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हिंदी के ब्राह्मण


पखवाड़े या पिछवाड़े


FWA Discussion Board:
जय हिन्द जय हिंदी
-हिंदी पखवाड़े पर विशेष चर्चा


हिन्दी के ब्राहमण और अछूत !!

 ----  धनंजय कुमार

चाहे जितना जोरशोर से हिन्दी दिवस मनाएँ, देश में हिन्दी के लिए माहौल बिगड़ता जा रहा है. अग्रेजी का घनघोर घटायें घिरती जा रही हैं . सब अपने बच्चों को अँग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिलवाना चाहते हैं, स्कूलों में हिन्दी में बात करने पर दंड का प्रावधान है, मकसद है बच्चे सिर्फ अँग्रेजी बोलें. माँ बाप भी चाहते हैं, बच्चे अँग्रेजी में ही बात करें. हिन्दी बस कोर्स की हिन्दी बुक और पीरियड तक ही बच्चों के लिए है. इतना से ही आजकल बच्चे कामभर हिन्दी लर्न कर लेते हैं. कामभर मतलब अनपढों, मजदूरों, सब्जी-दूध वालों, ड्राइवरों और नौकरों से बात करने डाँटने भर.

हमारी सरकारें खुश है, देश लगातार तरक्की कर रहा है. अँग्रेजी बोलने और समझनेवालों की संख्या बढ़ती जा रही है. जिस दिन पूरा देश अँग्रेजी दाँ हो जायेगा भारतवर्ष पुरातन और पिछड़े की खोल से निकल कर आधुनिक और विकसित देशों की पांत में जा बैठेगा. आर्थिक दौड़ में तो भारत अग्रिम पंक्ति में आ ही गया है, गरीबी रेखा भी खत्म हो जायेगी !

अँग्रेजी बोलने वाले कभी गरीब नहीं होते. उनको जरूरत भर कमाना आ ही जाता है. गदहे तो हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाई होते हैं, जिन्हें मुफ्त की रोटी देनी पड़ती है, आरक्षण देना पड़ता है. फिर भी यह देखना और समझना दिलचस्प है कि देश में हिन्दी दिवस पूरे जोशोखरोश और धूमधाम से मनाया जाता है. सरकारों के पास हिन्दी दिवस के लिए अच्छा खासा भारी भरकम बजट होता है. अब हिन्दी का पिछड़ापन ही देखिये कि इतने खर्चे के बात भी औकात नहीं बना पा रही. सरकार बेचारी क्या करे ! अँग्रेजी को देखिए, सरकार कभी इंग्लिश डे नही मनाती है,फिर भी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करती जा रही है. साहबों के घरों से बहकर अँग्रेजी बाबुओं के घर आ बिराजी है. और हिन्दी है कि चपरासियों के घर से भी दुरदुराई जा रही है. फिर भी सरकार हिन्दी को भारत के भाल पर सजाये रखने को प्रतिबद्ध है. हिन्दी हमारी भाषा है, हमारा गौरव है, हमारी पहचान है, हमारी संस्कृति है. इसे सरकार वैसे ही संभाल कर रखना चाहती है, जैसे संस्कृत को ब्राह्मणों ने संभालकर रखा. इसलिए हिन्दी दिवस के नाम पर ब्राह्मण पूजा की परम्परा जारी है. इस दिन हिन्दी के विद्वानों को घरों-दफ्तरों से निकाल-निकालकर, धो - पोछकर, सजा-संवार कर बड़े आदर के साथ मंचों पर बुलाया जाता है. उनकी महनता और सेवा के गुण गाये गिनाये जाते हैं. उन्हें हिन्दी की सतत सेवा के लिए सम्मानित किया जाता है और हिन्दी सेवी विद्वान नारियल, अँगोछा और कुछ नगदी लेकर धन्य धन्य हो जाते हैं.

