दिन हिंदी खत्म हो जायेगी, इस बात की कल्पना करके छाती पीटने और निराशावादी होने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन सच क्या है...? सच यह है कि वह भी अपने दैनिक जीवन में हिंदी के स्थान पर अंग्रेजी बोलते हैं या जरूरत पड़ने पर हिंग्लिश बोलते हैं. ऎसे कथित हिंदी प्रेमी (मैं इन्हें कथित ही मानता हूँ) प्रायः यह बोलते पाए जाते हैं कि हिंदी को सरल रहने दीजिए, शुद्धतावादी मत बनिए. शुद्ध हिंदी के चक्कर में उसे किताबी या महाभारतकालीन हिंदी मत बनाइए. क्या अंग्रेजी के संदर्भ में कोई ऎसा बोलता दिखता है..?! वहाँ तो आप जितने ही कठिन शब्द या वाक्य विन्यास का प्रयोग करें, आप उतने ही बौद्धिक कहलायेंगे, लेकिन अच्छी हिंदी बोलने या लिखनेवाला महभारतकालीन हो जाता है, हँसी का पात्र बन जाता है. क्यों? इसका संबध सिर्फ और सिर्फ हमारे आत्मगौरव और हिंदी के प्रति प्रेम से है. जो बाहरी तौर पर हिंदी दिवस या हिंदी पखवारा के अवसर पर दिखता तो है, लेकिन बाकी दिनों में विलुप्त हो जाता है. विडम्बना तो यह है कि इन्हीं में से कुछ लोगों ने यह माँग भी करनी शुरू कर दी है कि हिंदी को देवनागरी में लिखने के बजाय रोमन में लिखा जाय. मुझे लगता है यह सब हिंदी को बचाने के बजाय निपटाने का प्रयास है. ऎसे हिंदी प्रेमी (इन्हें सेलिब्रिटी कहना ज्यादा सही है) प्रायः हिंदी दिवस और हिंदी भाषा पर चर्चा के दौरान मंचों और टीवी कार्यक्रमों में पुरोहित के तौर पर प्रकट होते हैं. बाकी जीवन में अंग्रेजी या हिंग्लिश बोलते हुए ही गौरवान्वित महसूस करते हैं.

हिंदी सिनेमा जगत में ऎसे पुरोहितों की बहुतायत है. उदारीकरण के बाद जब फिल्में वैश्विक हुईं, तब तो फिल्मों की भाषा भी हिंग्लिश होने लगी, लेकिन उसके पहले भी हिंदी फिल्म जगत में अंग्रेजी और अंग्रेजी दाँ लोगों की पकड़ ज्यादा मजबूत थी. अंग्रेजी बोलना गौरव और प्रतिष्ठा की बात थी. इसलिए देख लीजिए, फिल्म के निर्माता संगठनों से लेकर हमारे लेखक संगठन का नाम भी अंग्रेजी में है “फिल्म रायटर्स एसोसिएशन”. उसका संविधान अंगेजी में है. उसके कामकाज की भाषा अंग्रेजी है. उनके पत्र व्यवहार अंग्रेजी में होते हैं. उनकी कार्यकारिणी समिति की सभाएँ अंग्रेजी या हिंग्लिश में होती है. सभाओं में किन विषयों पर चर्चा हुई और क्या निर्णय लिए गये, उसका अभिलेख भी अंग्रेजी में ही लिखा जाता है.      

मंचों पर बोलना होता है तो हम बड़े गर्व से कहते हैं कि अंगेजी और चीनी भाषा के बाद पूरी दुनिया में बोली और समझी जानेवाली तीसरी सबसे बड़ी भाषा हमारी हिंदी है. लेकिन सत्य यह है कि अच्छी हिंदी समझने, बोलने और लिखने वालों की संख्या लगातार कम होती जा रही है. अंग्रेजी शब्दों का चलन बढ़ता जा रहा है और हिंदी के ढेर सारे सामान्य शब्द भी प्रयोग से दूर होते जा रहे हैं. ऎसे में हिंदी को बचाने का प्रयास सिर्फ हमारे कर्तव्य बोध के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. हिंदी को सचमुच यदि अपनी अस्मिता और आत्म गौरव से जोड़े रखना है, तो हिंदी के लिए ईमानदारी से सोचना होगा और न सिर्फ सोचना होगा, हिंदी हमारी आवश्यकता की भाषा कैसे बने, इसपर गंभीर चिंतन, मनन और काम करने होंगे.

