Rest In Peace, OM PURI Ji!

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The world will remember him as one of the most naturally gifted actors ever. Many will remember him for his warm earthiness and rustic Punjabi humour. A few will remember him for his down-to-earth attitude and the genuine camaraderie he enjoyed with like-minded people such as the senior Puri (Amrishji – no relation) Naseeruddin Shah, Gulshan Grover and others. Fewer still will remember him for the terrific mimic and prankster he was.

Somewhere today, my former Army driver Sethu will be recalling the day when he stood mouth agape, in total shock, as Omji nimbly hopped into our car, even though the film unit had sent a car for him. This was during the shooting of ‘China Gate’ in Hyderabad; the deal was that I travel with him to the location and continue the interview in the car. However, the minute I pulled up outside the hotel in an Army car, Omji ne na daayan dekha na baayan, bas, he got into our car as it had been his dearest wish once upon a time to join the Indian Army. Needless to say, the drive was more of a trip down memory lane and the interview was pushed aside for later. On location, he and Amrishji kept me in splits and both took it in turns to do my khaatirdaari when the other was called for the shot.

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Somewhere today, my maami (aunt’s) sister will be recalling the time I stayed with her in London. I was attending the World Travel Mart and when I came back home one evening, she said: “Some Om had called for you.” Omji knew that I was in London; he himself was shooting in Wales at the time and had taken it upon himself to check train timings so I could travel down; “Yaar, six bedroom ka cottage diya hai unit waalon ne, bore ho raha hoon, aaja, gappe lagate hain!” I was in splits as I told Lubna aunty it was Om Puri whom she had spoken to. “Hain? Om Puri? The actor??” She literally begged me to let her speak to him so when I called him back, I requested him to say a quick “hi” to her and he generously obliged, indeed, he floored her with his warmth.

And somewhere today, I have been thinking that I spoke to the man just three days ago. He had the flu and his voice sounded heavy with the cold and so we discussed meeting next time either when he was in Bangkok or when I was back in Bombay. If anything, this incident has brought home to me sharply that there are no “next times” – the time that we know is the here and now.

His former wife, Nandita, had written a controversial book on him, but I was surprised to see that she had skipped over much of the early years and the harsh childhood that went into shaping his indomitable spirit. His parents were quite poor and therefore he was being brought up by his uncle and aunt in the village. One day his father and uncle had a fight, as a result of which Omji was made to leave the house. He hid out in the outbuildings and his school friends would steal raw vegetables from their farms and bring him, which the young Om (he was in the 4th Std, so about 9-10 years old then) would attempt to cook. By the time he was in the 5th Std, he was giving tuitions to other children to make ends meet for himself. Omji was very keen to join the Indian Army and even went to the Recruitment Centre at Ambala, however, the Recruiting Officer asked for bribe money which of course, he didn’t have and a disgusted, disillusioned Om turned back – but he never lost his love of all things Army. Much later in his life, when his only child Ishaan was born, he was diagnosed with partial blindness and Omji told me once that he was taking on any role that came his way simply because he had to earn lots of money; there was only one Chinese doctor in Boston who could perform this surgery and this was Omji’s goal.

This is a man who rose above his physical shortcomings and socio-economic background, to win laurels such as the Padma Shri and the OBE, to gain recognition both in the east and the west. Om Puri will be remembered by many for the deeply sensitive, versatile actor that he was and the hard hitting performances that he gave. But some will remember him for the true friend that he was and for the humour and humility that stayed with him no matter how many pinnacles he climbed. If someone can say this about me in my obituary, it will have been a life well worth lived.

– Punam Mohandas

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ओमपुरी- संघर्ष की सतत यात्रा का बेसुरा विराम!

यूं तो मैं बचपन से ही ओमपुरी का प्रशंसक रहा पर मेरा ये दुर्भाग्य रहा कि जब मेरी उनसे मुलाकात हुई तब वे अपनी पत्नी नंदिता के साथ अपने रिश्ते को लेकर कशमकश में थें। उनके टूटते रिश्ते को लेकर समाचार चैनल बड़ी खबरें चला रहे थे, लेकिन मुझसे उनका मिलना शायद मजबूरी थी क्योंकि जयपुर में आयोजित कार्यक्रम उस सीमेंट कंपनी द्वारा आयोजित किया गया था, जिसके वे कुछ समय से ब्रांड एबेंसडर थे। ऐसे में उनका प्रेस रिपोटर्स से रूबरू होना मानो एक पीड़ा का सबब था।

मुझे आज भी याद है वो दिन जब ओम पूरे इंटरव्यू के दौरान आंखें चुरा रहे थे मानो उन्हें डर हो कि मैं कहीं उनसे नंदिता और उनकी टूटती घर गृहस्थी को लेकर कोई सवाल ना कर बैठूं। मैं उनकी पीड़ा को ताड़ गया और मैंने इस बात को लेकर उनसे कोई सवाल नहीं किया। हालांकि दूसरे दिन मेरे पास अपनी न्यूज़ स्टोरी का सनसनी खेज शीर्षक नहीं था और इसे लेकर मेरे सिनेप्रेमी चीफ रिपोर्टर भी मुझसे थोड़े खफा थे । लेकिन आज ओमपुरी जब हमारे बीच नहीं रहे तब गहरी वेदना के बीच मुझे उस दिन की अकर्मण्यता पर खुशी हो रही है।

