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बलदेव राज चोप्रा


Viewership का Guinness बुक रिकॉ



यादगार फ़िल्में




From Film Desk:
B R Chopra
-साल गिरह विशेष


सिनेमा, समाज और बी आर चौपड़ा

बी आर फिल्म्स -- कला अनंत है

कर्मण्ये वादिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन:, यूं तो इस पंक्ति का चलन धर्म और आध्यात्म भाव के प्राकट्य के लिए होता हैं लेकिन सिनेमाघरों में इस पंक्ति को दशकों तक बी आर फिल्मस की फिल्मों की शुरुआत में सुना जाता रहा। क्योंकि निर्माता- निर्देशक बीर आर चौपड़ा ने सदैव अपना धर्म सिनेमा को माना।  उन्होंने हिंदी फिल्म उद्योग को एसी फिल्मों से नवाजा जिनमें मनोरंजन से पहले बेहतर समाज के लिए एक सोच छिपी हुई थी।

सिनेमा समाज का दर्पण हैं, इस कथन को उनका सिनेमा, उनके समकालीनों से बेहतर बयां करता  है। चाहे नया दौर हो, कानून हो , साधना हो या गुमराह। उन्होने सदैव अपनी फिल्मों से समाज को रास्ता दिखाने का प्रयास किया। वे एक उच्च शिक्षा प्राप्त इसंान थे और उन्होंने अपनी शिक्षा दीक्षा का प्रयोग सिनेमा में भली भंाति किया।

फिल्म पत्रकार से फिल्मकार

 लाहौर यूनिवर्सिटी से अंगे्रजी साहित्य में स्नातकोत्तर करने वाले वल्देव राज चौपड़ा ने अपनी करियर की शुरुआत लाहौर की मासिक फिल्म पत्रिका सिने हैराल्ड से की। वे यहां पर फिल्म रिव्यू लिखा करते थे। इसके बाद यहीं पर फिल्मों पर गहन चर्चा करते करते फिल्मों के प्रति प्रेम बढ़ा और फिल्म बनाने की दिशा में कदम बढाए।  उन्होंने आई एस जौहर की कहानी पर चांदनी चौक फिल्म बनाने की तैयारी शुरू कर दी। पर वो फिल्म विभाजन के समय बदले देश के हालतों के चलते पर्दे पर नहीं आई। लेकिन चौपड़ा साहब निराश नहीं हुए और उन्होंने 1954 में फिर मीना कुमारी को लेकर चांदनी चौक शीर्षक से फिल्म बनाई।

पहली सफलता और अशोक कुमार

विभाजन के बाद लाहौर से विस्थापन झेलने के बाद बी आर चौपड़ा मुंबई आकर फिल्मों पर लिखने लगे और अपनी नई फिल्म अफसाना के निर्माण में जुट गए। अफसाना के लिए अशोक कुमार को साइन तो कर लिया लेकिन अशोक कुमार के डबल रोल से सजी फिल्म के पहले दिन ही शूटिंग पर स्टार अशोक कुमार को अपने नियंत्रण में काम करवाने में परेशानी हुई।

हुआ यूं कि एक फिल्म समीक्षक को तकनीकी रूप से कमजोर मान कर चल रहे अशोक कुमार एक शॉट को लेक र अड़ गए कि इसे मेरी तरह से फिल्माया जाए। चौपड़ा साहब ने उस शॉट को उनके कहे अनुसार फिल्माने के साथ ही अपने अंदाज में भी फिल्माया।  शाम को शूटिंग के समय दौनों शॉट को अशोक कुमार ने बारीकी से देखा तो बड़े शर्मिंदा हुए। और उन्होंने उसी समय चौपड़ा साहब से पूछा, तुमहारे घरवाले तुमहें किस नामा से पुकारते हैं। 

उन्होंने कहां,  बल्देव

इस पर अशोक कुमार ने कहा,  तो मैं भी आज से तुमहें इसी नाम से पुकारूंगा। सिनेप्रेमी जानते हैं कि अफसाना (1951) बॉक्स ऑफिस पर बेहद सफल हुई और पहली ही फिल्म से बी आर चौपड़ा ने बतौर निर्देशक फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बना ली। इसके बाद अशोक कुमार उनके कई अहम प्रोजेक्ट का हिस्सा रहे ।  

