हर रोज़ दीवाली हर रोज़ दशहरा (कविता) – शशिकांत जुनेजा

हर रोज़ दिवाली होती है, हर रोज़ दशहरा  होता है.
हर रोज़ अच्छाई का, गर दिल पर पहरा होता है.

हर रोज़ दिवाली…….

दिल में राम है, दिल में ही तो रावण है.
दिल में ही पतझड़, दिल में ही तो सावण है.
मन चंचल है कहाँ कहाँ, ये जा कर ठहरा है

हर रोज़ दिवाली……

आज भी रावण ज़िंदा है, अट्टहास लगाता है.
कभी इस दिल में, कभी उसमें आता जाता है.
राम कहाँ है कोई बताये. रावण का पहरा है.

हर रोज़ दिवाली है……..

जगमग जगमग जोतों में, रावण खो जाता था.
संस्कार के साये में, आ करके सो जाता था.
अब बारूद के साये में, आकर के रावण ठहरा है.

हर रोज़ दिवाली होती है, हर रोज़ दशहरा होता है
हर रोज़ अच्छाई का, गर दिल पर पहरा होता है.

  • शशिकांत जुनेजा
  • junejashashi@gmail.com
    junejashashikant
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