“सूखे गुलाब की महक” – मनोजकुमार मिश्रा

भागलपुर स्टेशन पे झटके से इंटरसिटी ट्रेन आकर रूकी तो प्रिया की आंखें अचानक से खुल गयी। अलसायी नज़रो से बाहर देखा तो कुछ एक लोग ही नज़र आ रहे थे। गाड़ी पकड़ने के जल्दबाजी ने प्रिया को थका दिया था। और ऊपर से राजीव कि किचकिच, जल्दी करो ट्रेन निकल जायेगी, मुझे आॅफिस पहुचना है कल बहुत ज़रूरी मीटीग है, मेरी मीटिंग का क्या होगा। उफ….. इतनी सारी बातों के बीच प्रिया कभी सामान समेटती तो कभी रागनी के लिए कपड़े निकालती। रागनी प्रिया की तीन साल की प्यारी सी बेटी, एक मासूम सी परी। इतने जद्दो जहद के बाद जैसे-तैसे राजीव और प्रिया ट्रेन में बैठी तो उसकी आंखे लग गयी थी। भागलपुर स्टेशन पर ज्यादा गहमा-गहमी तो नहीं थी। लेकिन इन सबके बीच हाॅकर्स का कभी-कभी आवाजें जरूर आ रही थी। पानी ले लो, ठंडा पानी, ए बतिया बाला, चाय वाले चाय ए गरम चाय, तो कही से लीची वाले की अावाज़े, ए लीची ले लो। ऐसी ही अावाज़े प्रिया के कानों में आ रही थी कि तभी, मम्मी मम्मी मुझे आइसक्रिम चाहिए? रागनी ने अपनी तुतली ज़ुबान में कहा। प्रिया के आखों में जो भी रही सही नींन्द थी, कपूर बनकर उड़ गया। अच्छा….. प्रिया ने कहा। प्रिया ने पहले सोचा कि राजीव को ही बोल देती हूँ, वही दिला आयेगा रागनी को आइसक्रिम। लेकिन जैसे ही प्रिया ने अपने उपर वाली सीट पर देखा, राजीव गहरी नींद में सो रहा था। प्रिया ने राजीव की नींद मे खलल डालना उचित नहीं समझा। और फिर अपने पति का नींद तो सर्वप्रिय होता है। चलो मैं ही दिला लाती हूँ आइसक्रिम ऐसा प्रिया ने सोचा, और रागनी का हाथ पकड़ कर ट्रेन के दरवाजे की तरफ बड़ गयी। ट्रेन से जैसे ही नीचे उतरी। एक कूली को आवाज़ लगाकर पूछा। भैया यहाँ पर ट्रेन कितनी देर रुकेगी? बीस मिनट बहन जी, कूली ने जबाब दिया। अच्छा ठीक है इतना कहकर प्रिया स्टेशन पर आगे निकल गयी। प्रिया ने इधर-उधर देखा, लेकिन आइसक्रिम वाला कहीं दिखाई नहीं दिया। तो प्रिया को याद आया कि एक आइसक्रिम वाला तो स्टेशन के बाहर अपना आइसक्रिम बाॅक्स लगाता है! चलो उसी से ले आती हूँ। और फिर प्रिया स्टेशन से बाहर रागनी का हाथ पकड़े हुए निकल गयी।                       स्टेशन से बाहर निकलकर जब प्रिया ने नज़रे घुमाकर स्टेशन को देखा तो उसके मानसपटल पे कई तरह की पुरानी यादें ताज़ा हो गई। क्या….यही है वो स्टेशन? जब हम चारो गाहे बगाहे यहाँ आ जाया करते थे। वही गाड़ी वालों का आवाजे लगाना, वही सारे भिखारी, वही पटरियों पे किसी कपड़े वाले या फल वालो की आवाज़ कुछ भी तो नहीं बदला था बिगत इन दस वर्षों में। हां थोड़ा सा स्टेशन का मरम्मत जरूर हो गया था। तो क्या हरीया काका की चाय की दुकान अभी भी होगा? ये एक सवाल किया था उसके मन ने प्रिया से, प्रिया को ऐसा महसूस हो रहा था मानो इन दस वर्षों का बीता हुआ समय कुछ कहना चाहता हो। पर क्या? दिल-दिमाग में एक मीठी सी चाहत दौड़ने लगा। प्रिया के मन मतिष्क को किसी ने झकझोरा था। प्रिया का रोम रोम प्रफुल्लित हो गया। उसने वहाँ किसी को महसूस किया था। बिगत १० वर्षों में प्रिया