मुद्दा व्यंग्य का (लेख) – धवल चोखाडिया

मुद्दा व्यंग्य का

लेखक – धवल चोखाडिया

“व्यंग्य किसे कहते है?”, ये सवाल आप किसी आम आदमी से पूछिये जो लेखक नहीं है | सामान्य रूप से यही जवाब मिलेगा “गहरी बात को हास्यभाव में कहना” | अगर ये सवाल आप किसी लेखक से पूछेंगे तो एक लेखक अपने तरीके से जवाब देगा, “मज़ाकिया अंदाज़ में किसी व्यक्ति, व्यवस्था या सरकार को तीखे शब्दों में सच का आईना दिखाना” | हिंदी सिनेमा में बहुत अच्छी व्यंग्य फिल्मे बनी है | राजनीति पे आधारित व्यंग्य फिल्मे अपने देश में ज्यादा चर्चा में रहती है | लेकिन बदलते वक्त के साथ धर्म पे आधारित और समाज पे आधारित व्यंग्य फिल्मे हमें देखने को मिल रही है | व्यंग्य बहु आयामी है | व्यंग्य में सौ प्रतिशत (100%) मनोरंजन है | किसी भी गंभीर मुद्दे को एक लेखक ऑडियंस के समक्ष हलके फुल्के अंदाज़ में रख सकता है |

राजनीति में व्यंग्य खोजने के मोके बहुत मिलते है, इसीलिए ज़्यादातर लोग व्यंग्य को सिर्फ राजनीति तक सीमित समझते है | राजनीति को एक अलग पहलू से समजने की कोशिष करते है | लेनिन ने कहा था, “जहां लोग है, वही से राजनीति की शुरुआत होती है”” | इस एक छोटे से वाक्य में बहुत गहरे अर्थ छुपे है | आप चाहे वोट दे या ना दे, राजनीति से और नेताओ से आपको चाहे कितनी भी घृणा हो लेकिन हमारी जिंदगी राजनीति से सौ प्रतिशत (100%) प्रभावित होती है | हम आम जिंदगी में भी जाने अनजाने थोड़ी बहुत राजनीति तो करते ही है | किसी भी इंसान के आर्थिक, पारिवारिक और सामाजिक हालात उसको राजनीति के बारे में सोचने को विवश करते है | एक उम्र तक इंसान सोचता है की उसके घर ने उसे क्या दिया, फिर वो सोचता है की उसके समाज ने उसे क्या दिया और आखिर में ये सोचता है उसके देश ने उसे क्या दिया | जब देश की बात आती है तब इंसान राजनीति को अपने नज़रिये से सोचने और समजने की कोशिश करता है | राजनीति और इंसान की जिंदगी एक ही सिक्के की दो बाजू है |

“देख तमाशा देख” एक बेहतरीन पोलिटिकल सटायर फिल्म है | फ़िल्म की शुरुआत कोंस्टेबल नाइक की पूछताछ से होती है | नाइक पर ये इलज़ाम लगा है की नाइक के होते हुए पुलिस डिपार्टमेंट की एलिज़ाबेथ (कुतिया) को एक सड़क छाप कालिया (कुत्ता) ने प्रेगनंट कर दिया | एलिज़ाबेथ को सँभालने की ज़िम्मेदारी नाइक की थी | इस सिन के दौरान सिर्फ एलिज़ाबेथ और कालिया नाम लेकर ही कोंस्टेबल नाइक बात करता है | सीन के अंत में ये पता चलता है की कुत्ते और कुतिया की बात हो रही थी | एलिज़ाबेथ और कालिया का नाम लेकर सीन में व्यंग्य का उपयोग किया गया है |

एरिस्टोटल का कहना है, “इंसान का मुख्य स्वभाव समाज में रहना है, दूसरा मतलब ये है की इंसान झुंड में, समूह में रहना पसंद करता है, इसी लिए मनुष्य संस्कृति में समाज की रचना हुई, अगर इंसान समाज में नहीं रहता तो उसके जीवन में अकेलापन होता है और उसकी आयु कम होती है” | ऐसा नहीं है की व्यंग्य सिर्फ राजनीति पे ही हो सकता है | “आँखों देखी” फिल्म का ज़िक्र करू तो इस फिल्म में एक इंसान के आत्मखोज की बहुत सुंदर बात है | बाउजी (संजय मिश्रा) की जिंदगी में कुछ ऐसे हालात पैदा होते है जिसके बाद बाउजी तय करते है जो आँखों से देखेंगे और कानो से सुनेंगे उसी बात पर यकीन करेंगे | मेरे हिसाब से आप “आँखों देखी” को कमोवेश सोशियल सटायर कह सकते हो | फिल्म के कई सीन में बहुत अच्छे संवाद है जो व्यंग्य का रूप देते है | एक सीन में बाउजी बोलते है “ऐसी जगह मुझे काम ही नहीं करना जहां बार बार मुझे झूठ बोलना पड़े” | एक और सीन में जब पंडित बाउजी को प्रसाद देते है तब बाउजी कहते है, “ये प्रसाद नहीं, मिठाई है, अच्छी है”, | ये सुनकर पंडित भड़क उठता है | हम बाज़ार से मिठाई लाते है और भगवान की पूजा करने के बाद उसे प्रसाद कहते है और इस में कुछ भी गलत नहीं | पर जो इंसान तर्क करना चाहता है उसे आप रोक नहीं सकते | तर्क से भी व्यंग्य पैदा होता है |

कार्ल मार्क्स ने कहा था, “धर्म एक अफीम (opium) की तरह है” | एक बार अफीम की आदत पड़ जाए फिर इंसान उसके बिना नहीं रह सकता | अपने देश में धर्म को आम जनता ने नहीं पर धर्म के ठेकेदारों ने ही अपने निजी स्वार्थ के लिए ज्यादा बदनाम किया है | धर्म की पवित्रता में धर्म के ठेकेदारों ने उसी अफीम का नशा मिला दिया है | इंसान के कर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं है | “ओह माय गॉड”, “धरम संकट में” और ऐसी कई धर्म आधारित व्यंग्य फिल्मे है | धर्म पे व्यंग्य करना बड़ी ज़िम्मेदारी का काम है |

मेरा मानना है की अगर एक लेखक राजनीति को, धर्म को, इंसान के सामाजिक हालात को या इंसान की निजी जिंदगी को केंद्र में रख के व्यंग्य का सहारा लेकर कोई कहानी लिखेगा तो वो ज्यादा असरदार साबित होगी | ये सब चीज़े एकदूसरे से जुडी हुई है | बस एक लेखक को ये तय करना किस मुद्दे को ज्यादा बल देना (emphasize) है |

और अंत में, हिंदी साहित्य में हरिशंकर परसाई के बिना व्यंग्य अधूरा है | जो लेखक व्यंग्य कहानी लिखना चाहता है तो उसे पहले हरिशंकर परसाई को ज़रूर पढना चाहिए | इसके अलावा शरद जोशी और उनके जैसे कई अच्छे लेखको ने अपनी कहानी के ज़रिये व्यंग्य को नया आयाम दिया है | ऐसी बहुत सी अच्छी व्यंग्य फिल्मे है और अच्छे व्यंग्य लेखक है जिनका मैंने ज़िक्र नहीं किया, उनके प्रति मैं अपना सम्मान प्रकट करता हूँ |

—   धवल चोखाडिया

dhaval.chokhadia@gmail.com

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