क़लम से की-बोर्ड तक

क़लम के सिपाही, क़लम की ताक़त जैसे जुमले एक ज़माने में बहुत ही मशहूर थे, इन जुमले से यही लगता था की क़लम में बहुत ताकत होती है ! एक वक़्त में क़लमकारों ने क़लम से इन्कलाब को बुलंद किया.. जिसके पास क़लम होती थी यानि जो क़लमकार होता था उसका रूतबा बहुत होता था ! श्री सलीम-जावेद की जोड़ी, पंडित मुखराम शर्मा, श्री अली रज़ा, डॉ राही मासूम रज़ा, श्री जलीस शेरवानी और न जाने कितने ही अल्फाज़ के जादूगरों ने न सिर्फ हिन्दुस्तान में बल्कि सारी दुनियां में अपना रुतबा क़लम से ही बनाया… वक़्त बदला तो जुमलो की अहमियत भी बदल गयी… अब क़लम का रुख बदल गया… क़लमकार अब कीबोर्ड चलाने लगे… और कीबोर्ड चलाने वालो ने भी झंडे गाड़े है ! श्री चेतन भगत, श्री राजकुमार हिरानी और श्री कमलेश पांडे उन में से कुछ नाम है !
एक ज़माना था जब किसी भी क़लमकार, किसी भी लेखक के लिए क़लम की वही अहमियत थी जो किसी भी सिपाही के लिए तीर-तलवार या बन्दूक की होती है…. जिस तरह एक सिपाही घर से निकलते वक़्त तलवार, एक मजदूर घर से निकलते वक़्त अपने औज़ार और ज़िन्दगी के दुसरे शौबो में काम करने वाले दुसरे लोग अपने काम में या काम से मुताल्लिक चीजो को लेकर घर से निकलते है उसी तरह क़लमकार भी अपनी जेब में पैन(क़लम) सजा कर निकलता था, ! बकौल शायर “आते है आसमाँ से मजामी ख्याल के”, तो जब मजामी-ऐ-ख्याल आसमां से उतरने शुरू होते थे तो तब उनकी रफ़्तार के साथ क़लम को एक लय मिलती थी… क़लम और क़लमकार के दरमियान एक ऐसा रिदिम बनती थी कि कागज पर अल्फाज किसी गीत, किसी संगीत की तरह नपे तुले, न कम न ज्यादा उतरते चले जाते थे… लेकिन वक़्त बदला, ज़माना बदला और बदलते ज़माने के साथ क़लमकार के हाथ में सजने वाला क़लम को कहीं किसी रद्दी की टोकरी, कहीं किसी डस्टबिन या कहीं किसी पुरानी शेफ में फ़ेंक दिया गया.. और बदलते ज़माने ने उनके हाथ में कीबोर्ड पकड़ा दिया… बकौल खुद मेरे और मेरे चन्द दोस्तों के मैं भी एक क़लमकार हूँ, और मैंने भी जब अपना सफ़र शुरू किया था तो मेरे हाथों में भी क़लम ही था.. और शायद क़लम आज भी कहीं मेरी राईटिंग टेबल की किसी दराज या फिर मेरे किसी पुराने बैग की किसी जेब में पड़ा हुआ इंतजार कर रहा होगा कि मेरी उंगलियाँ उस तक पहुंचे और कब तखलीक का वो सफ़र जो दरमियान में छुट गया था उस सफ़र की फिर से इब्तदा हो, मगर बदलते ज़माने के साथ मैंने भी क़लम का साथ छोड़कर कीबोर्ड का साथ पकड़ लिया… लेकिन मेरे क़लम के अन्दर एक बहुत बड़ी अच्छी आदत थी कि मैं लिखकर बहुत कम काटता था… मगर इस कमबख्त कीबोर्ड के अन्दर एक बहुत बुरी आदत है… कि नज़र को नजर कर देता है और ख़बर को खबर कर देता है… फिर वापस मिटाता हूँ और ये नुक्ते ढूंड़ता हूँ !
मैं और मेरी उँगलियाँ क़लम की तरह अब कीबोर्ड से जुड़ चुकी है… आज मैं उस दोराहे पर खड़ा हूँ जिसके एक तरफ कीबोर्ड है और दूसरी तरफ क़लम है.. जहाँ एक और दिल तमाम तख्लीकी सलाह्यतें बार-बार क़लम की तरफ लेकर जाती है… और बदलता वक़्त, बदलते वक़्त की ज़रूरतें बार-बार कीबोर्ड की तरफ लेकर जाती है, और उन दोनों के दरमियाँ खड़ा हुआ ये तख्लीककार अपने लिखे हुए फनपारों में फन ढूंढता रह जाता है… ये था क़लम से कीबोर्ड तक का सफ़र… मेरी समझ यही कहती है कि ताकत क़लम या कीबोर्ड में नहीं ताकत सोच में है ! अब सोच की ताकत क़लम से दिखाई जाये या कीबोर्ड से ये फैसला फनकार को करना है……!
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लेखक – तनवीर आलम
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