हुआ तेरे हक़ में फैसला – ग़ज़ल – उमेश धरमराज

हुआ तेरे हक़ में फैसला

 

तुझसे पहले कितने मिले

तुझसा पहले नहीं मिला.

हर शै तुझसे हार गयी

हुआ तेरे हक़ में फैसला.

 

सबब ये हैं दिदार हो

ये हैं चर्चे तेरे ही नूर के.

हद-ए-नज़र तक कारवां

तेरी ओर बढता ये क़ाफिला

हर शै तुझसे हार गयी

हुआ तेरे हक़ में फैसला…

 

कई हैं हसिन सुरतें

हसिं नहीं कोई रूह से.

तुझमे सब मे कितना हैं

बहुत बडा हैं फासला.

हर शै तुझसे हार गयी

हुआ तेरे हक़ में फैसला…

 

जो करे तेरी नज़र बयां

दिलो जां पे वो करे असर.

कभी युग का यादगार पल

या कभी क़यामत – ज़लज़ला.

हर शै तुझसे हार गयी

हुआ तेरे हक़ में फैसला…

 

तु जो ना कहे तो शिकस्त हैं

इक़रार फतह हयात.

तु वजह हुई मेरी जित की

तु ही जिन्दा रहने का हौसला.

हर शै तुझसे हार गयी

हुआ तेरे हक़ में फैसला…

 

बिना तेरे ये मेरा वजूद

दरख़्त बिन ज़मीन का.

तू ही अर्श की बुलंदीयां

तू ही कामयाबी का सिलसिला.

हर शै तुझसे हार गयी

हुआ तेरे हक़ में फैसला…

 

तू हैं ज़र्रे से कभी मामूली

तुझमे ही सिमटी ये क़ायनात.

कभी ज़िन्दगी कभी हैं फ़ना

कभी लौ लगाने का मामला.

हर शै तुझसे हार गयी

हुआ तेरे हक़ में फैसला…

– उमेश धरमराज.

umesh.dharamraj@gmail.com

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