एक बार भी भागलपुर वापस नहीं आयी थी, जब भी अपनी सहेलियों से बात करना होता फोन पे ही बात कर लेती। लेकिन उसका मन कभी यहाँ से गया ही नहीं। प्रिया ने अपनी १२ वी तक की पढाई भागलपुर से ही किया था। प्रिया, रमा, उषा, और नेहा ये चारों एक ही क्लास की दोस्त थी, स्कूल से वापस आते वक्त ये चारों हमेशा हरीया के दूकान पे चाय पीने चली जात। कोयले के भट्टी पे बनाया हुअा चाय का टेस्ट बहुत ही सुन्दर हुआ करता था। चारों लड़की हसमुख और चुलबुली थी, हमेशा चेहरे पे एक मुस्कान लिए रहती थी। चाय की चुस्की लेती और फिर अपने-अपने घर चली जाती। अब तो मानो उसको पंख ही लग गया हो वो जल्दी से जल्दी हरीया काका, के दुकान पे जाना चाहती थी…….!                                 हरी काका कैसे हैं आप, पहचाना ? प्रिया ने कहा! हरीया ने अपनी गर्दन घुमाकर देखा और कुछ याद करने की कोशिश करने लगा। हरी ने अपना चश्मा थोड़ा ठीक किया जो उम्र के दहलीज के पास आकर लग ही जाता है। पहचानने की कोशिश करते हुए अभी कुछ ही पल हुए थे, कि प्रिया ने कहा आप भूल गये शायद! और मानो हरीया को अचानक से सबकुछ याद आ गया हो….जैसे उसकी केतली में चाय उबल रही थी। अचानक ही उनके मन में वो सारी बातें उबलने लगी। ज़ुबान से कुछ बोल तो नहीं पाया लेकिन अपने आप को रोक नहीं पाये और उठकर खड़े हो गये, मानो हरीया प्रिया का स्वागत कर रहा हो। अपने कंधे पे रखे हुए गमछा से एक बगल वाला टेबल खीच कर साफ करने लगे। मानो उसपर वर्षों का धूल जमा हो। ताकि प्रिया को उसपे बिठा सके। अरे नहीं नहीं काका ये क्या कर रहे हैं आप, प्रिया ने स्नेह बस कहा। अरे नहीं बिटीया ये तो हमारा फर्ज है। फिर प्रिया को खुद ही ये एहसास हुआ कि हमारे पिता तुल्य है हरीया काका, उनको मेरे लिये येकरना अच्छा नहीं लगा। तो प्रिया ने खुद ही टेबल खीचा और बैठ गयी।..                             एक कप चाय मिलेगी? प्रिया ने धीरे से हरीया से कहा। हां हां क्यों नहीं मै अभी देता हूँ ये कहकर हरी ने एक काच के ग्लास में प्रिया को चाय पकड़ा दी। प्रिया ने एक सिप चाय का लिया और हरीया से पूछा। हरी काका आपके दूकान पे प्रेम नहीं दिख रहा है! आज कहीं गया है क्या? हरीया को तो मानो साँप सूघ गया हो, तोड़ के रख दिया था प्रिया के इस सवाल ने। हरीया के चेहरे पे अचानक ही उदासी सी छा गयी। मन भारी हो गया आखिर क्या जवाब दिया जाय इस सवाल का, यही सोच हरीया के मन मे कयी सवाल उभर रहा था। और हरीया ने अपनी गर्दन नीचे कर लिया।                               प्रेम नाम तो उसका इन चारों लड़कीयो ने दिया था। उसका असली नाम तो डब्बू था। प्रिया अपने सहेली के साथ जब पहली बार हरी के दुकान पे चाय पीने के लिए आयी थी। तो डब्बू ने ही उसका स्वागत किया था। एक बेन्च जो अलग थलग रखा था उसका धूल डब्बू ने खुद अपनी गमछा से साफ किया। आइये आप लोग इधर इस बेन्च पे बैठिये। डब्बू ने बेन्च साफ करते हुए कहा। अरे रहने भी दो इसकी कोई जरूरत नहीं है, वैसे साफ ही तो है। आपका गमछा गंदा हो जायगा। प्रिया ने डब्बू के सवाल का जवाब दिया था। डब्बू अपनी