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K A Abbas

From Film Desk:
K A Abbas
-मानव समाज के सिनेमाई सेवक


मानव समाज के सिनेमाई सेवक
के ए अब्बास

7 जून सालगिरह पर सादर नमन

सिनेमा को लेकर सामाजिक प्रतिबद्धता को अगर फिल्मकारों में देखें तो एक नाम सबसे पहले आएगा वो है लेखक निर्देशक खवाजा अहमद अब्बास का जिनका हर सिने सृजन सदैव समाज के लिए रहा। अब्बास साहब ने जो फिल्में लिखी वे ना केवल भारतीय फिल्मों के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हुईं बल्कि बॉक्स ऑफिस पर भी हिट रही। उन्होंने कई शानदार फिल्में बनाईं जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली फिर भी एक फिल्मकार के रूप में उनका नाम सदैव नजर अंदाज किया जाता रहा। उनके फिल्मी योगदान पर चर्चा ना के बराबर हुई है।  अब्बास साहब ने पत्रकारिता की हो, साहित्य रचा हो या फिर फिल्में बनायीं हों, उन्होंने बुरे से बुरे हालात में भी सामाजिक प्रतिबद्धता से मुंह नहीं मोड़ा। अपने निर्देशन की फिल्मों में उन्होंने गरीबी, अकाल, छुआ-छूत, सांप्रदायिकता और समाजिक असमानता जैसे मुद्दों को केंद्र में रखा। हर फिल्म जो उन्होंने बनायी, उसके पीछे मकसद हुआ करता था।

शुरुवाती लेखन और फिल्मों से जुड़ाव

खवाजा अहमद अब्बास का जन्म 1914 में पानीपत में हुआ था। 1935 में अलीगढ़ विश्वविद्यालय से एलएलबी की डिग्री हासिल की। लेकिन इसी दौरान पत्रकारिता में उनकी दिलचस्पी पैदा हो गयी। वे दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अखबार नेशनल सेल और अलीगढ़ से निकलने वाले समाचारपत्र अलीगढ़ ओपीनियन में कॉलम लिखने लगे। उनकी लेखनी का रुझान फिल्मों की तरफ था इसलिए इसके बाद जब वे बॉबे क्रॉनिकल से जुड़े तो उन्हें फिल्मों की समीक्षा लिखने का काम सौंपा गया। इसके बाद फिल्मी क्षेत्र उनका नाम चर्चित होने लगा। अब्बास साहब का समीक्षा, टिप्पणी लिखने का अपना अंदाज़ था, जो बहुतों को चुभता था। वी शांता राम की फिल्म आदमी की रिलीज डेट कई बार टल चुकी थी इस पर अब्बास साहब ने टिप्पणी की कि शायद शांताराम का आदमी पूना से पैदल चल कर बंबई आ रहा है और ऐसा लगता है कि राह में थक कर किसी पेड़ के नीचे सो गया है। इस टिप्पणी से शांताराम खासे नाराज हुए। जब आदमी रिलीज हुई तो फिल्म समीक्षक की हैसियत से अब्बास साहब को फिल्म देखने के लिए नहीं बुलाया गया। लेकिन अब्बास साहब ने फिल्म अपने पैसे से देखी और फिल्म की तारीफ  में लंबा चौड़ा लेख लिखा।

फिल्म लेखन और निर्देशन

 अब्बास साहब की बेबाक टिप्पणियों से तिलमिलाए कई फिल्मकारों ने टिप्पणी की कि फिल्म समीक्षा लिखना आसान होता है लेकिन फिल्म बनाना बहुत मुश्किल। अब्बास ने इस चुनौती को स्वीकार किया और एक कहानी लिखी। बॉंबे टाकीज ने इस कहानी पर नया संसार (1941) नाम से फिल्म बनायी। इसमें अशोक कुमार और रेनुका देवी ने अभिनय किया। एक पत्रकार को आधार बना कर लिखी गयी नया संसार की कहानी की काफ़ी प्रशंसा हुई। फिल्म ने रजत महोस्तव मनाया। इसके बाद खवाजा को तीन और फिल्मों की कहानियां लिखने का प्रस्ताव मिला। लेकिन जब ये फिल्में रिलीज हुईं तो खवाजा को यह देख कर हैरत हुई कि जो कहानी उन्होंने लिखीं उसके कुछ अंशों को छोड़ कहानी पूरी तरह बदल दी गयी।

