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बलराज साहनी - लेखक भ


पद्मश्री बलराज साह


From Film Desk:
बलराज सहनी - एक लेखक भी
-जन्म जयंती पर विशेष


 कर्मवीर कलाकार बलराज साहनी

 हिंदी सिनेमा जिन सृजनकारों पर हमेशा गर्व करेगा उनमें से एक नाम है लेखक अभिनेता श्री बलराज साहनी का जो अपनी फिल्मों के जरिए हमेशा सिनेप्रेमियों के दिल में रहेंगे। एक अजब संयोग है कि इप्टा में रहकर कामगारों के हक के लिए लड़ने वाले बलराज साहनी का जन्म दिवस और मजदूर दिवस एक ही दिन यानि १ मई को होते हैं।

घर परिवार और बचपन

बंटवारे के बाद पाकिस्तान में आने वाले पंजाब के भेड़ा इलाके में एक आर्य समाजी परिवार में 1 मई 1913 को जन्मे बलराज साहनी को यूं तो बचपन में नाम युधिष्ठिर मिला था, लेकिन फिल्मों में आने के बाद उन्होंने अपना नाम बलराज रख लिया। पंजाव विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम ए करने के बाद वे गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर के शांति निकेतन से बतौर अध्यापक जुड़ गए।  इसके बाद उन्होंने विलायत जाकर बी बी सी रेडियो को चार साल तक अपनी सेवाएं दी। लेकिन अभिनय जगत में कुछ खास करने की दिल में दबी इच्छा लेकर वे आखिर मुंबई आ गए।  

करीब एक दशक का संघर्ष 

अपनी आत्मकथा में उनके छोटे भाई भीष्म साहनी लिखते हैं कि मैं बचपन में दुबला पतला था लेकिन भैया बलराज शुरू से ही तेज दिमाग वाले थे। वो हर चीज को जल्द पकड लेते थे लेकिन बहुत जल्द ही उन्हें उस चीज के प्रति आसक्ति खत्म हो जाती थी । .. .. शायद इसलिए चार साल में ही रेडियो की अच्छी खासी नौकरी से भी 1944 में तिलांजलि देकर वे मुंबई आ गए ।

 यहां उनकी मुलाकात खवाजा अहमद अब्बास से से हुई। इप्टा के नाटकों में लेखन के साथ उन्हें अभिनय के मौके भी मिलने लगे। जानबूझकर सर ओढ लिए संघर्ष के साथ फिल्मों में अभिनय का काम मिलने की शुरूआत हुई फिल्म फिल्म इंसाफ से । इसके साथ ही वो अब्बास साहब की धरती के लाल (1946) में नजर आए। ‘इंसाफ’ बाद में रिलीज हुई। इन दो फिल्मों के बाद उन्हें काम मिलने लगा था।  इस दौरान उन्होंने दूर चलें , गुड़िया, बदनामी, हलचल और हम लोग जैसी फिल्मों में काम किया। हम लोग (1951) के बाद वे लाइम लाइट में आने लगे। और इसी वजह से विमल राय के सहायकों ने उनकी तारीफों के पुल विमल दा से बांधे। विमल दा एक दो मुलाकातों के बाद उनकी काबिलियत से मुतासिर हुए और उन्हें ‘दो बीघा जमीन’ में शंभू महतो का किरदार निभाने का अवसर दिया। 1953 में रिलीज हुई ‘दो बीघा जमीन’ के बाद उन्होंने फिर पीछे मुडकर नहींं देखा।

दो बीघा ज़मीन

 हथकड़ियों में घिरा अभिनेता

बीबीसी की नौकरी को छोड़ सिनेमा में आना बलराज साहनी के लिए कोई मौज शौक का विषय नहीं था। एक लेखक अभिनेता के रूप में अपने काम को अंजाम देते हुए वे कॉमेरड बन सामाजिक सरोकार भी निभा रहे थे। इन्ही सरोकारों के चलते उन्हें एक  बार जेल हो गई। इस दौरान वे के आसिफ की ‘हलचल’ की शूटिंग कर रहे थे। हलचल की शूटिंग में हिस्सा लेने के लिए उन्हें रोज जेल से स्टूडियो लाया जाता था। बखतरबंद गाड़ी में हथकड़ि¸यां पहनाएं उन्हें आठ पुलिस के जवान जब स्टूडियो लेकर पहुचते थे तो  देखने वालों की भीड़ लग जाती थी।