इसे इस उदाहरण से भी समझा जा सकता है कि योग को 177 देशों का समर्थन मिला, लेकिन हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने के लिए आजादी के 68 साल बाद भी हम 129 देशों का समर्थन नहीं जुटा पाए हैं.

धनजंय कुमार

 

कहां खडी है हिंदी
रुद्रभानु प्रताप सिंह

'हिंदी को डरने की जरूरत नहीं है, अंग्रेज़ी के बाद पूरे विश्व में यह सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। यह स्पेनिश और चीनी भाषा से आगे निकल गई है। पिछले 5० साल में विश्व में हिंदी भाषियों की संख्या 26 करोड़ से बढ़कर 49 करोड़ और अंग्रेज़ी बोलने वालों की संख्या 33 करोड़ से बढ़कर 51 करोड़ हो गई है। हिंदी की वृद्धि दर अंग्रेज़ी से ज़्यादा है। साहित्य और बोलचाल की भाषा से आगे निकल कर हिंदी अब बाजार की भाषा बन गई है। अब अरबों रुपये के व्यवसाय का माध्यम बन गई है हिंदी।यह आंकड़ा पिछले दिनों एक चर्चित वेबसाइट ने प्रकाशित की। इसके बावजूद इस बात की पड़ताल करने की जरूरत है कि भूमंडलीकरण, उदारीकरण और सूचना-तकनीक के इस युग में हिंदी कहां खड़ी है?

इस बात को परखने के लिए हम दिल्ली के लोधी रोड पर स्थित एनटीपीसी के विशाल कॉरपोरेट कार्यालय पहुंचे। ऑफिस में घुसने के बाद लिफ्ट के सहारे हम तीसरे फ्लोर पर पहुंचे। वहीं बायीं तरफ राजभाषा अधिकारी का कार्यालय है। अन्य विभागों की तुलना में यहां काफी शांति थी। दो-तीन कर्मचारी बड़ी निश्चिंतता से अपने कंप्यूटर पर बैठे थे। कार्यालय के एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ने हमारा परिचय पूछा। जब हमने राजभाषा अधिकारी के बारे में पूछा, तो उसने बताया कि राजभाषा अधिकारी छुट्टी पर हैं। वह कर्मचारी अभी हमें कुछ और बता ही रहा था कि हमारे साथी ने सवाल कर दिया- 'यहां इतनी शांति क्यों है? क्या राजभाषा अधिकारी नहीं हैं, इसीलिए।जवाब देते समय कर्मचारी थोड़ा मुस्कुराया और बोला 'अरे नहीं, ऐसा नहीं है। यहां हलचल तब होती है, जब हिंदी पखवारा शुरू होता है। हिंदी दिवस से लेकर पूरे पंद्रह दिन कार्यालय के सभी लोग व्यस्त रहते हैं। कोई पोस्टर छपवाने में, तो कोई कार्यक्रम की तैयारी करने में। इन दिनों मेरी व्यस्तता भी बढ़ जाती है। रोज कार्यक्रम होते हैं, कविता, कहानी, निबंध प्रतियोगिता और न जाने क्या-क्या। फिर पखवारा खत्म, तो काम भी खत्म। 14 सितंबर आने वाला है, आप लोग भी आइएगा.... देखिएगा कैसी रौनक रहती है.... वैसे यह बात मैं सिर्फ आप लोगों को बता रहा हूं, किसी और से मत कहिएगा।’ 'पक्का किसी से नहीं कहेंगे।यह कह कर हमलोग वहां से निकल गए।
धीरे-धीरे हमलोग मेट्रो की तरफ बढ़े। दोपहर का समय था, शायद इसी वजह से मेट्रो में भीड़ नहीं थी। सीट पर बैठे और बगल वाले से बतियाना शुरू कर दिया। संयोग से उसकी समस्या और हमारी पड़ताल की दिशा एक ही निकली। उसका नाम था मनोज। स्नातकोत्तर करने के बाद वह नौकरी की तालाश में है, मगर अंग्रेजी उसके लिए मुसीबत बन गई है। उसने बताया कि आज एक नौकरी के लिए उसका साक्षात्कार था। साक्षात्कार में सब कुछ तो ठीक था, मगर मुझे सिर्फ इस अधार पर अयोग्य करार दे दिया गया कि मैं अंग्रेजी ठीक से नहीं बोल पाता। वे बोले कि मेरी अंग्रेजी की समझ ठीक नहीं हैं, इसलिए मैं ठीक ढंग से काम नहीं कर पाऊंगा। यही नहीं, बैंक, एसएससी, यूपीएससी हर परीक्षा का यही हाल है। सब में अंग्रेजी अनिवार्य है। हिंदी के नाम पर लोग बड़ी-बड़ी बातें भले कर लें, लेकिन देश में इसकी क्या औकात है, यह बताने की जरूरत नहीं है। 'मैंने हिंदी माध्यम से पढ़ाई करके बहुत बड़ी गलती कर दी।’ 
                 
