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From Film Desk:
सपनों के सौदागर मनमोहन देसाई
-पुण्यतिथि पर विशेष स्मरण


भावनाओं के भरोसे रहा सपनों का सौदागर
मनमोहन देसाई

1 मार्च पुण्यतिथि विशेष

मेरा मानना है कि सिनेमा वहीं है जो देखने वाले को भावनाओं में बहादे। अपनों की याद दिलादे और दर्द की लहरों में हिचकोले खिलाता हुआ सुख के साहिल पर ले जाकर छोड़े  - मनमोहन देसाई 

फिल्में बनाना एक सपने के सच होने जैसा होता है। इस दौरान एक झटके में अगर आंख खुल जाए तो ये सपना गुम हो सकता है लेकिन कुछेक जुनूनी लोग उस सपने को शुरू से अंत तक अपनी आंखों में इस तरह देखते हैं कि सपना पूरा किए बगैर उनकी आंख ही नहीं खुलती। ऐसे ही जुनूनी फिल्मकारों में से एक थे मनमोहन देसाई।  हिंदी सिनेमा में सपनों के सौदागर के रूप में अपनी पहचान रखने वाले मनमोहन देसाई जिनके सिनेमा ने भारत के भावुक दर्शक वर्ग की नब्ज को अपने अनुभव से दशकों तक पकड़े रखा। अपने सिनेमा के जरिए उन्होंने ना केवल हर धर्म को अपनी फिल्मों में तरजीह दी बल्कि गरीब तबके को भी अपने सिनेमा में पूरी जगह दी। मनमोहन देसाई ने अपने पूरे करियर में भारतीय जनमानस की भावनाओं को पहचानते हुए अपने सिनेमाई कल्पना के घोड़े दौड़ाए और निर्विवाद सालों तक व्यावसायिक हिंदी सिनेमा पर राज किया। आज उनकी पुण्य तिथि है। इस अवसर पर पेश है उनके जीवन की कुछ झलकियां 

बचपन और ‘फर्श से अर्श’ तक  

मन मोहन देसाई का जन्म 26 फरवरी 1937 को गुजराती फिल्मकार कीकू भाई देसाई के घर में हुआ। वो बचपन से ही बड़े चुलबुले और काफी क्रेजी थे। कीकू भाई देसाई स्टंट फिल्मों के नामी डायरेक्टर थे। लेकिन जब मनमोहन चार साल के थे तभी उनके पिता के निधन ने सब कुछ चौपट कर दिया। निधन के समय उनके पिता दो फिल्मों का निर्माण कर रहे थे। उनके असामयिक निधन से उन फिल्मों का काम अटक गया और मां के सारे जेवर के साथ घर भी बेचना पड़ा और वो अपना बंगला छोड़ अब खेतबाड़ी जैसे मध्यमवर्गीय इलाके में जाकर रहने लगे जहां पर उनके पिता का एक छोटा सा आॉफिस हुआ करता था। मनमोहन खेतबाड़ी के इसी मध्यवर्गीय माहौल में बड़े हुए । जहां पर वह अपने दोस्तों के साथ खूब क्रिकेट खेला करते थे। उनके घर में उनसे आठ साल बड़े भाई सुभाष देसाई थे।

पिता के निधन के कुछ साल बाद फिल्मकार होमी वाडिया ने सुभाष को अपने प्रोडक्शन में नौकरी दी।  वे वहां पर कुछ समय बाद प्रोडक्शन मैनेजर हो गए तो क्रिएटिव माइंड मनमोहन को भी उन्होंने वाडिया प्रोडक्शन में फिल्म निर्देशक बाबू भाई मिस्त्री का असिस्टेंट बना दिया। मनमोहन देसाई बाबू भाई मिस्त्री के साथ तीन फिल्मों में सहायक रहे। इसमें से एक सम्राट चंद्रगुप्त जिसका निर्माण उनके बड़े भाई सुभाष देसाई ने किया, वो तब तक स्टंट फिल्मों के निर्माता बन गए थे। सम्राट चंद्रगुप्त में मनमोहन ने मुख्य सहायक निर्देशक की हैसियत से काम किया था और इसी फिल्म से कल्याणजी भी स्वतंत्र संगीतकार बने।    