कहानी पर पकड़

बी आर चोपड़ा कहानी को सदैव प्रधानता देते थे। उनके पास कई लेखक बड़े उत्साह के साथ अपनी नई लिखी कहानी को सुनाने जाया करते थे। इन्ही में से एक थे अखतर मिर्जा । बात 1956 की है मिर्जा साहब ने एक नई कहानी लिखी और उसे महबूब खान को सुनाया तो महबूब खाना ने उस विचार को एक झटके में नापसंद कर दिया । राज कपूर ने तो उस विषय को किसी डाक्यूमेंट्री फिल्म का सब्जेक्ट करार दे दिया। इस पर मिर्जा साहाब बड़े निराश हुए।  कुछ दिन बाद चौपड़ा साहाब से उनकी मुलाकात हुई तो उन्होंने महबूब खान और राज कपूर द्वारा नकारे गए सब्जेक्ट की बजाय किसी दूसरी कहानी  को चौपड़ा सहबा को सुनाया । उन्होंने मिर्जा साहब का उत्साह वर्धन किया और उनकी कहानी को पसंद कर लिया। इस पर मिर्जा साहब में हौसला आया और उन्होंने सोचा कि क्यों ना लगे हाथों उस सबजेक्ट को भी सुनादूं जो राजकपूर और महबूब खान ने ठुकरा दिया है।

जब चौपड़ा साहब ने दो बड़े निर्माताओं द्वारा नापसंद किए गए इस सब्जेक्ट को सुना तो उनकी खुशी का पारावार ना रहा। उन्होंने उसी समय उस कहानी को खरीद लिया और इस इंसान बनाम मशीन की कहानी पर ही अपने बैनर की पहली फिल्म नया दौर (1957) का निर्माण किया।  

महाभारत के लेखन पर महाभारत

फिल्मों के बाद जब बी आर फिल्मस का आगमन महाभारत के जरिए छोटे पर्दे पर हुआ तो उन्होंने महाभारत के लेखक के रूप में अपने परिचित लेखक डॉ राही मासूम रजा को चुना। इस पर फिल्म इंडस्ट्री के तमाम लोगों ने इसे गलत फैसला करार दिया क्योंकि वो इस बात को पचा नहीं पा रहे थे कि महाभारत का छोटे पर्दे पर लेखन एक मुसलमान लेखक करे। लेकिन चौपड़ा साहब राही मासूम रजा की रूह में बसी गंगा जमुनी तहजीब से वाकिफ थे। कालांतर में उनका निर्णय सटीक साबित हुआ।  उन्होंने अपने इस निर्णय से इस बात को झुठलाया कि किसी हिंदू ग्रंथ को एक हिंदू लेखक ही हैंडिल कर सकता है।

संजीदगी और सिनेमाई सफर

हिंदी सिनेमा में अपने योगदान के लिए दादा साहब फालके अवार्ड से नवाजे गए बी आर चौपड़ा ने अपने सिनेमा में समाज के साथ संजीदगी को भी प्रधानता दी। उनकी अपराध कथाओं में अलहदा असर होता था। उनकी अशोक कुमार अभिनीत कानून को बेहद सराहा गया। इस फिल्म के लिए उन्हें बैस्ट फिल्म डायरेक्टर का फिल्मफेयर अवार्ड और बेस्ट फीचर फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला । भारत सरकार ने उन्हें पदम श्री और पदम भूषण  से नवाजा।

पद्मभूषण पुरस्कार के सम्मान

इसके साथ ही उन्होंने छोटे भाई यश चौपड़ा को भी फिल्म धूल का फूल से बतौर फिल्म निर्देशक अवसर दिया।

अस्सी के दशक में उन्होंने फिल्म निर्देशन से दूरी बना ली और फिल्म निर्माण  तक ही खुद को सीमित कर लिया। इस दौरान बी आर फिल्मस की फिल्मों का निर्देशन उनके पुत्र रवि चौपड़ा ने किया। इस कड़ी में उनकी कुछ फिल्में बॉक्स ऑफिस पर कमजोर निकली और 1991 के बाद लगभग एक दशक तक बी आर फिल्मस बड़े पर्दे पर कुछ खास नहींं कर पाया। लेकिन 2003 में एक बार फिर वे एक नई कहानी के साथ आए और उन्होंने अपनी लिखी नई कहानी पर बांगवां का निर्माण किया।  इसके बाद बाबुल (2006) का निर्माण किया। बी आर चौपड़ा 94 वे वर्ष में बढती उम्र में अपनी सक्रियता के साथ 5 नवंबर 2008 को जहाने फानी से अलविदा कह गए।

चाहे वो सशरीर आज हमारे बीच में उपस्थित ना हों लेकिन उनका सिनेमा  दशकों तक हिंदी सिनेमा में समाज के बदलाव को आने वाली पीढी को दिखलाएगा।

 


धर्मेंद्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं। . 


-Dharmendra Upadhyay

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं।

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