हसी दबाये हुए रह गया। और सोचा कितना सुन्दर विचार है इनका ये तो हमारे गमछा के बारे में भी सोच रहे हैं। हमारे लिये चार कप चाय, प्रिया ने डब्बू से कहा। जी अभी दिया। अरे हाँ अच्छा एक बात बताइए आपका नाम क्या है? प्रिया ने डब्बू के मिलनसार स्वाभाव को देखते हुए पूछा था। जी डब्बू , डब्बू ने जवाब दिया। तो सारी लड़कियां हंस पड़ी। डब्बू को समझ ही नहीं आया कि ये हंस क्यों रही है। उषा ने हसीं से परदा हटाते हुए डब्बू से कहा ये भी कोई नाम है! मेरा मतलब नाम तो है पर अच्छा नहीं है। डब्बू ने अपना सर नीचे झुका लिया। हम उम्र ही थे डब्बू भी लेकिन समय के थपेड़े ने डब्बू को चाय के दुकान पे लाकर खड़ा कर दिया था। फिर क्या होना चाहिए था मेरा नाम? डब्बू को थोड़ा यहाँ अपना इनसल्ट होते हुए भी दिख रहा था। डब्बू के आखों मे थोड़ा आक्रोश भी दिखा था उसको ऐसा लगा था कि मेरे नाम का हंसी उड़ाई जा रही है। आपके अन्दर इतना सेवा भाव है इतना प्रेम है। प्रिया ने कहा, प्रेम….प्रेम तो बहुत बड़ियां नाम है, हाँ उसका समर्थन उषा ने किया। हम लोग आज से आपको प्रेम कहकर बुलायेगे। ठीक है! डब्बू ने कहा ठीक है। हरीया सबकी बातो को बड़े गौर से अनसुना करके सुन रहा था। और अन्दर ही अन्दर मुस्करा भी रहे थे। अरे डब्बू जरा वो चाय का गिलास तो इधर पकडा़ हरीया ने कहा। तो तपाक से डब्बू ने कहा हरी काका मेरा नाम डब्बू नहीं प्रेम है। ये सुनकर वहां पर बैठे हुए सारे लोग हंस पड़े थे।                          वाकयी डब्बू का बड़ा योगदान था हरीया के चाय दुकान में जब से डब्बू उसके दुकान पे आया था हरीया का बिक्री चार गुना बड़ गया था। बड़ा ही भाग्यशाली था, डब्बू से बना प्रेम। आप लोगों की चाय! ये कहते हुए डब्बू यानी कि प्रेम ने चारों को चाय की ग्लास पकड़ाई। चारों ने चाय पी और चल दिये। तभी से उसका नाम  प्रेम हो गया था। और सभी उसको प्रेम कहकर बुलाता।                                     हरीया ने प्रिया का जिज्ञासा को भापते हुए देख लिया था। प्रिया चाय तो पी रही थी लेकिन उसका मन प्रेम में अटक गया था। जब तक प्रिया और उसकी सहेली स्कूल में रही तब तक शायद ही ऐसा कोई दिन होगा। जब ये चारों हरीया के दुकान पे चाय पीने नहीं आयी हो सिर्फ सन्डे को छोड़कर। जब भी ये वहाँ आती प्रेम बहुत ही प्रेम से सबका स्वागत करता, चाय पानी पिलाता। अब इन चारों के जिन्दगी का प्रेम एक अहम हिस्सा हो चुका था। जिसको जो भी मन मे होता कह देता ना कभी प्रेम ने किसी की शिकायत की और ना ही कभी इन चारों के हरकतों से उबा था। समय को तो पंख होता है ऐसा कहा जाता है, कब दो तीन साल बीत गया पता ही नहीं चला। एक दिन प्रिया ने प्रेम से कहा प्रेम आप इतने सच्चे और अच्छे हैं, आप सबकी सेवा करते है और आप हुनर मंद भी लगते हैं आपने पड़ाई क्यों नहीं की अगर आप पड़ाई करते तो आपकी जिन्दगी में एक  लेकिन समय का बंधन हमेशा आड़े अाता है ये कहते हुए अक्सर सुना गया है। और शायद अमीरी ग़रीवी की दीवार भी, तभी प्रेम ने अपनी भावना को दबाये रखा। उनसे कभी भी अपनी भावनाओं को प्रगट नहीं होने