लेकिन हिन्दी...? वह नित कमजोर होती जा रही है. होती है तो होए, सरकार या हिन्दी विद्वान भला और क्या करें? विद्वान साहित्यकार कितनी साधना कर करके अच्छी - अच्छी रचनाएँ करते हैं. साल भर में दो तीन किताबें भी लिख देते हैं. अब कोई उनकी रचनाओं को पढ़े ही नहीं, तो बेचारे विद्वान क्या करें! स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थी भी हिन्दी के नाम पर मुँह बिचका लेते हैं, तो सरकार भी क्या करे..? वह तो बारबार कोशिश करती है कि देश की आम जनता हिन्दी के विद्वानों के साहित्य रस का पान करे, लेकिन बच्चे हैं कि उन्हें हिन्दी फिल्मों के डायलॉग ज्यादा अच्छे लगते हैं. फिल्मों के गीत दिल के ज्यादा करीब लगते हैं. लड़कियों को टीवी सीरियल की कहानियाँ ज्यादा अच्छी लगती हैं. सीरियलों के संवादों से उसके मन की बातें ज्यादा अभिव्यक्त होती हैं.

लेकिन सीरियलों और फिल्मों के लेखक - गीतकार हिन्दी के लेखक के तौर पर हिन्दी के वास्तविक विद्वानों के लिए अछूत हैं. फिल्मों सीरियलों के लेखक और गीतकार हिन्दी साहित्य के स्तर के नहीं हैं. बड़े छिछले और भोंडे हैं. इसलिए हिन्दी दिवस पर उनकी कोई गिनती नहीं. सरकार भी इन्हें नहीं पूछती. जानती है कि ये हिन्दी के ब्राह्मण नहीं है. लेकिन आम आदमी इनकी कद्र करना जानता है इसलिए वह फिल्म देखना नहीं भूलता, सीरियलों को नहीं छोड़ पाता. बच्चों से लेकर घर के बड़े बूढ़े समय निकाल कर टीवी से जा चिपकते हैं. बड़े इस बात से खुश होते हैं कि बच्चे कितनी बड़ी बड़ी बातें करते हैं. कई बार हिन्दी के मुहावरे और लोकोक्तियाँ सुन चकित रह जाते हैं. फिर उन्हें ध्यान आता है ये सब टीवी सीरियलों और कार्टून की वजह से है.

तो आशय यह है विद्वानों कि हिन्दी का गोवर्धन उठाने का जो भ्रम पाले और पलवाये बैठे हैं, उससे बाहर निकलिए हिन्दी की गाड़ी आपके भरोसे नहीं, फिल्म-टीवी लेखकों-गीतकारों की वजह से आगे बढ़ रही है. इसलिए उनको अछूत समझने की भूल न करो और जलसों में उनको भी बुलाबा भेजो, मान घटेगा नहीं, बढ़ेगा.



धनंजय कुमार

 

‘हिन्दी पखवाड़ा’ या ‘पिछवाड़ा’?

--- श्री रुपेश कुमार कश्यप

इधर मुम्बई में कई गणेश पंडालों में भक्त जब बेबी को बेस पसंद हैपर श्रद्धा से झूमें जा रहे हैं तो उधर पूरे भारत के सरकारी संस्थानों, पब्लिक सेक्टरों और बैंकों में श्रद्धालु हिन्दी पिछवाड़ा’, माफ़ कीजियेगा, ‘हिन्दी पखवाड़ाबड़े ही धूम-धाम से मना रहे हैं।

