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Sachin Bhowmick

From Film Desk:
Sachin Bhowmick
-जीते जी ना रुकी जिनकी कलम


जीते जी ना रुकी जिनकी कलम

17 जुलाई जयंती विशेष- सचिन भौमिक

अगर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री बेमिसाल किस्सागोई की बात करें तो लेखक के तौर पर  एक नाम हिंदी सिनेमा में हमेशा याद किया जाएगा वो है सचिन भौमिक का। सचिन भौमिक बॉलीवुड के ऐसे लेखक रहे जिनके विचारों  से हर बड़ा निर्देशक अपनी फिल्मों को लाभाविंत करना चाहता था। लेखनी से उनका अजब रिश्ता था वो जब तक जिए  लिखते रहे। नरगिस के अभिनय के लिये याद की जाने वाल फिल्म  लाजवंती (1958)  उनकी पहली फिल्म थी जबकि सुभाष घई की युवराज (2008 ) अंतिम। जानकारों की मानें तो कहानी लिखते हुए तत्कालीन समय की समझ और समाज की पसंद नापसंद पर उनकी गहरी पकड़ रहती थी। साथ ही कहानी सुनाने की उनकी कला भी बहुत असरदार थी जिसके चलते वे निर्माता निर्देशक को आसानी से अपना कायल कर लेते थे। करियर के पचास सालों में सचिन भौमिक ने 100 से ज़्यादा फ़िल्मों की कहानियां लिखीं,  25 से अधिक फ़िल्मों के वे सह लेखक रहे।

यह सचिन भौमिक की समय के साथ अपनी सोच बदलते रहने की अद्भुत क्षमता का ही कमाल था कि दौर पर दौर बदलते रहे और सचिन कभी भी फ़िल्म उद्योग में आउट डेटेड नहीं हुए। इस बीच राही मासूम रज़ा, कमलेश्वर,  गुलज़ार, और सलीम जावेद उभरे  हिट हुए और फिर ख़ामोश हो गए या फिर फिल्म की दूसरी धाराओं जैसे निर्देशन , गीत लेखन जैसी ज़िममेदारियां संभालने लगे लेकिन सचिन भौमिक पचास साल तक कहानी लेखन में ही जुटे रहे।

 

बंगाल से बॉलीवुड तक

कोलकाता में 17 जुलाई 1930 को जन्मे सचिन भौमिक की शिक्षा कोलकाता में ही हुई।  लिखने में उनकी रुचि शुरू से ही थी। ग्रेजुएशन के दौरान ही उनका पहला बांगला उपन्यास प्रकाशित हो गया। इस पर उनके शुभ चिंतकों ने उन्हें फ़िल्मी दुनिया का रास्ता दिखाया। 1957 में वे मुंबई पहुच गए। और उन्हें बॉबे टाकीज़ के  लेखन विभाग में नौकरी मिल गयी। कुछ ही समय में उन्होंने लाजवंती फ़िल्म की कहानी लिख दी। फिर कंपनी से और काम मिलने का इंतज़ार करने लगे। इस दौरान वे अपने बंगाली लेखक साहित्यकारों के संपर्क का हवाला देते हुए बिमल राय, गुरू दत्त सहित कई लोगों से मिले, लेकिन उन्हें लेखन का काम नहीं मिला।

उस समय जब वो एक अच्छा अवसर पाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। तभी एक दिन उन्हें ऋषीकेश मुखर्जी मिले। ऋषि दा ने उनसे वादा किया कि वे उनसे फ़िल्म लिखवाएंगे। और कुछ समय बाद उन्होंने सचिन से फिल्म अनुराधा लिखवाकर अपना वायदा पूरा किया। अनुराधा को व्यावसायिक सफलता तो नहीं मिली  लेकिन इस फिल्म को राष्ट्रपति पुरस्कार मिला और कांस फिल्म महोत्सव में आमंत्रित की गयी। साहित्य में गहरी दिलचस्पी और ज़बरदस्त याददाश्त इन विषेशताओं के बल पर सचिन भौमिक ने जल्द ही अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी। किसी भी देखी हुई फिल्मों के सीन उन्हें भलीभांति याद रहते थे।

हिट का सिलसिला

सचिन भौमिक जब मुंबई पहुंचे तो उन्हें अच्छी तरह से हिंदी नहीं आती थी लेकिन मुंबई में हिंदी लेखक मित्रों की बदौलत उन्होंने हिंदी सीख ली। फिर वे फिल्मकारों का भाग्य बदलने वाले कहानीकार साबित होने लगे। उनकी कहानियों पर कई   फ़िल्मकारों ने अपनी पहली हिट फिल्म दी। जे ओमप्रकाश के लिये लिखी फिल्म ‘आयी मिलन की बेला’ (1964) उनकी पहली हिट फ़िल्म साबित हुई। इसके बाद उनकी लगातार दो और फ़िल्में – ‘आए दिन बहार के’ और ‘आया सावन झूम के’  भी हिट रहीं इनकी कहानियां भी सचिन ने ही लिखीं थी।