रीटेक बलराज साहनी

अपनी धारदार बातचीत की शैली और प्रभावशाली व्यक्तित्व के चलते उन्हें ‘धरती के लाल’ के बाद फिल्मों में लगातार अवसर मिल रहे थे। वो एकसमर्पित अभिनेता थे। वो उन दिनों खूब रीटेक किया करते थे। ताकि अंतिम शॉट को वो जबर्दस्त दे सकें। लेकिन इसमें बहुत फुटेज खर्च होने के कारण निर्माता उनसे भय खाने लगे। इस दौरान दोस्तों ने मजाक में उन्हें रीटेक बलराज पुकारना शुरू कर दिया।  लेकिन लोगों ने उनके इस समर्पम को दो बीघा जमीन के बाद समझा।

कर्मस्थली नहीं पूजास्थली

 विविध भारती पर एक साक्षात्कार के दौरान उनके बेटे परीक्षित साहनी ने बताया, पिताजी ने जीवन में सबसे ज्यादा तरजीह अपने काम को दी। वो अपने काम के प्रति बेहद पजेसिब थे। परीक्षितजी कहते हैं – “मैं उन दिनों विदेश से फिल्म निर्देशन की पढाई करके लौटा था और बतौर अभिनेता अपनी पहली फिल्म ‘अनोखी रात’ की शूटिंग संजीव कुमार के साथ कर रहा था। फिल्म के निर्देशक असित सेन थे जो मेरे पिता के मित्र थे इसलिए पिताजी कई बार शूटिंग पर आ जाया करते थे। मैं उन दिनों जवान तो था ही विदेश से लौटा था तो उमांदी भी भारतीय युवाओं से थोड़ा ज्यादा ही था। एक दिन सेट पर मैं किसी एक्ट्रेस से मस्ती मजाक कर रहा था। उन्होंने इसे चुपचाप नोटिस किया और स्टूडियो से मेरे साथ लौट तो गेट पर गाड़ी रुकवाकर उन्होंने मुझे उतारा और स्टूडियो के गेट को दिखाते हुए कहा,  तुम जानते हो कि मैं कभी मंदिर नहीं जाता सिर्फ इसलिए कि मेरे ईश्वर को मैं अपने काम में देखता हूं। जहां हमारा काम हो वहां हमें बेहद पाक साफ रहना चाहिए।  मैं चंद लाइनों में ही समझ गया कि वो मुझे क्या समझाना चाहते थे।“  

बेटे परीक्षित के साथ

अभिनेता से पहले लेखक

बलराज साहनी को लिखने का शौक शांतिनिकेतन के जमाने से ही था । रेडियो की नौकरी से लेखन को और संबल मिला। रेडियो की नौकरी की बाद मुंबई में भी वे इप्टा के लिए नाटक लिखते रहे। अभिनय के साथ उन्होंने देव आनंद के नवकेतन बैनर के लिए गुरुदत्त निर्देशित पहली फिल्म ‘बाजी’ भी लिखी थी। 1960 के बाद उन्होंने ‘मेरी पाकिस्तान यात्रा’ नाम से संस्मरण लिखे। इसके साथ ही उनकी लिखी किताब ‘मेरा रूसी सफरनामा’ भी खासी चर्चित रही।  वे मातृभाषा पंजाबी में भी लिखते थे । कई अंग्रेजी पत्र पत्रिकाओं के साथ उन्होंने पंजाबी पत्रिकाओं के लिए भी कविताएं कहानियां लिखी। उन्होने अपनी आत्मकथा को ‘मेरी फिल्मी आत्मकथा’ के शीर्षक से लिखा। 

इंसान आखिर कब तक अकेला जी सकता है .. .. .. ..

सिनेमाई सेवाओं के लिए उन्हें 1969 में भारत सरकार ने पदम श्री से नवाजा। वे लगातार फिल्में कर रहे थे। उनके जेहन में सिर्फ और सिर्फ अच्छा सिनेमा करने की गरज थी।  इसी कड़ी में उन्होंने इप्टा से जुड़े निर्देशक एस एम सथ्यू के साथ ‘गरम हवा’ में आगरे के जू¸ते बनाने वाले व्यापारी सलीम मिर्जा का बेहतरीन किरदार निभाया। वो बड़े मनोयोग के साथ अपनी इस महत्वाकांक्षी फिल्म की डबिंग निपटा रहे थे। लेकिन इसी दौरान 13 अप्रेल 1973 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।

बहुचर्चित फ़िल्म गरम हवा की टीम

 गरम हवा उनकी आखिरी चर्चित फिल्म थी जो उनके निधन के बाद प्रदर्शित हुई। रेडियो पर अपनी प्रभावशाली आवाज के साथ अपनी बात कहने का सफर शुरू करने वाले बलराज साहनी का रिकॉर्ड हुआ अंतिम संवाद था.. .. .. इंसान आखिर कब तक अकेला जी सकता है। 

जाते जाते सुनते हैं बलराज साहब की 'All Time Classic' काबुलीवाला का यह सदाबहार गीत --

 

 

धर्मेंद्र उपाध्याय  

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं। . 


-Dharmendra Upadhyay

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं।

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