 राजकपूर का मन मोहा

सिनेप्रेमी जानते हैं कि मन मोहन देसाई ने अपनी पहली ही फिल्म छलिया में राज कपूर और नूतन को डायरेक्ट किया। राज साहब को निर्देशित करने के लिए उन्होंने जी जान लगा दी। जब उनके बड़े भाई सुभाष उन्हें लेकर राज कपूर के पास पहुंचे थे तो उनकी उम्र देखकर राज कपूर ने पहले तो साफ मना कर दिया पर सुभाष देसाई ने खुद राज कपूर के सिने करियर का हवाला देते हुए उन्हें राजी कर लिया। सुभाष देसाई को अपने भाई पर पूरा विश्वास था । मन मोहन ने भी दोहरी चुनौती लेते हुए शूटिंग के पहले दिन ही किसी सीन को शूट करने की बजाय फिल्म का गाना डम डम डिगा डिगा शूट करना शुरू किया।

उन दिनों राज कपूर के हर गाने के नृत्य निर्देशक मास्टर सत्य नारायण हुआ करते थे लेकिन प्रोडक्शन की ओर से उन्हें नहीं बुलाया गया। राजकपूर स्वयं चितिंत हो गए जब उन्हें ये पता चला कि मन मोहन देसाई स्वयं गाना कोरियोग्राफ करेंगे। वे मन ही मन खुश नहीं थे। पर सुभाष देसाई को दी गई जुबान की वजह से चुप रहे। लेकिन अपने काम पर बेहद विश्वास रखने वाले मनमोहन ने झट से कहा आप तो जैसे मैं करता जाऊं वही स्टेप करते जाओं। और राज कपूर को सभी स्टेप करके बताए , मसलन कैसे छाता पकड़ना है। कहां लड़की से टकराना है।

लगभग एक महिने बाद जब आर के स्टूडियों में मनमोहन राज कपूर के पास संपादित हुआ गाना लेकर पहुंचे तो राज कपूर ने गाने को कई बार देखा और उन्हें सीने से लगाकर आशीर्वाद दिया कि तुम एक दिन बहुत बड़े डायरेक्टर बनोगे।

देखिये राजकपूर साहब का वही सदाबहार मस्त गीत..

उनकी खासियत थी कि वो अभिनेता को केवल समझाते ही नहीं थे वे खुद करने पर आमादा भी हो जाते थे।  फिल्म बदतमीज के एक सीन में खपरैल की छत पर शम्मी कपूर को खड़ा होकर लहराते हुए गाना था। शम्मी कपूर इसे लेकर असमंजस में थे। वे अपनी परेशानी मनमोहन से जाहिर करते इससे पहले उन्होंने देखा कि सेट पर गाना शुरू हो चुका और छत पर देखा तो मनमोहन स्वयं हीरो की तरह खपरैल की छत पर खुद को साधे हुई भावाभिव्यक्ति दे रहे थे।

खुद को साबित करने का संघर्ष

मनमोहन देसाई को निर्देशन की बागडोर तो आसानी से मिल गई और उन्हें उस जमाने के बड़े सितारों का साथ भी मिल गया। पर 1960 में रिलीज हुई ‘छलिया’ यूँ तो बेहतरीन फिल्म थी पर बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास नहीं कर पाई थी। 1960 का साल मुगले आजम के नाम पर रहा। उन्होंने छलिया की असफलता भुलाकर दोगुने जोश से शम्मी कपूर के साथ ‘ब्लफ मास्टर’ शुरू की थी। इसके लिए खास गाना गोविंदा आला रे को उन्होंने मुंबई की गलियों में शूट किया । लेकिन इस फिल्म से भी उन्हें कोई खास फायदा नहीं हुआ । आलम ये था कि उन्हें दो साल बिना काम के बैठा रहना पड़ा। लेकिन अपने काम को शिद्द्त से अंजाम देने की सनक से राज कपूर के बाद,  ब्लफमास्टर के दौरान शममी कपूर भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहे थे। इसी दौरान शम्मी कपूर निर्देशक भगवान दास वर्मा के साथ फिल्म बदतमीज कर रहे थे पर निर्माता और निर्देशक के बीच टकराव होने के चलते ये फिल्म तीस दिन की शूटिंग के बाद बंद पड़ी थी। ऐसे में शम्मी कपूर ने निर्माता को मनमोहन का नाम सुझाया । तय हुआ कि बाकी का हिस्सा मनमोहन देसाई शूट करेंगे और उन्हें पांच सौ रुपए प्रतिदिन के हिसाब से मेहनताना मिलेगा। मनमोहन देसाई ने शम्मी कपूर, साधना के साथ ‘बदतमीज’ की शूटिंग शुरू कर दी । और एक अटकी फिल्म को पार लगाया और इस फिल्म को थोड़ी सफलता भी मिली। इसके बाद उन्होंने विश्वजीत को लेकर ‘किस्मत’ बनाई । किस्मत के निर्देशन के बाद उनकी किस्मत थोड़ी चमकी। इसी दौरान उन्हें आराधना से फिल्म आकाश पर जगमगा रहे सितारे राजेश खन्ना का साथ मिला। सच्चा झूठा (1970) की सफलता के बाद उन्होंने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।  इस तरह छलिया से सच्चा झूठा तक उन्हें अपने आपको एक कामयाब निर्देशक के रूप में सिद्ध करने में 10 साल लगे गए। 

