सुल्तान (समीक्षा) – पंकज कुमार पुरोहित

सुल्‍तान : अच्‍छी है देख लें, पैसे व्‍यर्थ नहीं जाएंगे।

”किसी भी विधा का एक शिखर को छू चुका व्‍यक्ति किसी ”कारण” से उस विधा से दूर हो जाता है, गुमनामी में चला जाता है। फिर कोई उसे खोजता है और उसे वापस लौटाता है।” कुल मिलाकर इतनी सी स्‍टोरी लाइन पर ढेरों फिल्‍में बनी हैं। हॉलीवुड में तो बीसियों फिल्‍में इस प्रकार की हैं। मगर बात वही है कि इस स्‍टोरी को ट्रीटमेंट किसी प्रकार से दिया जा रहा है कि वह नई-सी लगे। ‘सुल्‍तान’ में वह ट्रीटमेंट है और बहुत अच्‍छा है। फिल्‍म देखते समय बरसों पुरानी ऋषि दा की फिल्‍म ‘अभिमान’ भी याद आती है। अमिताभ-जया, सलमान-अनुष्‍का। पिछले साल सलमान ख़ान ने दीपावली पर ‘प्रेम रतन धन पायो’ दी थी, जिसे देख कर बहुत दिनों तक उसका सदमा रहा था। इस बार ईद पर डरते-डरते ‘सुलतान’ देखी। मगर फिल्‍म सचमुच ईद का तोहफा निकली। सबसे पहले बात की जाए अभिनय की, बहुत शानदार अभिनय सलमान ने किया है, लेकिन अनुष्‍का और रणदीप हुड्डा ने अभिनय में शानदार टक्‍क्‍र सलमान को दी है। अनुष्‍का ने अपने पात्र को जीवंत कर दिया है। छोटे से रोल में रणदीप हुड्डा भी जानदार अभिनय कर गए हैं। बात सलमान की तो सलमान ने फिल्‍म में अपने पात्र सुल्‍तान के चारों शेड्स को बखूबी निभाया है। चारों शेड्स में एक अलग सुल्‍तान दर्शकों को नज़र आता है। सलमान ने पहली बार किसी फिल्‍म में बहुत कूल अभिनय किया है। मंद-मंद। सलमान की उपस्थिति पर्दे को भर देती है। सिंगल स्‍क्रीन के दर्शक तालियां पीट-पीट के हाथ दुखा लेंगे यह तय है। क्‍योंकि मल्‍टीप्‍लेक्‍स में तालियां कई बार बजीं। इंटरवल के बाद का सुल्‍तान एकदम हॉलीवुड के अभिनेताओं को टक्‍कर देता हुआ लगता है। विन डीज़ल, श्‍वाजनेगर, सिल्‍वेस्‍टर आदि को। अनंत शर्मा और अमित साध भी अपनी भूमिकाओं में बहुत सधे हुए नज़र आते हैं। खेलों पर बनी फिल्‍में सफल नहीं होती हैं, यह आम धारणा है, लेकिन सुलतान उस धारणा को तोड़ने वाली है। कुश्‍ती इस पूरी फिल्‍म में एक अंर्तधारा की तरह बहती है। और उस पर हरियाणवी टच तो कमाल का है। खेल का इतना शानदार उपयोग किया गया है कि दर्शक सिनेमा हॉल से सीधे स्‍टेडियम में पहुंच जाता है। अंत में जो फ्री स्‍टाइल कुश्‍ती की फाइट्स दिखाई गईं हैं, वो फिल्‍म की जान हैं। बॉलीवुड में इतना भव्‍य पहली बार किया गया है शायद। हॉलीवुड फिल्‍म का-सा भ्रम पैदा करती है फिल्‍म। इंटरवल के बाद की फिल्‍म एकदम हॉलीवुड की फिल्‍म हो जाती है। वैसा ही प्रभाव और वैसा ही असर पैदा करती है। गाने जैसे एक मसाला फिल्‍म में होने चाहिए, वैसे ही हैं। लेकिन फिल्‍म की गति को अटकाते नहीं हैं। विशाल शेखर ने फिल्‍म के मूड और सलमान खान की फैन फालोविंग को ध्‍यान में रखकर गाने बनाए है। गाने क्लिक करेंगे यह तय है। टाइटल ट्रेक फिल्‍म को और गति प्रदान करता है। इरशाद कामिल ने मसाला फिल्‍म में भी अच्‍छे शब्‍दों और वाक्‍यों की गुंजाइश तलाश ली है। गाने अच्‍छे हैं और शूट भी बहुत खूबसूरती से किए गए हैं। फिल्‍म के संवाद भी चौंकाते हैं। कुछ संवाद तो बहुत अच्‍छे लिखे गए हैं। कहानी बहुत अच्‍छी है । जिन दो विधाओं की तारीफ की जानी चाहिए वो हैं फिल्‍म की एडिटिंग और बैकग्राउंड संगीत। दोनों ने फिल्‍म में जान डाल दी है। एडिटिंग इतनी कुशलता से की गई है कि इतनी लम्‍बी फिल्‍म भी बोझिल नहीं लगती है। दर्शक बंधा रहता है फिल्‍म से। फिल्‍म के पात्र एकदम हरियाणवी लगते हैं और इन पात्रों को बनाया भी हरियाणवी मिट्टी से ही गया है। सुलतान और आरफा मुस्लिम पात्र कहीं नहीं लगते, वो बस हरियाणवी ही लगते हैं। भारतीय और हरियाणवी। हां बस एक बात है, वह ये कि फिल्‍म अंग्रेजी माध्‍यम में पले-बढ़े ‘एलीट’ टाइप के युवाओं को शायद उतनी पसंद नहीं आए, लेकिन सलमान की फिल्‍में उनके लिए होती भी नहीं हैं। यह फिल्‍म तालियां बजवाती है, आंखें भिगो देती है, कहकहे लगवाती है, और यह सब करना ‘एलीट’ क्‍लास को पसंद नहीं है। उनके लिए यह ‘चीप’ होता है। और फिर एलीट क्‍लास की पसंद ‘सेक्‍स का तड़का’ तो इसमें सिरे से ही नहीं है। यह फिल्‍म ‘भारत’ के लिए है ‘इंडिया’ के लिए नहीं है। कुल मिलाकर यह, कि फिल्‍म देखी जा सकती है, पैसे वसूल हो जाएंगे। यदि मेरा अनुमान सही है तो यह फिल्‍म सलमान की सबसे सफल फिल्‍म होने जा रही है। वांटेड, दबंग, टाइगर जैसी बिना कहानी की फिल्‍मों की तुलना में इस फिल्‍म में कहानी है और अच्‍छी है। एक बार देख लें, अच्‍छी लगेगी। बुद्धि मत लगाइयेगा, बस देख लीजिएगा। (पंकज सुबीर 7-8-2016)

Pankaj Kumar Purohit (Pankaj Subeer)
Email: subeerin@gmail.com
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