दिया। हरीया ने शायद इस बात को भांप लिया था कि प्रेम, प्रिया को अंदर ही अंदर चाहने लगा है। इसपर हरीया ने प्रेम से कहा भी कि तू उस लायक नहीं है जो प्रिया जैसी लड़की से प्यार कर सके। तो प्रेम ने बडे ही रोचक अंदाज में जवाब दिया कि प्रेम ही एक ऐसी जिज्ञासा है जिसमें किसी का पकड़ नहीं है कोई भी किसी से भी प्रेम कर सकता है। और इसपर प्रतिबन्ध भी नहीं लगाया जा सकता है। जबतक कि हम किसी को ये ना कह दें कि मै आपसे प्यार करता हूँ। प्रेम की बात सुनकर हरीया निरुत्तर हो गया था। प्रेम ने बिलकुल सही कहा था कि जबतक हम अपने प्रेम का इजहार नहीं करते कोई भी गुनाहगार नहीं हो सकता। प्रेम पड़ा लिखा ज्यादा नहीं था लेकिन उसके रग रग मे संस्कार भरा था। ऐसा हरीया ने कई बार महसूस किया।                               प्रिया बार-बार इधर-उधर देखती कि शायद प्रेम आ जायेगा। लेकिन वो नहीं आया। हरी काका आपने जवाब नहीं दिया। प्रेम कहाँ है? प्रिया ने एक बार फिर सवाल किया तो, हरीया का सर जो नीचे झुका था वो रोक ना सके। हरीया ने अपना सिर उपर किया और अपना चश्मा ऊतारा। बाकी बातें तो हरीया की आखों ने ही कह दी। आंखें डबडबाई हुई गला रून्ध गया लफ्जों को कह पाने में वो सक्षम नहीं थे। प्रिया को समझने मे देर ना लगी कि प्रेम अब हमारे बीच नहीं है। प्रिया सब समझ गयी थी। ये कैसे हुआ काका? प्रिया ने एक सवाल फिर से हरीया से किया……!                       ये तब की बात है जब तुम्हारे पापा का यहाँ से ट्रांसफर हो रहा था। ये बात तुमने खुद ही अपनी सहेलियों को बताया था कि मेरे पापा का ट्रांसफर पटना हो गया है और अब हम सभी पटना चले जायेंगे। हां हां बताया था प्रिया ने कहा। अफसोस तो तुम्हारी दोस्तों को भी हुआ था कि अब तुम्हारी चौकड़ी टूट जायेगी। लेकिन प्रेम को तुम्हरी इस बात का कुछ ज्यदा ही गहरा असर हुआ। वो ना जाने क्यों उदास सा हो गया था। हां ये बात मैने भी महसूस किया था काका.. प्रिया ने कहा। प्रेम के पापा तो दंगाइयों के हाथों मारे गये थे। एक माँ और अपने से छोटी बहन का बोझ ढो रहा था बेचारा। प्रेम के ही भरोसे से उनकी प्रेम का बगीचा चल रहा था। जी ये सारी बातें उसने मुझसे बतायी थी प्रिया ने हरीया से कहा। जिस दिन तुम और तुम्हारी मम्मी पापा ट्रांसफर होके पटना जा रहे थे उस दिन वो तुमसे मिलने के लिए स्टेशन भी गया था। उसको गुलाब ढुढने में थोड़ा ज्यादा समय लग गया था। शायद तुम्हें गुलाब बहुत पसन्द है। हां है प्रिया ने कहा। प्रेम ये बात भी जानता था शायद, हरीया ने कहा। उसको ये लगा होगा कि अब तुमलोग उससे नहीं मिल पाओगे तो क्यों ना तुमको तुम्हारी मन पसंद चीज देकर तुम्हें अंतिम बार खुश कर दिया जाये। बस यही वजह रहा होगा शायद कि वो गुलाब ढुन्ढने निकल गया था। लेकिन जब तक वो स्टेशन पहुंचा तब तक तुम्हारी ट्रेन चल चुकी थी। वो अपने हाथों में वो गुलाब लिए बेतहाशा ट्रेन के पीछे दौड़ता रहा। हर डिब्बे के खिडकियो में देखा लेकिन तुम उसको नहीं दिखीं। और वो इसी भागदौड़ में ट्रेन के आखरी डिब्बों से वो टकरा गया और उसके बाद उसको