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दो किनारों की दास्ताँ (कविता) – आशुतोष तिवारी

दो किनारों की दास्ताँ सुनो, तुम्हे दो किनारो की, एक दास्ताँ सुनाता हूँ। उम्र से पहले जो ढल गया, किस्सों से भी आगे निकल गया तेज ख़ामोशी का दरिया, जिन दो किनारों को निगल गया। एक किनारा, आज नदी के … Continue reading

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