मेरा गॉंव मेरा घर – जय शंकर झा

निरंतरता की पराकाष्ठा हो या कुछ पाने की उत्कंठा  पर इंसान है असहाय ही।भूत बदल नहीं सकता,वर्तमान में जीना पड़ेगा और भविष्य के आगे.……???

मेरा गॉंव मेरा घर, ४ शब्द सुनते ही भावनाओं का सागर उमड़ उठता है जिसकी हर लहर हमारे कोमल ह्रदय में नरम नाजुक उन्माद भरती हैं,

धुल में लिपटा लपेटा बचपन, माँ का आँचल ,बापू का प्यार, दादी का निच्छल आगोश,दादा का गैरवमयी कन्धा,काका काकी और न जाने कितने अपनों परायों  का प्यार। इन सबसे अलग खेतो की हरियाली, हवा की खुशबू, मिट्टी  का खिलौना, फूलो का श्रृंगार, कितना सजीव था ये सब! दोस्तों के संग तितलियों जैसे झुण्ड बनाकर चलना या यूँ कहे उड़ना शायद भूल ही चुके हम.

आज के परिवेश में बस कसक बनकर रह गयी वो तमाम यादें , वक़्त के साथ चलते चलते हम भी बहुत  आगे निकल चुके।

हम शायद आज भी अगर फुर्सत के क्षणों में बैठे तो वो रातें ,वो लोरी,कड़ी धुप और पीपल का पेड़,पसीने से लथपथ होकर भी पहरों  अमरुद तोडना, होली का रंग जिसे हमने कभी खुद अपने चेहरे पर लगाया था और ना जाने कई बातें निश्चय ही हमें झकझोर ही देगी पर क्या करे फुर्सत में बैठने  का फुर्सत भी किसके पास है और करे भी तो  क्या करे विकसित होने का कुछ तो कर्ज चुकाना पड़ेगा पर जरा सोचियेगा कहीं हम ज्यादा तो नहीं चुका  रहे हैं.कृत्रिम हवा के ओट में ज़िंदगी के कई रूप कृत्रिम हो गए है।

अब  गॉँव का वो भोलापन,वो सादगी ,स्वछता ,शांति और एक दुसरो को  सहयोग करने की प्रवृर्ति भी नदारद ही मिले. गॉँव के ज़िंदगी पे शहर का जीवनशैली इस कदर हावी होते जा रहा है कि लोग नए नए रंगो में रोज़ ही डूब रहे है. लोगो के बीच वैमनस्यता तो एक रोग की तरह दिनों दिनों बढ़ते  ही जा रही हैं फिर चाहे ये राजनीतिकरण हो या कुछ और.

पर  जो भी हो  इस भागती ज़िंदगी में भी हर दिल के पास हर पल हमेशा होता है ” मेरा गॉंव मेरा घर” और उससे जुडी तमाम यादें जो निश्चय ही हमरे मन को अह्लादित करती है . मगर अपने इस प्यारे गॉंव और उसके सच्चे घर की वास्तविकता को हमें बचाये रखना होगा।

जय शंकर झा
jasjhadbg@gmail.com

लेखक, कवि और गीतकार

लेखक, कवि और गीतकार

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