मेरी चंद और ग़ज़ले २ – धवल

(5)

हो सके तो आज एक गुस्ताखी कर दो
सब को मुंह पे तुम सच सच कह दो

क्यूँ अंदर ही अंदर अलाव जलाये रखे
अपने घर को छोड़के पूरा शहर जला दो

बहरी ख्वाइशो को कुछ करतब देखने है
अधूरे अरमानो की गूंगी चीख सुना दो

तल्खियाँ बढ़ी इतनी के मैं ज़हर हो गया
ढूँढो कोई मीरा उसे ये ज़हर पीला दो

(6)

दुनिया को देखकर पछता रहे है
देखो मुसाफिर घर को लौट रहे है

जिन्होंने मिलकर इंट से इंट लगाई थी
वही लोग आज घर को जला रहे है

तूफानों से लड़कर भी मैं खामोश हूँ
कुछ लोग साहिलों पे चिल्ला रहे है

ये अदाकारी हम से ना हो पाएगी
जीनको रोना है वो मुस्कुरा रहे है

यहाँ हर ज़ानिब तन्हाई का दश्त है
लोग अपने ही सायो से गभरा रहे है


(7)

बस हमसे वो भुलाना रह गया
आँखों में एक ज़माना रह गया

बहुत दूर मिलो तक चला हूँ
उनके दिल में जाना रह गया

मैंने सारी रवायते फूंक दी है
कडवा सच जलाना रह गया

किसी से कोई उम्मीद नहीं है
मेरे सामने आईना रह गया

क्यूँ न चीखे हो मेरे शेर में
एक आंसू जो बहाना रह गया

(8)

ये काम भी तमाम हो जाए तो अच्छा है
आज जिंदगी भी ख़त्म हो जाए तो अच्छा है

तेरे राज़दार से कोई गिला नहीं है मुझको
आज सारे राज़ सरेआम हो जाए तो अच्छा है

दोस्ती और दुश्मनी बड़े अदब से निभाई है
सारे रिश्तो से आज़ाद हो जाए तो अच्छा है

एहसान को गिनाना मेरी फितरत में नहीं है
तू अपनी एहसान फरामोशी समजे तो अच्छा है

कमज़ोर हो गई है उजड़े हुए घर की दिवारे
आनेवाले सैलाब में ये मिट जाए तो अच्छा है

गर जिंदगी शतरंज है तो मैं भी चाल चलूँगा
मुझे बच्चा समजने वाले, समज जाए तो अच्छा है

(9)

हँसते हुए ही हम अच्छे है
उदासियाँ लेकर क्यूँ बैठे

ज़माने की फिक्र किसको है
शिकायते लेकर क्यूँ बैठे

जो होना था सो हो गया
पछतावा लेकर क्यूँ बैठे

ये रात बड़ी लम्बी होगी
दो जाम और लेकर बैठे

फिर रंग चढ़ेगा हर ज़ख्म
ज़रा हौसला लेकर बैठे

तजुर्बे ज़ख्मो से मिलते है
तो किताबे लेकर क्यूँ बैठे

जिंदगी एक जश्न होती है
मायूस गीत लेकर क्यूँ बैठे

जाने से पहले एक आरज़ू है
दो पल तेरे पहलू में बैठे

(10)

जीने के माईने ढूंढे ग़ज़ल में
हर दर्द की दवा ढूंढी ग़ज़ल में

जो तन्हा अंधेरो में खोये थे
मैंने वो आंसू ढूंढे ग़ज़ल में

दुनिया दुश्मनो से भरी पड़ी है
मैंने कुछ दोस्त ढूंढे ग़ज़ल में

चाँद के पार अब जो रहते है
बिछड़े हुए लोग ढूंढे ग़ज़ल में

मंदिर मस्जिद जाके थक गया
मैंने खुदा को ढूंढा ग़ज़ल में

दिल कुछ इस तरह टुटा था
मैंने रोज़गार ढूंढे ग़ज़ल में

सिर्फ किताबी बाते नहीं करता
खुद के तजुर्बे ढूंढे ग़ज़ल में

(11)

वो मेरे ज़ख्म को कुरेदता रहा मौका देखकर
मैं भी मुस्कुराता रहा उसकी नियत देखकर

चोट कुछ ऐसी लगी है, ये ता-उम्र रहेगी
मेरे अपने ही हँसते रहे मुझे बर्बाद देखकर

बड़ी दीवारों के पीछे कुछ गमख्वार रहते है
ख़ुशी का अंदाजा मत लगाओ महल देखकर

पहले दिल में एक बच्चे सी मासूमियत थी
अब दिल भी मायूस हो गया दुनिया देखकर

ठोकरों से बचो मत, एक बार गिर के देखो
राहें भी सलाम करेगी तुम्हारा हौसला देखकर

(12)

मुझसे मत पूछ मैंने क्या क्या मंज़र देखे है
मेरी ही पीठ के पीछे अपनों के खंजर देखे है

तिश्नगी-ए-मंज़िल से खानाबदोश हो गया हूँ
प्यास बुझानी चाही तो सुखते समंदर देखे है (तिश्नगी – प्यास)

बेवजह है तेरी ताजो तख़्त की तमन्ना भी
यहाँ सब ने खाली हाथ मरते सिकंदर देखे है

बड़ा मुश्किल है किसी की नियत पहचानना
कुछ लोगो को जलते हुए अंदर ही अंदर देखे है

(13)

जब दिल के आंसू पलकों पर आ जाते है
पल में बीते मौसम लौट के आ जाते है

अपने ज़ज्बातो को मैं कैसे कर संभालू ?
जब चीख रोकता हूँ तो आंसू आ जाते है

एक बात समजा हूँ मैं अपनी जिंदगी से
हर तजुर्बे जिंदगी में काम आ जाते है

एक पल भी रुकने की मोहलत नहीं है
जब भी रुकना चाहो तो मोड़ आ जाते है

(14)

तुम्हारी बातो में तुम्हारा सच है
एक बार मुझे मेरा सच ढूंढने दो

मशालो की कोई ज़रुरत नहीं है
एक चिंगारी से दश्त को जलने दो

जब तक़दीर तुम पर मेहरबान हो
तब औरो को सिफारिश से बढ़ने दो

अब दिल में कोई तल्खियाँ नहीं है
अब दिल को चैन से धडकने दो

शायर और लेखक

शायर और लेखक

 

 

 

 

 

 

 

 

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