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Rest in Peace






Dharmendra Upadhyay

From Film Desk:
Long Live Nida Fazli
-निदा ने नम कर दी आंखें


      निदा साहब ने नम कर दी आंखें

      स्मृति शेष

वो दिलों में आग लगाएगा मैं दिलों की आग बुझाऊँगा
उसे अपने काम से काम है मुझे अपने काम से काम है

कुछ देर पहले गमगीन कर देने वाली खबर मिली कि पद्मश्री निदा फाजली नहीं रहे। वे भारत की उन अजीम हस्तियों में से एक थे, जिन्होंने बंटवारे के बाद भारत को अपनी सरजमीं के तौर पर चुना और जी जान से चाहा। उनके लब्जों के मुरीद सिर्फ उर्दू के जानकार ही नहीं थे बल्कि उनकी रचनाएं अदब से महरूम रहे लोगों पर भी अपना असर छोड़ती थी।  उर्दू साहित्य और फ़िल्म टीवी पुरस्कारों के अलावा निदा साहब को २०१३ में पद्मश्री से भी पुरस्कृत किया गया.

राष्ट्रपति से पद्मश्री पुरस्कार ग्रहण करते हुए.      भारत और अपने शहर गवालियर से उनका लगाव इतना था कि सारा परिवार पाकिस्तान चला गया पर वे नहीं गए। जब उनका परिवार पाकिस्तान जा रहा था तो घर के सारे अफराद नए कपड़े सिलवा रहे थे लेकिन बेलौस निदा अपने बोशीदा लिबास में गवालियर की सड़कों की खाक छान रहा था क्योंकि वो नहीं जाना चाहता था पाकिस्तान । अंत में वालिदैन को कुछ हिदायतों के साथ उन्हें भारत छोड़कर घरवाले पाकिस्तान निकल गए। और मुक्तदा हसन उर्फ निदा फाजली गवालियर के अपने यार दोस्तों की महफिलों के साथ एक छोटा सा कमरा किराए पर लेकर टिके रहे अपने शहर में ।   

 

 

 

छोटे बच्चे में बड़ा आदमी

गंगा-जमुनी तहजीब के इंसान निदा फाजली के व्यक्त्वि का आकलन उनके आत्मकथ्यात्मक उपन्यास ‘दीवारों के बीच’ से करूं तो देखता हूं कि उनमें बचपन से ही चीजों को अलग तरह से पकड़ने की काबिलियत थी। छोटी उम्र में ही दंगों के समय अपनी मां और अपने बहिन भाइयों के साथ  गवालियर से दूर बनाई मुस्लिम बस्ती में रहना।  ऐसे में पिता की सरपरस्ती से दूर रहने की वजह से ही जवानी में इस फैसले को अमल में लाने का हौसला दिया कि वो पाकिस्तान नहीं जाएंगें।

यूँ अपने घर परिवार से अलग हो जाना और फिर अपनी शायरी की परस्तार प्रेमिका के मगरूर हो जाने पर अपनी शायरी को एक मुकाम देने की सोच लेकर वाया दिल्ली होते हुए मुंबई की राह पकड़ लेना। यहां मुंबई में काफी समय तक कोई काम ना मिल पाने पर निदा का देसी शराब पीना, बेहाल होकर घर लौटते समय गली के कुत्तों से डरना ।  साहिर लुघियानवी के घर पर सजने वाली महफिलों में अपना पेट भरने के लिए शिरकत करना। उनके जीवन की कितनी ही ऐसी झलकियां हैं जो साबित करती हैं कि वो जिंदगी के सच्चे सिपाही थे। उन्होंने अपने धैर्य और विश्वास को उन परिस्थितियों में भी बनाए रखा जब किसी की भी हिममत जवाब दे सकती है। संघर्ष के दिनों में धर्मयुग और बिल्ट्ज में थोड़ी बहुत अखबारनवीसी के साथ वो एक धनवान मुसलमान के मौज शौक के लिए शेर पढकर सुनाया करते थे।

