मीटती हुई आरज़ू – Stanish Gill

मीटती हुई आरज़ू ,जलता हुआ आशिया,

यह है मेरी ज़िन्दगी यह है मेरी दास्ता.

मंजीलें और बदती गयी, मैंने जब भी बड़ाए कदम,

साँसों मे हलचल मची, अब घुट रहा है दम ,

जीवन के इस मोड़ पे, दिकता नहीं रास्ता,

यह है मेरी ज़िन्दगी यह है मेरी दास्ता.

जीवन का जो आइना देखा था हमने कभी,

बन के रहा ख्वाब वोह की सबने बेरुखी,

तनहा से हम रह गए कैसा है यह हादसा,

यह है मेरी ज़िन्दगी यह है मेरी दास्ता.

कल तक थे जो अपने आज वोह अजनबी हो गए,

नज़रे  है फेरे हुए किसी और के हो गए,

रखते नहीं वोह अब हम से कोई वास्ता,

यह है मेरी ज़िन्दगी यह है मेरी दास्ता.


By,

Stanish Gill.

9702019206 / 9987413282.

writer.stanish@gmail.com

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