मनोज के बाद हमारी मुलाकात सचिन से हुई। बिहार के रहने वाले सचिन हिंदी माध्यम से सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। सचिन ने बताया कि हिंदी माध्यम से तैयारी करना आसान नहीं है। अंग्रेजी माध्यम वालों की तुलना में हमें पाठ्य-सामग्री को लेकर खासी परेशानी होती है। हिंदी में वह सामग्री नहीं मिल पाती, जो अंग्रेजी में उपलब्ध है। सिर्फ किताबें ही नहीं, हिंदी माध्यम में शिक्षकों की भी कमी है। ऊपर से सरकार की नीति ऐसी है कि उसका शिकार भी हिंदी माध्यम वाले ही हो रहे हैं। पिछले पांच सालों के यूपीएससी के रिजल्ट पर यदि नजर डालें, तब पता चलता है कि हिंदी माध्यम से परीक्षा देने वालों के पास प्रतिशत में कितनी जबरदस्त गिरावट आई है। इसके बाद हमारी मुलाकात न्यायालयों में हिंदी में सुनवाई के लिए आंदोलन कर रहे श्याम रुद्रपाठक से हुई। अभी कुछ दिन पहले ही वह जेल से रिहा हुए हैं। कहां खड़ी है हिंदी? इस प्रश्न के जवाब में पहले वह गंभीर हो गए, फिर कहा कि जब देश में अपनी भाषा में न्याय मिलना ही मुश्किल है, तो फिर इस प्रश्न का क्या उत्तर दिया जाए कि हिंदी कहां खड़ी है? हिंदी सिर्फ गरीबों की भाषा है। देश का शासक वर्ग तो अंग्रेजीयत मानसिकता में जीता है। न्यायालयों में जब न्यायाधीश फैसला सुनाते हैं, तो सामान्य वादी और प्रतिवादी यह समझ ही नहीं पाते कि फैसला उनके पक्ष में आया है या विपक्ष में। पूरी न्यायिक प्रक्रिया अंग्रेजी में होती है, जो आम आदमी की समझ से परे है। वकील ही लोगों को समझाते हैं कि आप मुकदमा जीत गए या हार गए। देश में सिर्फ दो से तीन फीसदी लोग ही अंग्रेजी बोल और समझ पाते हैं, फिर भी हिंदी के साथ इस तरह का व्यवहार समझ से परे है। 
           