फिल्मकार प्रमोद चक्रवर्ती की पहली हिट फिल्म ‘जिद्दी’ की कहानी भी सचिन की कलम से ही निकली थी जिसके बाद सचिन ने प्रमोद के लिए नया ज़माना, जुगनू, वारंट, ड्रीम गर्ल और अन्य फिल्में लिखी जो अपने समय की बेहद सफल फिल्में रहीं। इसके अलावा शक्ति सामंत के लिये सचिन ने ‘एन इवनिंग इन पेरिस’ और आराधना, जैसी हिट फिल्में लिखीं।  अमिताभ की बेमिसाल, नास्तिक, के अलावा ऋषि कपूर अभिनीत जहरीला इनसान, जिंदादिल और 1975 में रिलीज हुई फिल्म खेल खेल में भी उन्होंने लिखी। । उन्होंने अनुराधआ के बाद ऋषीकेश मुखर्जी के लिये मेम दीदी, छाया, गोलमाल, अनुरोध लिखी। नासिर हुसैन की मेगा हिट ‘हम किसी से कम नहीं’ और ‘कारवां’ जैसी फिल्में भी सचिन भौमिक की कलम से सजीं थी। 

सुभाष घई से खास रिश्ता

यूं तो उन्होंने हर बड़े निर्देशक के लिए फिल्म लिखीं लेकिन प्रमोद चक्रवर्ती के बाद उनका रिश्ता अपने जमाने के बड़े निर्देशक सुभाष घई से खास रहा जो उनके अंतिम दिनों तक कायम रहा।  सचिन ने सुभाष घई की ब्लाक बस्टर फ़िल्में कर्ज़, विधाता, कर्मा, सौदागर को अपनी लेखनी से अंजाम दिया। 

रास नहीं आया निर्देशन

कई हिट फिल्मों को लिखने के बाद उन्होंने सुपर स्टार राजेश खन्ना और शर्मीला टैगोर को साथ लेकर 1973 में ‘राजा रानी’ निर्देशित की थी जिसकी पटकथा भी उन्होंने ही लिखी थी। लेकिन फिल्म चली नहीं और सचिन को भी अहसास हो गया कि वो किस्सागोई तक ही सीमित रहें।  इसके बाद खुद को भले ही लेखन के लिए समर्पित कर दिया हो पर इसे हिंदी फिल्मों का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि एक साल में कई हिट फिल्में लिखने वाले सचिन भौमिक को अन्य दूसरे लेखकों के मुकाबले फ़िल्म इतिहास में वो पहचान ना मिल सकी। गौरतलब है कि सचिन भौमिक सलीम जावेद के उदय से पहले ही लगभग 20 हिट फ़िल्में दे चुके थे। वैसे भी उन्होंने जितनी हिट फिल्में दीं उतनी कोई दूसरा लेखक नहीं दे सका। लेकिन  अपने लंबे कैरियर में उन्हें महज़ दो फिल्मों 1968 में ब्रह्मचारी और 1969 में आराधना के लिए बेस्ट स्टोरी राइटर का फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला।

लेखनी की बदलती दिशा

उनकी लिखी फिल्मों को देखकर आश्चर्य होता है कि सातवें दशक में आन मिलो सजना, और आराधना लिखने वाला लेखक तेज़ी से बदल रहे भारतीय समाज में करन-अर्जुन, तू खिलाड़ी मैं अनाड़ी, सोल्जर, और कोई मिल गया जैसी फि ल्में भी लिख देता है। सचिन की अंतिम फ़िल्मों में कृष किसना, और युवराज(2008) थीं। नए लेखकों के लिये सचिन के दरवाज़े हमेशा खुले रहते थे। वे परंपरावादी विचारों के आधुनिक सोच रखने वाले लेखक थे। 12 अप्रैल 2009 को सचिन भौमिक का मुंबई में निधन हो गया। चाहे हिंदी सिनेमा के तिहास में उनके काम को लेकर ज्यादा चर्चा नहीं हुई हो पर जब हम हिट फिल्मों में उनके लेखन क्रेडिट को देखते हैं तो दातों तले उंगली दबाए बगैर नहीं रह पाते। ताजिंदगी सक्रिय रहे लेखक को उनकी जयंती 17 जुलाई पर सादर नमन।

 

 

 


-Dharmendra Upadhyay

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं।

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