मेरी माँ (कविता) – जय शंकर झा

मेरी माँ 

मुश्कान तेरी मुझको दुनिया से प्यारी माँ

आँचल में तेरे है सबकुछ ओ मेरी माँ

ये है मजबूरी मेरी कि  कुछ कर नहीं पाता

चुपचाप तेरी गोदी में यूं ही सो जाता

मेरी माँ, ओ मेरी माँ ,प्यारी माँ,न्यारी माँ। …।

अरमां है इतना सा तुझको हर ख़ुशी दे दू

मगर अपनी बेबसी कैसे मैं  बयां करू

दम घुटता रहता है पर चलता रहता हूँ

इन्ही  सपनो के संग बस  मैं  जीते जाता हूँ

मेरी माँ , ओ मेरी माँ, मेरी  माँ.

तेरी ऊँगली थामकर मैंने  चलना सीखा हैं

तेरे कदमो के तले तो मेरी जीवन-रेखा है

रोने नहीं दूँगा कभी तू ही तो सबकुछ माँ

जीवन  है ये अब क्या तेरी अमानत माँ

मेरी माँ, ओ मेरी माँ ,प्यारी माँ,न्यारी माँ। …।

आँचल में तेरे है सबकुछ ओ मेरी माँ

ये है मजबूरी मेरी की कुछ कर नहीं पाता

चुपचाप तेरी गोदी में यूं ही सो जाता

मेरी माँ ओ मेरी माँ  प्यारी माँ न्यारी माँ। …।

  • जय शंकर झा
    jasjhadbg@gmail.com
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