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सलीम खान


सलीम खान



सुपरहिट नाम

From Film Desk:
सलामत रहें सलीम साहब
-साल गिराह पर खास दुआएं


सदा सलामत रहें सलीम साहब

फिल्मों में लेखक के स्वाभिमान को उचित स्थान दिलाने वाले लेखक सलीम खान जिन्हें नई पीढ़ी सलमान के पिता के रूप में ज्यादा जानती है. सलीम साहब के  अंदर अपने हक और अपनी उपयोगिता को लेकर जो सोच है वो आज भी जस की तस है। ये पंक्ति दो साल मेरे जेहन में आई जब सलीम साहब को भारत सरकार ने पदमश्री देने की घोषणा की लेकिन उन्होंने इसे लेने से इंकार कर दिया क्योंकि उनका मानना था कि वो पदम भूषण डिजर्व करते हैं। बस इसी आग के बूते पर तो उन्होंने अपनी कौम के लिए कई क्रांतिकारी काम किये।

आज उनके 81 वें जन्म दिन पर पेश हैं इं¸डस्ट्री के एक सुलझे हुए लेखक के रिश्तों में उलझन, गिरने और उठने की दास्तान के कुछ अंश..    

बचपन और परिवार

सलीम खान का जन्म 24 नवंबर 1935 को इंदौर के एक संभ्रात मुस्लिम परिवार में हुआ। उनके पिता पुलिस अधिकारी थे। बचपन से ही सलीम खान बेहद खूबसूरत व्यक्तिव के धनी थे। बदकिस्मती से बचपन में ही मुश्किलों का सामना करना पड़ा जब नौ साल की उम्र में ही उनकी मां टीवी की शिकार हो गई। ऐसे में उन्हें अपनी मां से ही दूर रहना पड़ता था। कहीं ना कहीं उनकी मां से दूर रहने की तड़प दीवार में मां के चित्रण में दिखी। वे अच्छे तो दिखते थे ही पढने लिखने में भी अच्छे थे। वे क्रिकेटर भी थे. लेकिन पोस्ट ग्रेजुएशन के दौरान फिल्मों में नायक बनने के लिए उनका जी मचलने लगा।

यूं पकड़ी मुंबई की राह 

इंदौर कॉलेज से एम ए कर रहे सलीम खान को उनके व्यक्तित्व के कारण सभी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी किस्मत आजमाने के लिए आग्रह किया करते थे पर सलीम खान पशोपेश में थे कि मुबई फिल्मी दुनियां का रुख कैसे किया जाए? ऐसे में एक दिन इंदौर में ही ताराचंद बड़जात्या के बेटे कमल बड़जात्या की शादी में उनकी मुलाकात निर्देशक के अमरनाथ से हुए। निर्देशक के अमरनाथ ने उन्हें अपनी अगली फिल्म बारात में एक भूमिका दी। ये फिल्म 1960 में रिलीज हुई पर खास नहीं चली इसके बाद 1970 तक करीब 14 फिल्मों में सलीम खान ने विभिन्न भूमिकाओं को अंजाम दिया जिनमें सरहदी लुटेरा(1966) और तीसरी मंजिल (1966) और दीवाना (1967)में उनकी भूमिका को खास नोटिस किया गया। 

अभिनय से लेखन तक

अभिनय से लेखन में सलीम खान शौकिया तौर पर नहीं आए थे। बतौर अभिनेता एक पहचान बनने के बाद वे बाकायदा मशहूर लेखक अबरार अल्वी के कुछ समय तक सहायक रहे और उन्होंने अब्रार अल्वी की कुछ अधूरी स्क्रिप्ट को पूरा करके निर्माताओं के हवाले किया।

सलीम खान के मुताबिक जंजीर की कहानी भी उन्होंने अकेले ही लिखी और निर्माताओं को बेच दी थी। बाद में स्क्रीनप्ले और डॉयलॉग में जावेद भी साथ आए। हालांकि जावेद अखतर को सलीम तब से जानते थे जब वे सरहदी लुटेरा में सहायक भूमिका निभा रहे थे और जावेद अखतर उस फिल्म में चौथे असिस्टेंट थे। लेकिन सलीम खान के अबरार अलबी से जुड़ने तक जावेद अखतर भी उन दिनों कैफी आजमी के संरक्षण में कुछ गीत और गजलगोई की तालीम लेने लगे थे । कैफी और अबरार अल्वी पास- पास रहते थे इसलिए सलीम जावेद का भी आपस में मिलना जुलना बढ़ गया।