आईटीओ में चाय की एक दुकान पर केंद्रीय विद्यालय के पूर्व प्रधानाचार्य डॉ. मदनमोहन मिश्र से जब यह प्रश्न किया कि हिंदी कहां खड़ी है, तो वह भड़क गए और बोले, 'आप लोग हिंदी दिवस पर हिंदी की आरती उतारते हैं और तिलक अंग्रेजी के माथे पर लगाते हैं। संयुक्त राष्ट्र में हिंदी हमारी नाक होती है और स्वराष्ट्र में उसी नाक को हम अंग्रेजी के जूतों पर रगड़ते रहते हैं। राजभाषा के साथ जैसा छल-कपट भारत में होता है, वैसा दुनिया के किसी भी देश में, किसी भी भाषा के साथ नहीं होता। उसका ओहदा महारानी का है और काम वह नौकरानी का करती है। दुर्योधन के दरबार में उसे द्रौपदी की तरह घसीटा जाता है और भारत के बड़े-बड़े योद्धा - जनवादी कॉमरेड, लोहियावादी नेतागण, संघी संचालकगण, भाजपा के हिंदीवीरों, गांधी की माला जपने वाले कांग्रेसियों और सर्वोदयियों तथा दयानंद के शिष्यों- सभी के मुंह पर ताले लगे रहते हैं। वे बगलें झांकते हैं और खीसें निपोरते हैं। मैं अंग्रेजी का विरोधी नहीं हूं। किसी भाषा या साहित्य से कोई मूर्ख ही नफरत कर सकता है। कोई स्वेच्छा से कोई विदेशी भाषा पढ़े, बोले, लिखे, इसमें क्या बुराई है? जो जितनी अधिक भाषाएं जानेगा, उसके लिए संपर्कों, सूचनाओं, अनुभूतियों और अभिव्यक्तियों की उतनी ही अधिक खिड़कयां खुलेंगी, लेकिन भारत में कुछ अजीब-सा खेल चल रहा है। स्वदेशी भाषाओं और बोलियों के सारे दरवाजे बंद किए जा रहे हैं और विदेशी भाषाओं की सारी खिड़कियां खोली जा रहीं हैं। इस खिड़की का नाम अंग्रेजी है। अगर आप अंग्रेजी नहीं जानते तो कुछ नहीं जानते हैं।

          इनकी बातों के अलावा दूसरा पहलू भी है। हिंदी पर भारत की 35 लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था का आधा हिस्सा टिका हुआ है। यानी अर्थव्यवस्था का आधा भाग हिंदी भाषी क्षेत्र में है। इतना ही नहीं, 29 हजार करोड़ का टीवी कारोबार भी इसी भाषा पर टिका है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब तो अंग्रेजी चैनल भी हिंदी के विज्ञापन दिखाने लगे हैं और बीबीसी, स्टार, सोनी, एम टीवी, डिस्कवरी, नेशनल ज्योग्राफी, हिस्ट्री जैसे अनेक चैनलों ने हिंदी में अपने प्रसारण आरंभ कर दिए हैं। भारत जैसे देश में जहां पढ़े-लिखों की संख्या सिर्फ 48 करोड़ है, वहां 18 करोड़ लोग रोजाना हिंदी का अखबार खरीदते हैं। दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री भी हमारे यहां हैं, जहां सालाना 6०० नई फिल्में बनतीं हैं। इनमें हिंदी की लगभग 15० फिल्में शामिल हैं, जिससे हजारों करोड़ रुपये का कारोबार होता है। बदलते परिवेश में हिंदी ने भी अपने स्वरूप को परिवर्तित किया है। इंटरनेट पर हिंदी की बेबसाइटों में बढ़ोत्तरी हो रही है। इंटरनेट पर हिंदी में कार्य-संस्कृति का विकास लगातार जारी है। हिंदी में लिखने के लिए सी-डैक ने नि:शुल्क सॉफ्टवेयर जारी किया है, जिसमें अनेक सुविधाएं उपलब्ध हैं। माइक्रोसॉफ्ट ने ऑफिस हिंदी के जरिए भारतीयों के लिए कंप्यूटर का प्रयोग आसान कर दिया है। आईबीएम द्बारा विकसित सॉफ्टवेयर में हिंदी भाषा के 65,००० शब्दों को पहचानने की क्षमता है। इंटरनेट पर 5,००० से भी ज्यादा हिंदी ब्लॉग हैं। गूगल से हिंदी में जानकारियां धड़ल्ले से खोजी जा रही हैं। हिंदी यूनीकोड के विकास ने सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर हिंदी लिखना आसान बनाया है। आगे भी यह विकास लगातार जारी है। मगर सवाल अब भी वही है कि इन सब के बीच कहां खड़ी है हिंदी?


-Sanjay Sharma

Critic who loves to appreciate.

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