ग़ज़ले 5 – धवल चोखडिया

ग़ज़ले – धवल चोखडिया

 

(1)

 

कुछ इस तरह हम सब से अलग हो गए

जैसे सुबह को आँखों से नींद चली जाती है

 

आखिर तक उसने गुफ्तगू की उम्मीद रखी

लेकिन कुछ बातें नज़रो से भी कही जाती है

 

दुनिया की चका-चौंध से थक जाओ अगर

एक रोशनी है जो ख़ुद के अंदर मिल जाती है

 

कई बार ऐसा हुआ जो चाहा वो ना मिला

और कभी बे-वक्त पे सौगाते मिल जाती है

 

चेहरे की हँसी कभी कभी झूठ भी होती है

कुछ हँसी के पीछे दबी हुई चीख मिल जाती है

 

(2)   

 

वही छोड़ के चला जाता है जो करीब होता है

हर रिश्ते में हम थोड़ी दूरी रखना सीख गए है

 

किताबे पढ़कर हमने बस एक बात को जाना है

झूठ को सच की तरह पेश करना सीख गए है

 

गम-ए-दुनिया के आगे मेरा गम बहुत छोटा है

भीगी हुई पलकों से भी मुस्कुराना सीख गए है

 

दर्द रोज़गार का हो या फिर टूटे दिल की बाते

हर तजुर्बे निचोड़कर शायरी कहना सीख गए है

 

नशा चढ़ रहा है खुदा तेरी बंदगी का धीरे धीरे

लगता है की खुदा से बाते करना सीख गए है

(3)

 

अपनी तबियत को ज़रा ठीक रखो

दिल में शक नहीं उम्मीद को रखो

 

ये दुनिया भले ही पागल कहे तुम्हे

अपना मुक्कदर बदलने की ज़िद रखो

 

बे-सिम्त जिंदगी को जो राहे दिखाए

अपने पास ऐसा एक रहबर रखो            [बे-सिम्त – दिशाहीन, रहबर – पथदर्शक]

 

न जाने कब तूफ़ान उड़ा ले जाए

कभी कभी कश्ती को साहिल पे रखो

 

ख़ुद से नाराज़गी इतनी अच्छी नहीं

वक्त के इंसाफ का तुम सब्र रखो

 

(4)

 

ऐ आसमान तेरे सितारे फीके पड़ गये है

मेरे ज़ख्मो की रौशनी से उजाले हो गये है

 

क्या करू, क्या नहीं, बड़ी उलजन सी है

अब सारे सवाल खुदा तेरे हवाले हो गये है

 

कौन समज पाया है इस बेबूझ जिंदगी को

जो समजने गये वो सारे बावले हो गये है

 

तू कहे तो रुक जाऊं, तू कहे तो मुड जाऊं

देखा नहीं पैरो में कितने छाले हो गये है

 

दुनिया में लोग बाते बड़ी अच्छी करते है

पर मन मेला और दिल काले हो गये है

 

शायर और लेखक

शायर और लेखक

धवल चोखडिया

dhaval.chokhadia@gmail.com

 

 

This entry was posted in Notices and tagged , , , . Bookmark the permalink.