इसी दौरान पैसे की खातिर दौनों ने एक दो फिल्में लिखी जिनमें उनका नाम बतौर  लेखक नहीं दिया गया। लेकिन इसी दौरान रामेश सिप्पी के आग्रह पर दौनों ने सिप्पी फिल्मस को ज्वाइन कर लिया और यहां पर लिखी गई उनकी फिल्म अंदाज से उन्हें खास पहचान मिली। इसके बाद सीता और गीता के साथ राजेश खन्ना की हाथी मेरे साथी ने उनकी पहचान इंडस्ट्री में मुकममल बनाई। इसके बाद शोले, दीवार, त्रिशूल, जैसी फिल्मों के बाद ये लेखक जोड़ी सफलता का पर्याय मानी जाने लगी। लेकिन 1982 में ये जोड़ी टूट गई।

विविध भारती को दिए साक्षात्कार में सलीम खान बताते हैं कि मैं नहीं जानता कि क्या हुआ पर मुझे जावेद ने बताया कि वो अब गीत लिखना चाहता है, जाहिर सी बात है कि फिल्मों की स्क्रिप्ट में मेरे योगदारन को जावेद ठुकरा नहीं सकते हैं पर गीत लेखन में हम दौनों का साथ होना मुझे किसी कोण से भी नहीं सुहाया इसलिए हमने अपने रास्ते अलग कर लिए। 

हेलन का हमराह होना 

सलीम खान की दूसरी शरीके हयात बनी अभिनेत्री हेलन से उनका रिश्ता भी एक  बेसहारा की मदद करने के नाम हुआ। सलीम खान के मुताबिक, मैं हेलन का प्रशंसक रहा था उन्हें जानता नहीं था बाद में उनसे थोड़ी बहुत जान पहचान हुई। जब उनकी जिंदगी में मुश्किलात आए, उनके मैनेजर और पार्टनर रहे पी एल अरोड़ा से वो अलग हो गई। उनके भाई को शराब की लत थीं, काम की तंगी थी।  ऐसे में वे अन्य लोगों की तरह ही मेरे पास मदद के लिए आईं।

मैंने उनके प्रशंसक होने के नाते ही उनकी मदद की और एक झटके में उनको तीन फिल्में साइन करवा दी । इन फिल्मों में मनोज कुमार के सहायक रहे मेरे मित्र चंद्रा बारोट की डॉन ने तो उनके करियर में फिर से प्राण फूंक दिए। इस अहसान के बाद तक उनके साथ मेरा किसी प्रकार का जिस्मानी संबध नहीं था। क्योंकि मैं अपनी पहली पत्नी सुशीला और बच्चों के साथ बहुत खुश था लेकिन जब मुझे अहसास हुआ कि उन्हें मेरी सहानुभूति की नहीं संरक्षण की जरूरत है तो ना चाहते हुए भी मैं उनके करीब आ गया। .. ..सिर्फ अहसान करके आदमी बड़ा नहीं होता रिश्ते निभाने से होता हैं। ये बात हेलन ने मुझे सिखाई और ये सुशीला की महानता थी कि उसने मेरा साथ दिया और हमारा परिवार बिखरा नहीं।   

जब वर्षों बाद सुनी तालियों की गड़गड़ाहट

 सिनेमा से जुड़े लोग जानते हैं, कि जावेद से अलग होने के बाद अधिकतर निर्माताओं ने बतौर लेखक जावेद अखतर से अपनी स्क्र्प्टि लिखवाई और सलीम साहब के पास ज्यादा काम नहीं था. सलीम खान के मुताबिक, उन दिनों मुझे काम से ही मानो परहेज सा होने लगा। काफी समय बाद मैंने एकल लेखक के रूप में महेश भटट् के लिए ‘नाम’ लिखी। इस फिल्म का पहला शो फिल्म से जुड़े लोगों के लिए रखा गया। इस शो के खत्म होने के बाद सभी ने खड़े होकर मेरे लिए तालियां बजाईं। काफी समय बाद तालियों की गड़गड़हाट सुन के आखें नम हो गईं।

 

 


-Dharmendra Upadhyay

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं।

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