अब ‘बेबी को बेस पसंद है’ और ‘हिन्दी पिछवाड़े’ में आपको कोई समानता दिखे न दिखे मगर श्रद्धा ज़रुर दिखेगी। गाने और मनाने में श्रद्धा होनी चाहिए। तो 14 सितम्बर आ गया है यानि हिन्दी दिवस श्रद्धालु लोग ‘हिन्दी पखवाड़ा’ मनाने में लगे पड़े हैं। उन्हें लोक व्यवहार, लोक बोली, लोक-भाषा से कुछ लेना-देना नहीं है। उन्हें इस बात से लेना देना नहीं है कि बाज़ारनुमा पंडालों में जाने वाले श्रद्धालु कौन सी बोली बोल रहे हैं और किस तरह का व्यहार कर रहे हैं। ‘हिन्दी’ के उदासीन उर्फ़ पठासीन उर्फ़ श्री श्री बाज़ार की ‘हिन्दी’ से ख़फ़ा हैं। जबकि बाज़ार चलाने वाले, ‘अंग्रेज़ी’ मीडियम में पढ़े-लिखे एक्सपर्ट्स ‘थिंक लोकल’ पर ज्ञान बाँट रहे हैं और अपनी दुकान चमका रहे हैं। कुछ इन दोनों के बीच हैं। उनमें से कुछ ‘हिन्दी’ को रिक्शे, खोमचे वाले आदि-आदि की भाषा समझते हैं तो कुछ ‘हिन्दी’ को ‘एक्ज़ॉटिका’ समझते हैं। कुछ ‘हिन्दी’ को फ़िल्मी गाने समझते हैं तो कुछ ‘हिन्दी’ को ‘नल्ला’ समझते हैं (नल्ला — जिसका मतलब है बिना काम का यानि पढ़कर कोई नौकरी नहीं मिलने वाली)। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ‘हिन्दी’ को अपनी ‘बिन्दी’ समझते हैं और जो बचे-खुचे हैं उन्हें इन सब बकवास से फ़र्क नहीं पड़ता।

जैसे हर साल मनाया गया था उसी तरह इस साल भी मनाया जा रहा है ‘हिन्दी पखवाड़ा’! असल में 1953 से ऐसा बताया और मनाया जा रहा है मगर हिन्दी है कि ‘हैपेनिंग’ ही नहीं हो रही है। आखिर ये कैसी हिन्दी है जिसे पिछड़ना बहुत पसंद है। और, इसे पछाड़ कौन रहा है?

लो, कर लो बात, अंग्रेज़ी पर दोष मढ़ना बंद करो यार। काहे अंग्रेज़ी को बीच में घसीट रहे हो। मतलब काहे? ऐ मुन्ना, आओ तनिक पिछवाड़े चलेंऔर देखें कि क्या कहता है अपना विकीपीडिया’ —

स्वतन्त्र भारत की राजभाषा के प्रश्न पर 14 सितंबर 1949 को काफी विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया जो भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की धारा 343में इस प्रकार वर्णित है:संघ की राज भाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रुप अंतर्राष्ट्रीय रुप होगा। चूंकि यह निर्णय 14 सितंबर को लिया गया था। इस कारण हिन्दी दिवस के लिए इस दिन को श्रेष्ठ माना गया था। लेकिन जब राजभाषा के रूप में इसे चुना गया और लागू किया गया तो गैर-हिन्दी भाषी राज्य के लोग इसका विरोध करने लगे और अंग्रेज़ी को भी राजभाषा का दर्जा देना पड़ा। इस कारण हिन्दी में भी अंग्रेज़ी भाषा का प्रभाव पड़ने लगा।

तो जैसा कि ज्ञानी लोगों को पता है, आज हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों जनभाषा हैं। जब दोनों एक साथ रहेंगी तो हिन्दी में अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ी में हिन्दी का कोलाबोरेशन होना आर्गेनिक है मगर ‘हिन्दी पिछवाड़ा’ मनाने वाले ऐसा नहीं मानते वो अपनी दुनिया में ‘चिल’ कर रहे हैं।