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ओमपुरी नामक अभिनेता जिसे संघर्ष का दूसरा नाम कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। ओमपुरी के पंजाब में बिताएं बचपन और किशोरवय के बाद के संघर्ष को दरकिनार कर दिल्ली राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की बात करूं तो यहां भी उन्हें बेहतर अभिनेता होने के बावजूद सैकंड लीड रोल मिलें । नाट्य विद्यालय के तत्कालीन निदेशक इब्राहीम अल्काजी नसीरूद्दीन शाह को प्रमुख रोल दिया करते थे। एक बार जब नसीर नाटक में प्रमुख भूमिका निभाने में असमर्थ थे तो अल्काजी ने दूसरे छात्र सतपाल को प्रमुख रोल देने की बात कहीं तो उन्होंने पूरी क्लास के सामने इस बात का विरोध किया क्योंकि उन्हें विश्वास था कि वो किसी भी मामले में सतपाल से कमतर नहीं हैं।

उनके भद्दे से दिखने वाले चेहरे को लेकर हिंदी फिल्म इडंस्ट्री की मुखयधारा से जुड़े लगों ने चाहे कुछ भी कहा हो पर उनके बेजोड़ अभिनय का लोहा सबने माना। ओमपुरी के मुंबई में शुरूआती दिनों में मरहूम हास्य अभिनेता महमूद ने कहा था कि यार इंडस्ट्री में एक नया अभिनेता आया है जिसके चेहरे के गडढों को एक किलो गोस्त के कीमे से भी नहीं भरा जा सजा सकता है, और बोलता है तो उसकी आवाज ऐसी लगती है जैसे छलनी में कंकड़ छाने जा रहे हों पर जालिम अभिनय ऐसा करता है कि उसे पर्दे पे देख कलेजा मुंह को आता है।

लेकिन उनके जीवन वृत को देख ताज्जुब होता है कि जिसने अपने समय में दुनियां के तमाम विरोध के बाद भी अपने हुनर का लोहा मनवा लिया वो इंसान अपने प्यार और परिवार के समक्ष इतना कमजोर साबित हुआ।

सीमा कपूर से उनकी शादी भी एक हादसे के समान साबित हुई ।

इस क्षणिक से रिश्ते को लेकर सीमा कपूर को इस बात की तसल्ली थी कि उन्होंने उस इंसान से शादी की हैं जिसे वो इंडस्ट्री हाथों हाथ ले रही है जिसमें वो अपनी असीम खूबसूरती के बाद भी अच्छा सा स्थान नहीं बना पाईं वहीं सीमा कपूर के तल्ख लहजे के कारण ओमपुरी ने भी कहीं ना कहीं सीमा कपूर को भी अपने मानसपटल पर उन ट्रोफियों की संज्ञा दे दी जो उन्होंने अपने हुनर के दम पर जीतीं थी।

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उनकी दूसरी पत्नी पत्रकार नंदिता जो कोलकाता में उन्हें सिटी ऑफ जॉय की शूटिंग के दौराना मिली। सीमा कपूर से उनकी शादी की तुलना में ये रिश्ता काफी समय चला लेकिन इस रिश्ते में तल्खी तब आई जब उन्हें सबसे ज्यादा इस रिश्ते की जरूरत थी। उन्हें पिछले कुछ सालों से इस बात की पीड़ा भी थी कि उनकी पत्नी सबसे गाहे बगाहे उनके मासूम बेटे की नजरों में उन्हें बड़ा विलेन साबित करने पर जुटी हुई थी, उनकी मौत के बाद सवाल ये भी आता है कि अब सीमा कपूर को क्या आन पड़ी थी जो वे दोबारा से ओम पुरी के संपर्क में आई और नंदिता से उनका गर्भनाल सा कच्चा पड़ा रिश्ता अंतत: कट गया।

मुझे ये तो नहीं पता कि उन्हें दिल का दौरा पड़ने की वजह, कौन सा एसा समाचार था जो उनके कान में पड़ा जिसे सुनकर वे विचलित हुए होंगे पर उनका ये पूरा देश जानता है कि उनका अंतिम समय शांति सुकून से दूर रहा। अपने आसपास के माहौल से विदीर्ण होकर वे शराबनोशी के आगोश में समा गए।

कुछ समय पहले ऐसे माहौल में ही उनसे फौजियों के लेकर कुछ अटपटा निकल गया तो पूरे देश ने उन्हें आड़े हाथ लिया। दूसरे दिन ही उन पर कौनसा ऐसा दबाब पड़ा कि वे फौजियों के जूतों के आगे नाक रिगड़ने की बात करने लगे। मुझे तो उस समय उनके कंपकंपाते शरीर को लेकर ही मन में डर की एक लहर उत्पन्न हो गई थई। और इस डरा का पटाक्षेप आज सुबह हो ही गया जब मैंने ये खबर सुनी कि अभिनेता ओम पुरी नहीं रहे। … ओम सर भले आप शरीर से हमारे साथ नहीं रहे हों पर अपने काम के जरिए आप दशकों तक आने वाली पीढियों के दिल में मौजूद रहें। । .. सादर नमन!

 

– धर्मेंद्र उपाध्याय

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