संध्या रियाज़ की तीन कवितायें।

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अम्मा

अम्मा के जाने के बाद

उनकी पेटी से एक थैला मिला है

जिसमे मेरे बचपन का रेला मिला है

 

एक चरखी एक लट्टू एक गुडिया मैली सी

एक नाव आड़ी टेडी लहरों में फैली सी

एक किताब जिसमे पहली बार मैंने अम्मा लिखा था

लाल रुमाल में बाँधके अम्मा ने अबतक रखा था

हाँ तीन पेन्सिल उसमें मेरी टूटी हुई भी रखीं थी

डोर जिसमे अम्मा की साड़ी की बंधी थी

 

कुछ यादें जो बिना हाथ लगाये हाथ आती गयीं

अम्मा की दस अँगुलियों की गिनती का गिनना

चुपके से अम्मा का एक सिक्का ले लेना

अम्मा का तमाचा गाल पे पड़ते पड़ते रुक जाना

लाड से उनका दुनियां भर की बातों का  बतलाना

उनका मुझे खिलाना नहलाना सुलाना जगाना

सब याद आने लगा

लगा की काश कुछ हो जाए

जाने कहाँ चली गयीं हैं मेरी अम्मा

ढूंढ के वापिस ले आयें

 

उम्र से बचपन गया और बचपना भी

लेकिन अम्मा का नाम आते ही

रोने को जी करता है

और तब उस दिन मिला हुआ ये थैला

मुझे मेरी अम्मा सा सुख देता है

 

अकेले होते ही इसे छू लेती  हूँ

मैं उनकी जागीर थी  और अम्मा मेरा खजाना

जिनका मुझ पर और मेरा उन पर ताजिंदगी हक होगा 

ये थैला मेरी अम्मा ने मुझको दिया था 

सिर्फ मेरा ही होगा………….

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एक छोटा लड़का

सड़क पर बोरा लिए

काग़ज़ बटोरता हुआ एक लड़का

अपने बचपन को छिपाने की चेष्ठा करता

अपने मन को मारे आँखों को ज़मीन टिकाता

इधर उधर ज़मीन पर नज़र दौडाता

चला जा रहा था।

 

सड़क पर सामने से आते हुए

उसके जैसे हमउम्र बच्चे

बचपन से भरे हंसते खिलखिलाते

साफ़ सुथरे उनके कपडे

और कपड़ों की जैसे  उनके साफ़ खिले चेहरे

झुण्ड में  स्कूल के लिए निकल रहे थे

 

लड़का उन्हें देख सकुचाता है

खुद को बोर के पीछे छिपाता है

और पसीने से भीगा चेहरा पोछ

आगे बढ़ जाता है

 

आगे खूबसूरत बाग़  रंग बिरंगे फूल

खिलौनों की दुकाने और दुकानों पर

अपना खिलौना चुनते बच्चे

माँ बाबा से अपना खिलौना लेने का हट कर रहे थे

 

लेकिन इस लड़के को कुछ भी नहीं दिख रहा था

या

वो देखना नहीं चाहता था

सिवाए कागज़ के टुकड़ों के

उसने कभी कोशिश भी नहीं की

कुछ भी देखने की

शायद मालूम होगा

 

चाहना और पाना दो अलग अलग बातें  हैं

अपनी उम्र से भी बड़ा बना दिया था उसे

इन् रास्तों और बिखरे हुए कागजों ने

वो जानने लगा था शायद

उसकी चाह सडकों और कागजों तक ही सीमित है

ये चलते भिरते सपने और सपनों जैसे रंग भरे

बच्चे बनना उसकी कल्पना से भी  परे  था

 

शाम होने से पहले इस बोर को कागज़ से भरता  है

बिकने पर २० रुपये कमाता है

उससे दो रोटी और एक चाय खरीद

भूखे  पेट को भर के सो जाता है

सुबह होते ही अपना बोरा लेके

फिर सड़कों पर जाता है

एक नयी आस के साथ

काश आज उसका बोरा जल्दी भर जाए

और आज रोटी खा के वो जल्दी सो जाए

 