कुछ होश नहीं रहा कि आखिर उसको हुआ क्या। उसको अंदरुनी चोटें आयी थी। मुझे जैसे ही पता चला हम दौड़के प्लेटफार्म पर गये तब तक बहुत देर हो गयी थी। आनन फानन मे उसे उठाकर कर हाॅस्पीटल ले गये। उसकी आखें कभी बंद तो कभी खुलती थी। लेकिन अपने हाथों से वो गुलाब को उसने गिरने नहीं दिया था। हमलोगों ने बहुत चाहा कि उसको कुछ ना हो, लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। प्रिया की आंखें जार जार वही जा रही थी उसको कुछ समझ नहीं आ रहा था कि हरीया काका को क्या जवाब दिया जाय प्रिया को इतने दिनो बाद ये एहसास हो रहा था कि शायद वो भी कहीं ना कहीं उसकी मौत का जिम्मेदार है। इतना कहते कहते हरीया अपनी गद्दी से उठा और गद्दी के नीचे से, जहाँ वो पैसा रखते थे एक पुरानी सी कापी जो तकरीबन १० सालों से उस गद्दी के नीचे पड़ा पड़ा लगभग रद्दी हो गया था। जिसके उपर लिखा था प्रिया। जो प्रिया आखरी दिन उसी जगह भूल गयी थी जहाँ बो बैठकर चाय पीया करती थी। जिसकी हर्फ पढ़ा नहीं जा रहा था। वो कापी हरीया ने प्रिया के हाथ में पकड़ा दी। बड़े हि बेबस मन से प्रिया ने उसको पकड़ा। उसकी आखरी हिचकी लेने से पहले जो गुलाब उसने हाॅस्पीटल तक नही छोड़ा था। उसने मुझे दी और धीरे से कहा ये प्रिया को दे दीजिएगा। अब मैं तुम्हें ढूंढने कहां जाता, ना अता ना पता। वो तब से मेरे पास ही रखा था। वो इसी कापी के बीच वाली पन्नों में रखा है, हरीया ने कहा। क्या? सिर्फ इतना ही बोल पायी थी प्रिया! जैसे ही प्रिया ने बीच का पन्ना खोला उसमें एक गुलाब का फूल जो बड़ी ही सिद्त से रखा था। जिसमें ना अब खुशबू थी ना ही रंग और ना रूप। था तो सिर्फ एक ढांचा जो गुलाब जैसा दिख रहा था।                      लेकिन इसके बावजूद जो रंग उस गुलाब ने बिकेरा था वो सदियों तक फीका नहीं होगा। उस सुखे हुए गुलाब मे जो महक प्रेम ने छोड़ा था वो शायद ही कभी मिटे। प्रिया ने कभी सोचा भी नहीं था कि वो कि उसकी जिन्दगी मे कभी ऐसा भी दिन आयेगा। और उम्र भर एक बोझ को डोती फिरेगी। उसकी आंखें नम थी और गला रूंध गया था। अचानक ट्रेन की सीटी बजी, अच्छा काका मै चलती हूँ। प्रिया ने हरीया के सामने दोनो हाथ जोड़े और रागनी का हाथ पकड़कर वापिस ट्रेन में आकर बैठ गयी। राजीव को एक नजर देखा तो वो अभी भी सो ही रहे थे। प्रिया हताश सा होकर अपने सीट पे बैठ गई, अपने सर को थोड़ा पीछे टिकाया और नज़रे खिड़की से बाहर चली गई। जैसे जैसे ट्रेन की रफ्तार बड़ा रही थी। प्रिया का मन किसी सोच पे आकर अटक गया। वक्त कितना बलवान होता है। इसके आगे इन्सान की एक नहीं चलती है। जब उस गुलाब में ताजगी थी, महक थी, तब तो प्रिया के पास नहीं अाया। लेकिन जब वो सूख गया था, उसका महक खत्म हो गया था। तब वो प्रिया के गोद में बैठकर उसके साथ जा रहा था। उस “सूखे गुलाब की महक” से प्रिया का मन महक रहा था। इधर रागनी के हाथो से आइसक्रिम पिघल कर गिर रहा था। जैसे हर लम्हा जिन्दगी की पिघलती रहती है।

मनोजकुमार मिश्रा
mishramanojkumar061@gmail.com

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