.. .. .. और मनमोहन के मनभाए अमिताभ 

मनमोहन देसाई ने किस सितारे के साथ सबसे ज्यादा काम किया वो जग जाहिर है। उनकी आखिरी निर्देशित फिल्म गंगा यमुना सरस्वती भी अमिताभ बच्चन के ही साथ थी। इस फिल्म के बॉक्स ऑफिस पर ना चलने के बाद उन्होंने फिल्म निर्देशन से सन्यास ले लिया। पर यह दोनों साथ कैसे आये इसकी कहानी भी बड़ी दिलचस्प है..

सच्चा झूठा के बाद राजेश खन्ना और मनमोहन में गहरी पटती थी। दोनों की साथ में अगली फ़िल्म रोटी (1974) भी हिट रही।

उधर 1973 में आई ‘जंजीर’ के बाद अमिताभ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का उभरता सितारा बनकर सामने आ रहे थे। लेकिन सुपरस्टार राजेश खन्ना के करीबी मन मोहन, ‘आशीर्वाद’ पर सजने वाली महफिलों में अमिताभ को कटाक्ष में लंबू कहा करते थे। और दो साल गुजरे तब तक अमिताभ ने यश चौपड़ा की ‘दीवार’ के बाद अपने कद में दोहरा इजाफा कर लिया। अब एक स्टार निर्देशक और स्टार अभिनेता भला कैसे दूर रह सकते थे। सो नाडियाडवाला की ‘परवरिश’ (1977) में निर्माता के आग्रह पर अमिताभ और विनोद खन्ना की जोड़ी को मनमोहन देसाई को निर्देशित करना पड़ा।

अमिताभ के करियर पर लिखी पत्रकार सौमय बंद्योपाध्याय की किताब में दिए गए साक्षात्कार में मनमोहन देसाई करते हैं कि परवरिश के समय मेरा अमिताभ से कोई ज्यादा लगाव नहीं था पर हर शॉट पर अमिताभ की मेहनत और हर रीटेक के बाद दोगुनी एनर्जी के साथ हाजिर होने की अदा ने मुझे प्रभावित किया और अमिताभ के लिए मन में पाले गए सारे भरम दूर हो गए।

मैंने उनके व्यक्तित्व को कुछ खास और अलग से पेश करने की कवायद करते हुए अमर अकबर अंथनी शुरू की। अंथनी के किरदार ने अमिताभ के गुस्से के साथ साथ हास्य स्वरूप को भी बेहतरीन तरीके से पेश किया। 

इसके बाद तो अमिताभ के साथ उन्होंने सुहाग (1979) नसीब (1981), देशप्रेमी (1982), कुली (1983) में काम किया। कुली की शूटिंग के दौरान अमिताभ के घायल होने के बाद लोगों ने ये भी कहा कि शायद ये जोड़ी आगे साथ काम ना करें पर मर्द (1985) और गंगा जुमुना सरस्वती 1988 तक ये जोड़ी जमी रही। इसके बाद उनकी अगली फिल्म तूफान को उनके पुत्र केतन देसाई ने निर्देशित किया।