जीवन में बहार लाया अस्सी का दशक

निदा को मुंबई में अपनी शायरी को पहचान दिलाने की जद्दोजहद  में लगभग डेढ दशक गुजर गया पर अस्सी का दशक उनके करियर में बहार बनकर हरजाई के गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान आया। एक कला मर्मज्ञ विट्ठल भाई के साथ हुए जुबानी करार के मुताबिक वो उनके साथ में मिलकर गीत लिखने लगे। विट्टल भाई के प्रयासों से एक फाइनेंसर सामने आए और चार फिल्मों का अनाउंसमेंट हुआ जिनमें पहली  फिल्म ‘हरजाई’ बनी और इस फिल्म के लिए लिखे गए उनके गीत लोकप्रिय हुए। आज भी सिने संगीत प्रेमियों की जुबान पर इस फिल्म का एक गीत - तेरे लिए पलकों की झालर बुनूं बरबस आ जाता है। बाद की तीन फिल्में तो नहीं बन पाई पर निदा की शायरी चल निकली। इसके बाद निदा फाजली के पास गीत लिखने के ऑफर आने लगे थे। एसे में उन्होंने विट्ठल भाई के जोड़ीदार होने से स्वयं को अलग कर लिया। 

सच्चे प्रेमी निदा फाजली

निदा फाजली का प्रेमी ह्रदय भी बहुत बड़ा था। गवालियर की रहने वाली अपनी प्रेमिका जो उनकी शायरी की बड़ी प्रशंसक थीं, उनसे मोहब्बत परवान चढी लेकिन प्यार मुश्किलों में पड़ा। अकेले निदा को अल्लाह के भरोसे छोड़ पूरा परिवार पाकिस्तान चला गया था। सो यार दोस्तों की सोहबत में निदा की आवारगी बढ़ी। ऐसे में भला पुलिस में नौकरी पेशा कोई बाप अपनी बेटी का हाथ एसे लड़के के हाथ में कैसे सौंप सकता था।  लेकिन निदा ने लंबे संघर्ष के बाद कमाल अमरोही की फिल्म रजिया सुलताना से उनकी शायरी खूब मकबूल हुई तो बिगड़ी बातें फिर से बनने लगीं। उन्होंने सालों बाद अपनी उसी प्रेमिका को शरीके हयात बनाया।

अपने आत्मकथ्यात्मक उपन्यास ‘दीवारों के बीच’ में वो जिक्र करते हैं कि किस कदर दौनों प्रेमियों में बेहद लगाव के बावजूद एक अना पैदा हो गई थी जो निदा की बेहद मकबूलियत के बाद भी टूट नहीं पा रही थी। इस दौरान वे ऊषा खन्ना के लिए गाने रिकॉर्ड कर रहे थे। उनके लिखने में एक लकीर सी नजर आती है जो दिखाती है कि अपनी शरीके हयात के लिए ही उन्होंने फिल्म ‘आप तो ऐसे ना थे’ का गीत ‘तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है’ को लिखा। संगीतकार उषा खन्ना उनके निकाह में गवाह की हैसियत से शरीक हुई।

मैं और निदा फाजली

 यूं तो बचपन से उन्हें बिना जाने ही मेरा उनसे सांगीतिक संबध रहा। उनके गीत तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है का ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू फरमाइश पर आए दिन आना और इस गीत के आते ही हाथों से किताब छोड़  रेडियो का वॉल्यूम बढ़ाना मेरा शगल बन गया था। लेकिन बाद में कॉलेज के दिनों में उनकी शायरी को जाना और पत्रकारिता में आने के बाद राजस्थान पत्रिका की रविवारीय अंक में अपने कॉलम पहली कमाई के लिए  निदा साहब से मेरी बातचीत हुई। उन्होंने बड़े खुलूस के साथ बताया कि किस तरह उनकी पहली रचना काफी समय तक नहीं छपी लेकिन बाद में उस जमाने की नामी पत्रिका सारिका ने उनकी रचना को छापा और उन्हें 10 रूपए का मनी आर्डर प्राप्त हुआ।

निदा फाजली का यूं चले जाना शेरो शायरी के लिए ही अपूर्णीय क्षति नहीं  बल्कि इस देश की गंगा जमुनी संस्कृति से एक पन्ना मिटने जैसा है। लेकिन वो अपने गीत और शेरो शायरी के जरिए हमारे दिलों में हमेशा मौजूद रहेंगे।

वैलेंटाइन डे आ रहा है और निदा साहब का यही गीत इस दिन सबसे ज्यादा dedicate होने वाले गीतों में एक है. तो जाते जाते सुनते जाइये ये सदाबहार रूमानी गीत ...

 

 

 

धर्मेंद्र उपाध्याय

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं।   धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनोंं मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं।   
ई मेल आई डी -jprdharmendra@gmail.com
 फोन न- 9667983852, 9928434141

-Dharmendra Upadhyay

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं।

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