ये नई पीढ़ी वाली हिन्दी ही ‘नईवाली हिन्दी’ है। जैसा बोलते हैं, वैसा लिखते हैं। ‘नईवाली हिन्दी’ को अंग्रेज़ी या इंग्लिश से कोई इश्यू नहीं है। उसे अपनी दूसरी मातृभाषाओं से भी कोई मतभेद नहीं है। वो 365 दिन, 24 घंटे जी जाती है चाय की चुस्कियों में, गलियों की गपशप में, गलियारों की गलबहियों में, कॉर्पोरेट कॉरिडोर्स की कानाफूसियों में, सोशल साइट्स की रैंट्स में, मीम्स में और चैटिंग की चटोरेपन में। हालांकि कॉरपोरेट वर्ल्ड में आज भी अंग्रेज़ी का ही बोलबाला है। लेकिन मीटिंग्स में माहौल को इनफॉर्मल बनाने के काम हिन्दी ही आती है।

तो भाईयों बात इतनी सी है कि भाषा नदी की तरह होती है, वो अपने रास्ते बनाते चलती है।अब रास्ते में कंकड़ मिले, पत्थर मिले, इंग्लिश मिले या विंग्लिश मिले, नदी सबको समेटते, छानते-मानते बहती है। वो समय-समय पर अपनी धाराएं बदलती भी चलती है शायद इसलिए ही वो सदानीरा रहती है। वो किसी हिन्दी के पखवाड़ेका इंतज़ार नहीं करती। उसे तो स्कूलों, कॉलेजों और कॉरपोरेटों में क्रमशः एक अच्छा हिन्दी टीचर, एक अच्छा प्रोफेसर और एक अच्छा प्रोफेशनल चाहिए जो बता सके कि हिन्दी सिर्फ़ प्रेमचंद से शुरू होकर गुलज़ार तक ख़त्म नहीं होती। हमें कोई ऐसा श्रद्धालु चाहिए जो बता सके कि हिन्दी जिस लिपि में लिखी जाती है उसे ‘देवनागरी’ कहते हैं और ‘देवनागरी’ में लिखी जाने वाली 120 भारतीय भाषाएँ हैं। हाँ, आपली मराठी भी।

सच पूछो तो हिन्दी का ‘Cool कालयही है ब्रो! इसका क्रेडिट गूगल और फेसबुक जैसी आईटी कंपनियों को जाता है। हिन्दी फ़िल्मों और हिन्दी विज्ञापनों को जाता है। आज ज़्यादातर विज्ञापन हिन्दी में सोचे और लिखे जाते हैं। आज की हिन्दी के उन प्रकाशकों को भी जाता है जो किसी सरकारी लाइब्रेरी में शोभा बढ़ाने वाली किताब की तलाश में नहीं हैं, बल्कि टेक-सैवी युवाओं के दिल में जगह बनाने के जुगाड़ में लगे हैं। इसका क्रेडिट उन युवा लेखकों को भी जाता है जो बिना हिन्दी के मठाधीशों के आशीर्वाद और बिना सरकारी सम्मानों के जी रहे हैं, लिख रहे हैं और पढ़े भी जा रहे हैं। हिन्दी अख़बारों और टेलीविज़न की भी अहम् भूमिका है। हिन्दी में छपने वाले पोर्टल्स और एप्प्स हिन्दी को आज के मिल्लेनियल्स के लिए एक्सेसिबल बना रहे हैं।

हिन्दी पखवाड़ा’ जैसे सरकारी अनुदानों से चलने वाले कार्यक्रम नहीं चाहिए। हिन्दी को ‘पिछवाड़े’ ले जाने वाले कर्त्ताधर्ता नहीं चाहिए। हिन्दी को किसी कॉरपोरेट हिंदुस्तानी-अंग्रेज़ का ठप्पा नहीं चाहिए। हिन्दी को कोई गॉडफादर नहीं चाहिए। हिन्दी को आप और हम चाहिए। दिल चाहिए। धड़कन चाहिए। 365 दिन। 24 घंटे। बिंदास। बेख़ौफ़। बेलाग।

इसलिए यहीं आकर दिल कह उठता है,

जब भी तेरी बज़्म में होता हूँ मैं, एक मुकम्मल नज़्म होता हूँ मैं।

अपनी प्रतिक्रिया देने में संकोच न करें — rupeshkashyap@gmail.com

रुपेश कुमार कश्यप

रुपेश कुमार कश्यप

 

 

"हर दुसरे मुद्दे की तरह हिंदी पखवाड़े को लेकर दो राय होना स्वाभाविक है. ये पखवाड़े क्या हासिल कर रहे हैं, किस तरह कर रहे हैं, और जिस कीमत पर कर रहे हैं क्या वो उचित है?