जब उन्होंने इसकी शिकायत निर्देशकों से की तो उन्हें जवाब मिला की अपनी लिखी कहानी पर हूबहू वैसी ही फिल्म देखना चाहते हो तो फिल्म का निर्देशन खुद कर लो क्योंकि निर्देशक अपनी जरूरतों के हिसाब से कहानी में बदलाव तो करेगा ही। फिर क्या था? अब्बास ने इस चुनौती को भी स्वीकार किया और उन्होंने अपनी ही लिखी एक कहानी पर फिल्म धरती के लाल(1946)  बनायी। यह भारत की पहली नवयथार्थवादी फिल्म मानी जाती है। इसके साथ ही वे अपने प्रिय राज कपूर के लिए फिल्मों की कहानी लिखते रहे।

 1951 में उन्होंने अपनी मर्जी की फिल्में बनाने के लिए नया संसार नाम से फिल्म कंपनी खड़ी की जिसके बैनर तले उन्होंने अमिताभ बच्चन की अभिनीत फिल्म सात हिंदुस्तानी (1970) सहित 13 फिल्में और बनायी।



फिल्म ग्यारह हज़ार लड़कियां(1962) में कामकाजी महिलाओं की परेशानियों को उजागर किया; शहर और सपना(1963) में फुटपाथ पर जिंदगी बिताने वालों की समस्याओं का वर्णन है और बंबई रात की बाहों में(1967) बना कर महानगरों में रात में चलने वाले गैर कानूनी धंधों का चित्रण किया। इसी क्रम में नक्सल समस्या पर दी नक्सलाइट(1980) और सामुदायिक विकास योजनाओं पर चार दिल चार राहें( 1959) और दो बूंद पानी(1971)  जैसी फिल्में प्रस्तुत कीं।

हालांकि फिल्मी दुनिया के अधिकांश दिग्गज और बुद्धिजीवी सिने समीक्षक उनकी फिल्मों को साधारण डाक्यूमेंट्री ही मानते रहे लेकिन सिनेमा की ताकत का पूरा एहसास रखने वाले अब्बास साहब ने खुद को ज़िंदगी और समाज के कुशल चितेरे के रूप में स्थापित किया। निस्संदेह उन्होंने भारतीय फिल्मों को सामाजिक सरोकारों के करीब किया।

दोस्ती दिल से दिल की

अब्बास साहब  ने करीब 40 फिल्मों की कहानियां और स्क्रीन प्ले लिखे। अपने बैनर के अलावा उन्होंने सबसे ज्यादा फिल्में अपने प्रशंसक राजकपूर के लिए लिखीं। राजकपूर उनकी धरती के लाल से प्रभावित थे इसलिए बरसात के बाद उन्होंने उनसे पहली फिल्म लिखवाई आवारा(1951)।

यहीं से शुरू हुई अब्बास साहब और राजकपूर की दोस्ती जो श्री 420 (1955), जागते रहो (1956) से होती हुई राजकपूर साहब की अंतिम समय तक कायम रही।  ‘मेरा नाम जोकर’ के सताए राजकपूर को फिल्म बॉबी के लेखन में भी अब्बास साहब ने सहयोग किया। कहना गलत नहीं होगा कि राजकपूर ने अब्बास साहब के साथ मिलकर ही हिंदी सिनेमा को नई दृष्टि दी। लेकिन इसका सारा श्रेय राजकपूर को ही दिया जाता रहा है।

जीतेजी कायम रहा सिनेमाई जज्बा

अब्बास साहब का सिनेमाई जुनून उनके आखिरी दिनों तक कायम रहा।

 1 जून 1987 को इस दुनिया को अलविदा कहने से ठीक पहले तक बीमारी से जूझ रहे अब्बास साहब अपनी फिल्म ‘एक आदमी’ की डबिंग का काम पूरा करने में जुटे हुए थे। ये फिल्म उनके निधन के बाद रिलीज हुई। सिनेमा में अब्बास के योगदान का सही मूल्यांकन आज तक नहीं हो सका है। इस लेफटिस्ट लेखक -
फिल्मकार को फिल्म जगत ने वो सममान कभी नहीं दिया जिसके वो असली हकदार थे।

                         धर्मेंद्र उपाध्याय


-Dharmendra Upadhyay

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं।

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