रिश्ते -नाते भावनाएं और धर्म 

भले ही मनमोहन देसाई के सिनेमा को मसाला सिनेमा की श्रेणी में रखा जाता है लेकिन उनका सिनेमा भावनाओं का सिनेमा था, जिसमें रिश्ते-नातों का संसार , त्याग तपस्या और बलिदान था। वो तर्क की दृष्टि पर भले ही खरा ना उतरता हो पर रसस्वादन की दृष्टि से बेहद मनमोहक था। उन्होंने भावनाओं के अतिरेक से भरे एक नए सिनेमा की खोज की।  जिसे एक जमाने में मन मोहन देसाई टाइप सिनेमा कहा जाने लगा था।  उनकी फिल्मों में धर्म को बड़ी तरजीह दी जाती थी। उन्होंने अपनी फिल्मों से सर्वधर्म समान का प्रत्यक्ष रूप से संदेश दिया। 'हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई सबको मेरा सलाम' छलिया के इस गाने से शुरू हुई इस कड़ी को अमर अकबर अंथनी में हिंदू , मुसलमान और ईसाई समाज को तीन किरदारों की डोर से बांध दिया। फ़िल्म 'नसीब' में भी
जॉन-जानी-जनार्दन की व्याखया में तीनों धर्म को उन्होंने जोड़ा था । आपको याद होगा कुली का अंतिम सीन जब अल्लाह के नाम की चादर ओढे इकबाल (अमिताभ) गोली खाता जाता है पर रुकता नहीं है। ये सीन मुस्लिम युवाओं के करबला में होने वाले जंजीरी मातम की झलक से प्रेरित था। 

प्यार, परिवार और जिंदगी

मनमोहन बड़े जिंदादिल इंसान थे। जवानी के प्रारंभिक दिनों में में ही एक लड़की से इश्क कर बैठे जो उनके पड़ौस में ही रहा करती थी। रोज उसके पीछे बस में बैठकर जाते और उसे बस से उतरते जाते देख लेते थे। यहां पर भी भाई सुभाष ने हौंसला बढाया तो मनमोहन ने लड़की जीवनप्रभा के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रख दिया लड़की ने कहा कि घर पर मां को भेजो । लेकिन लड़की के महाराष्ट्रियन परिवार वालों को लड़के के गुजराती होने के कारण रिश्ता पसंद ना आया। इस पर भी दीवाने मनमोहन कहां मानने वाले थे। लड़की के घर पर पहुंच गए और घरवालों को साफ कह दिया कि जो भी जीवनप्रभा से शादी करने आएगा उसे मैं स्टंट फिल्मों में काम करने वाले पहलवान दोस्तों से पिटवा दूंगा। उनकी इस धमकी का असर हुआ या इस युवा की दीवानगी, जीवनप्रभा के मां-बाप ने मनमोहन देसाई के साथ जीवनप्रभा के रिश्ते की इजाजात दे दी। लेकिन 1980 में सांई बाबा की भक्त जीवनप्रभा के जीवन की प्रभा अस्त हो गई। इसके कुछ वर्षों बाद वे फिल्म अभिनेत्री नंदा के और करीब आए जो अविवाहित थीं। 1992 में दौनों ने शादी का निर्मय लिया और दौनों की मंगनी भी हो गई पर अचानक 1 मार्च 1994 को मनमोहन देसाई की बालकनी से गिरकर मौत हो गयी। अफवाहें ये भी उठी कि ने खुदकुशी कर ली।

आज वो हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी मौत की पहेली आज तक उनके सिनेमा से प्रभावित लोगों के लिए पहेली बनी हुई हैं कि सबको अपनी फिल्मों से जीने का हौसला देने वाले मनमोहन आखिर खुद जिंदगी से कैसे हार गए।

जाते जाते सुनते जाईये नसीब फ़िल्म का यह गाना जिसमे उन्होंने ना सिर्फ अपनी सर्व धर्मं समभाव वाली थीम पर्दे पर फिर एक बार उभरी, इस बार उन्होंने बॉलीवुड के कई चमचमाते सितारे को भी एक छत के नीचे पहली बार इकठ्ठा किया..

धर्मेंद्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं।   धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनोंं मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं।   

ई मेल आई डी -jprdharmendra@gmail.com
फोन न- 9667983852, 9928434141


-Dharmendra Upadhyay

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं।

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