समय की साथ इनको भी बदलना चाहिए ये बात जितनी सही है, उतनी ये भी गलत नहीं है कि इन पखवाड़ों या ऐसे दुसरे प्रयासों के भी अपने फायदे है. जैसे सवतंत्रता दिवस पर एक दिन दे लिए ही सही देशभक्ति जनता के सर चढ़कर बोलती है. शहीदों की वीर गाथाए whatsapp ओर सोशल media पर ट्रेंड करने लगती है. आज के दौर में एक दिन के लिए ही सही देश भर में trend करना बहुत बड़ी उपलब्धि है. बस वही काम ये पखवाड़े कर देते हैं और हमारा सोया हुआ राष्ट्रभाषा प्रेम दो-चार दिन के लिए ही सही जागृत हो जाता है. स्मार्ट Phones पर गत वर्ष हिंदी दिवस के आसपास देवनागरी fonts सबसे ज्यादा download हुए. नयी पीढ़ी जो रोमन में ही हिंदी टाइप करती थी उन्हें अचानक से हिंदी message को देवनागरी में टाइप करने की धुन एक चुनौती की तरह मजेदार लगी. तो हिंदी पखवाड़े के बोलबाले ने जनता को याद दिलाया कि आपकी अपनी भी एक देसी लिपि है.
इसके अलावा, बैंकों में, दफ्तरों में, स्कूलों में जहाँ हिंदी Backseat पर बैठी होती है, इन दिनों स्टीयरिंग पकड़ लेती है. हमे हिंदी में बात करने, काम करने, लिखने, इत्यादि के लिए गर्व महसूस ही नहीं होता, इनाम भी मिलते हैं.
अब रही बात फंड्स के गलत इस्तेमाल की, तो भ्रष्टाचार हमारा दुर्भाग्य है, जिससे कोई scheme कोई प्रयास अछूता नहीं है.

तो पखवाड़े मानिए, पखवाड़े क्यों पूरा वर्ष मानिए, सचमुच हिंदी सीखना, हिंदी में वार्तालाप करना, हिंदी पढना सब बहुत सरल और सीधा है.

हम वही लिखते हैं, जो हम बोलते है, इसलिए पढने भर से बच्चे भी समझ जाते हैं कि लिखनेवाला क्या कहना चाहता है. हिंदी में confusion वाली बात ही नहीं है. अंग्रेज़ी के हर शब्द में आपको एक बतानेवाला चाहिए कि उसे कैसे कहा जाता है, उसको कैसे लिखा जाता है, spelling में क्या साइलेंट है, कहाँ पर stress देना है – वगैरह वगैरह. हिंदी में ऐसा बहुत कम होता है. देखिये सरलता और भाषा के लिपि की पूर्णता.

अपनी माँ इतनी सरलता से बात कर रही है फिर हम मुश्किल मम्मी को समझने की क्यों इतनी जद्दोजहद करते है?"

संजय शर्मा
संपादक
SWA/FWA Website

हिंदी दिवस पर एक बच्चे ने बनाया ये कार्टून भी देखिये जो कितने आसान व्यंग से हिंदी की व्यथा बता रहा है.

 

और जाते जाते सुनिए हिंदी की आज की अवस्था पर कवि-लेखक श्री रवि यादव की ये बहुत सुन्दर और हृदयस्पर्शी कविता..

 


-Dhananjay Kumar

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