1
 


कहानीकार


कहाँ गयी?



Confused with लाइफ










FWA Discussion Board:
अलविदा २०१६
-एक दर्शक-लेखक का फ्लैशबैक


Goodbye 2016!

एक दर्शक-लेखक का फ्लैशबैक

फ़ास्ट फॉरवर्ड' में निकल गया हैं साल अपना, 
आ थोड़ी देर बैठकर 'रीप्ले' करते हैं !! – वतन

ब्लू है पानी-पानी, या है पिंक?

“दिल बड़ी मुश्किल में है, और तुम बेफिक्रे होकर कहानियाँ घड़ते जा रहे हो !,”- मेरे अन्दर के फिल्मकार ने असिस्टेंट की औकात से बाहर आकर कहा. यकीन मानिये,  घरवालों से बेशर्म होकर मांगे गए पैसों से देखी गई अर्थहीन फिल्मों जैसा दुःख कोई और नहीं होता. ‘दो हज़ार’ सोलह का साल फिल्मों के हिसाब से थोड़ा ही पिंक रहा है. एक और ‘हैप्पी न्यू इयर’ की दस्तक नजदीक है, और इस बॉलीवुड-वर्ष  का सिर्फ आखिरी ‘दंगल’ बाकी है. ऐसे में कुछेक अच्छी ‘कहानियों’ के बलबूते उम्मीद कैसे बरकरार रहे?

मन, सही- गलत की बरफी निगलने की कोशिश कर ही रहा था, कि एक और आवाज आई-, “ज्यादा जेसन बौर्न बनने की जरूरत नहीं है. पूरी इंडस्ट्री पर सुसाइड स्क्वाड का लेबल मत लगाओ. हो सकता है तुम्हें कुछ फिल्मों से ‘अनुराग’ हो पर बॉलीवुड में सब कुछ निल बटे सन्नाटा नहीं है.”

“हाँ मगर, क्या फिल्म इंडस्ट्री पर ‘ढिशूम-ढिशूम’ के सुल्तानों का कब्ज़ा होना कूल है? कब तक हम पार्टी सोंग्स के मस्तिजादों से अगेन एंड अगेन घायल होते रहेंगे? अच्छे कांसेप्ट्स को मरजिया होते हुए बार- बार नहीं देख सकते हम. क्या इंडस्ट्री के ‘कर्णधारों’ की ये जिम्मेदारी नहीं कि बॉलीवुड को औसतता के मोहनजो- दारो से एयर-लिफ्ट करें? कौन निकालेगा बॉलीवुड को रॉकी हैण्डसमस और फ्लाइंग जटस के सुरूर से?”

“साला खडूस हो तुम! सार्थकता के नाम पर बोरियत की फिलोसफी का ‘फैन’ होना भी उतना ही बुरा है. ‘कपूर एंड संस’ हमेशा कुछ निर्रथक ही लेकर आयें, ये फितूर भी ठीक नहीं है. ये ज़िन्दगी है डियर ! यहाँ डीप वाटर होराइजन पर पहुंचकर ही धनक दिखाई देती है. बॉलीवुड को , आम ज़िन्दगी और देश के हालात से अलग करके नहीं देख सकते तुम ! वैश्वीकरण और ऍफ़ डी आई के साथ हर चीज़ का वाणिज्यीकरण होना लाज़मी है. ऐसे में बॉलीवुड के ‘करण’ ही सारा जौहर दिखाएँ, ये उम्मीद बेतुकी है. बड़े- बड़े घरानों के सिवाय भी बहुत रुस्तम हैं यहाँ. क्रिटिसिज्म के वन नाईट स्टैंड्स लेकर घूमने से कुछ बदलने वाला नहीं है. अगर सार्थक सिनेमा का हाउस फुल देखना चाहते हो तो बागी बनना पड़ेगा. अनटोल्ड स्टोरीज लेकर आने के लिए रिसर्च करना पड़ता है.

मगर... मगर जब बिन रेफरेंस के तुम कहीं काम ही नहीं कर सकते तो बॉलीवुड के नीरजा कैसे बनोगे?

‘नीरजा’ बनो, ‘मदारी’ बनो, या ‘वज़ीर’- बनना तो तुम्हें ही है. कोई मैसेंजर ऑफ़ गॉड नहीं आना वाला तुम्हारी मदद के लिए. डर और अल्प आत्मविश्वास के आइलैंड को छोड़कर जब मोआना बनकर निकलोगे तो ही सार्थक बॉलीवुड का ‘अरायीवल’ सम्भव है. अन्यथा करते रहो बीट पे बूटी !

धन्यवाद!

वतन ठाकन

7506259581

कि तेरी काली कॉफियों का असर तो हुआ है,
कि मेरी सोयी आत्मा जागने सी लगी है ........!!

Contribution from:

Vatan Thaken

Email:

vatanthaken@gmail.com

https://www.facebook.com/vatan.thaken?fref=ts

 


-Vatan Thaken

Intern Correspondent, Assistant Director, Aspiring Scriptwriter, Budding Shayar and a Perennial Filmgoer.

Click here to Top