देखेगा सपने उन सपने जैसे साफ़ साफ़ बच्चों के

जहाँ वो उनमे से एक होगा हाथ में बोरा नहीं बस्ता होगा

और बसते में माँ का दिया खाने एक डब्बा होगा

जिसमें पेटभर खाने को खाना होगा……

 

तभी एक डंडा उसकी पीठ पे पड़ता है

हबलदार उसे जगा के फुटपाथ से भगाता है

कब तक सोयेगा हीरों काम पे नहीं जाना हैं।

 

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वक़्त के मानिन्द

गुज़रते वक़्त के मानिन्द 

कतरा कतरा पिघलती ज़िन्दगी के साथ 

कुछ ख्वाहिशों को पाने की खातिर 

कुछ ग़मों को भूलने की कोशिश के साथ 

किसी अपने के हाथों को थाम 

भीड़ में कभी अकेले गुम्म हो कर भी 

अकेले अकेले चलकर सालों बिता दिए अब तक 

किस किस से किस किस की बात कहे हम

तनहा ही होते है अपने हुजूम में भी हम 
कई रातों में बहे आंसुओं ने देखा है हमें 

कई राहों ने भटकते आते जाते देखा है हमें 

दिन रात पहर दो पहर पल दो पल सब जानते है 

ज़िन्दगी आसान न थी जो जी चुके है हम 

ज़िन्दगी आसन होगी या नहीं कौन बता पायेगा 

लोग हाथों की लकीरों के नक़्शे दिखाकर रास्ता पूछते है 

कौन अपने रास्तों को लकीरों में बदलने का हुनर देगा हमें 
नज़र बदलने लगी पैर भी डगमगाने लगे 

न जाने ये रास्ते कब खतम होगे

 

जो मंजिल पे पुन्ह्चा पायेंगे हमें 

खामखाँ भागते भागते सारी जद्दोजहद के बाद भी 

हाथ खाली है छोली खाली है 

अपने भी अपने कहाँ हो पाते है 

उनकी अपनी ज़िन्दगी की बेचारगी है 
एक छोर पे  पुहुँच  चुके है अब आगे जाने का दिल नहीं 

साँसे भी दिल से खफा हो चली हैं 

लगता है कोई आया है लेने 

दर्द सारे छू होने लगे सासें परायी होने लगी 

ये सुकून कहाँ था अब तक जिसके लिए 

उम्रभर ज़िन्दगी को हम रुलाते  रहे 

अब ठीक है दुःख नहीं दर्द नहीं मंजिल नहीं राहें नहीं 

आँखे बंद होते ही सारे बवालों से बच गए 

सांस रुकते ही अनजानी थकन से बच गए 
मौत क्या इसे कहते है तो यही बेहतर है 

न हम हैं न हमारे है न दुनियाँ की झंझट है 

एक रौशनी की मानिन्द एक वक़्त की मानिन्द 

हम गुज़रते गए और शायद कुछ लम्हे ही थे वो 

जो हमें साथ ले गए और कितने जाहिल थे हम  

उम्र भर जो न साथ जाना था उसके लिए लड़ते रहे 

खैर अब सुकून हैं संन्नता है कुछ ठण्ड है रवां रवां 

कहाँ है कहाँ जाना है इसका कोई गम नहीं 

ज़िन्दगी नहीं तो हम नहीं।

 

 

  • संध्या रियाज़
Sandhya Riaz
संध्या रियाज़ कवयित्री और कहानीकार हैं। टीवी, रेडियो,पत्रिकाओं, अख़बारों इत्यादि के लिए कहानियां, कवितायें और समीक्षायें लिखती रहीं हैं।आपका पहला कविता संग्रह ‘बदलती लकीरें’ नाम से प्रकाशित हुआ।वर्तमान में, मीडिया कंपनी क्रिएटिव आई में आइडिएशन हैड के पद पर कार्यरत हैं। संपर्क -sandhya.riaz@gmail.com
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