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मंथन (कविता) – चन्दन कुमार मिश्रा

(मंथन) दर दर मैं यूँ फिरता हूँ गिरके फिर सम्भलता हूँ किसी के उठाने की मैं क्यों आस करूँ समझ में नहीं आता किस पे विश्वास करूँ। कोई कहता हम हिन्दू हैं कोई कहता है हम मुस्लिम हैं समझ नहीं … Continue reading

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