‘मांझी- द माउंटेन मैन’ – रुपेश कश्यप की समीक्षा

”मांझी- द माउंटेन मैन’ एक सक्सेसफुल ‘स्टार्ट-अप’ है. क्यों कि वो सिर्फ़ अपने निजी फ़ायदे नहीं देखता.

मैं सोचता हूँ कि अगर दशरथ मांझी छोटी जाति से नहीं होते तो क्या होता? क्या उन्हें 22 साल लगते पहाड़ तोड़ने में? क्या उन्हें और ज़्यादा समय लगता या कम लगता, मुझे इतना तो नहीं पता पर इतना पता है कि लड़ाई कितनी लेयर्स में होती है जब रूप, रंग, बोली, नस्ल, जाती, धर्म, क्लास के आधार पर आपको और आपकी योग्यता को जज किया जाए. ऐसे में ख़ुद को बनाये रखना आसान नहीं होता. मुझे दुःख होता है कि आज भी हम कुछ ज़्यादा नहीं बदले हैं. मैं समझता हूँ दशरथ मांझी एक चमचमाती, आँखें खोलने वाली, खनकदार और ईमानदार सोच है जिसकी हत्या उन स्मार्ट लोगों द्वारा होती है जो सत्ता में या सत्ता के नशे में या सत्ता के इर्द-गिर्द  होते हैं. वो ये सोचते हैं उनका शातिरपना, छले गए को समझ में नहीं आता. इतिहास गवाह है कि उन स्मार्ट लोगों को इतिहास कैसे याद रखता है.

क्यों ऐसा है की आज भी गेहलौर का रास्ता विकास के सही रास्ते पर जाते नहीं दिखता? गेहलौर एक सवाल है जो संसद में ही नहीं हमारे जेहन में भी दबा दिया गया है. सच तो ये है कि ‘दशरथ मांझी’ उसी सवाल को फिर से उठाने की ज़िद  है और ये ज़िद अच्छी लगती। गेहलौर एक प्रतीक है ऐसे कई गाँवों और शहरों का जहाँ रूप, रंग, बोली, नस्ल, जाती, धर्म, क्लास के पहाड़ को तोड़ा जाना बाकी है.

अब फ़िल्म पर आते हैं, ‘मांझी – द माउंटेन मैन’ एक प्रेम कहानी से ज़्यादा एक प्रेमी की कहानी है जो अपनी प्रेमिका के बिना अधूरा है मगर अपनी धुन का पूरा है. यह किवदंतिओं पर आधारित एक सिनेमाई किवदंती है और ज़्यादा दर्शकों तक पहुँचती है. और यही इसकी सफलता भी है. अगर आप प्यूरिस्ट हैं और फ़िल्म के प्रमाणिक रहन-सहन, बोली और परिवेश के चित्रण पर ज़्यादा ध्यान देंगे तो आपको थोड़ी निराशा हो सकती है. इसलिए मैं अपनी बात फ़िल्म के मुख्य चरित्रों और उनकी विशिष्टताओं पर फोकस रखूँगा.

‘मांझी – द माउंटेन मैन’, एक क्लासिक हीरो की कहानी है जिसमें एक साधारण आदमी एकदम असाधारण बन जाता है… क्योंकि इसमें मांझी को तोड़ने के लिए कई भयानक स्थितियां हैं मगर मांझी नहीं टूटता, बस तोड़ देता है.…अपने बाहर और भीतर का भी पहाड़…इसलिए वो हमारा हीरो हो जाता है. नवाज़ुद्दीन हिन्दी फिल्मों के पारम्परिक हीरो इमेज के पहाड़ को तोड़ते हुए यहाँ तक पहुंचे हैं इसलिए वो भी हमारे हीरो हैं. शायद इसलिए वो मांझी को सहज जीते हैं और प्रमाणिक लगते हैं. हर सीन में नवाज़ आपको सिर्फ़ चकित नहीं करते बल्कि इतने सहज, सरल और संवेदनशील लगते हैं कि आप भूल जाते हैं कि आप सिनेमा देख रहे हैं. एक उदाहरण देखिये, जब मांझी पत्थर तोड़ते-तोड़ते एक आवाज़ सुनते हैं तो उनको अपने पेट की भूख याद आती है और वो उस तरफ बढ़ते हैं जिस तरफ से आवाज़ आ रही है, उसे चूहा समझ वो उधर लपकते हैं तभी वहां से सांप निकलता है जो उन्हें उनके पैर के अंगूठे पर डंस लेता है, ज़हर पूरे शरीर में न फैले, पीड़ा से बिलबिलाया हुआ ‘मांझी’ अपने पैर के अंगूठे को उसी छेनी-हथौड़ी से अलग कर देता है जिससे वो पत्थरों को तोड़ता है. ये साहस प्रेम से नहीं आया है बल्कि प्रेम से उपजे लक्ष्य को हासिल करने का है. कॉर्पोरेट लैंग्वेज में कहें तो ‘बिग पिक्चर’ के लिए छोटे-मोटे सैक्रिफाइस ज़रूरी हैं.

फगुनिया का किरदार एक ज़ोरदार किरदार है जिसे राधिका आप्टे बड़ी सहजता से अपना बना लेती हैं. फगुनिया अपनी अस्मिता को बचाये रखने के लिए सिर्फ़ अपने पति पर आश्रित नहीं है और उसकी ये सोच उसे आज के धारावाहिकों में दिखने वाली बहुओं से कहीं ज़्यादा मज़बूत और प्रोग्रेसिव बनाती है. वो ‘बाहुबली’ की नायिका से आगे निकलती हुई, ‘क्वीन’ की नायिका के बराबर खड़ी दिखती है. राधिका आप्टे के व्यक्तिव में मुझे स्मिता पाटिल का अक्स नज़र आता है.

मुझे ‘मांझी’ में एक ‘स्टार्टअप’ स्पिरिट दिखती है और मुझे महसूस होता है कि एक प्रॉब्लम सॉल्वर जब तक उस प्रॉब्लम को महसूस नहीं करता तब तक वो उसका ऐसा हल भी नहीं ढूंढ पाता जो निजी हितों से ऊपर हो. ‘मांझी’ निजी समस्या से पैदा हुआ एक ऐसा हल है जो समाज के हित में है. इसलिए हमसे आसानी से जुड़ जाता है. तभी तो ‘मांझी’ एक सक्सेसफुल ‘स्टार्ट-अप’ है क्यों कि वो सिर्फ़ अपने निजी फ़ायदे नहीं देखता. आज के ब्रैंड्स भी यही गुर अपना रहे हैं ताकि वो अपने ऑडियंस से रिलेवेंट बने रहें.

दरअसल, असली हीरोज पर बनी फिल्में भले ही क्राफ़्ट के मामले में बेहद परफेक्ट न हों, फिर भी अच्छी लगती हैं क्योंकि किरदार में दम होता है. प्रियंका चोपड़ा अभिनीत ‘मैरी कोम’ भी ऐसी ही श्रेणी की फिल्म थी.

ऐसी पावरफुल चरित्र को हम तक लाने के लिए केतन मेहता को बधाई, जो हमें एक इंसान के तौर पर बेहतर होना सिखाती है और ताक़तवर भी बनाती है. इंटरनेट पर लीक होने के बावज़ूद भी ‘मांझी – द माउंटेन मैन’ चौथे सप्ताह में भी सिनेमा घरों में मौजूद है और इससे साबित होता है कि किरदार और कहानी में बल है. इसलिए आप से कहना चाहता हूँ कि आपको ‘मांझी’ इसलिए देखनी चाहिए कि आप अपने बाहर और अंदर के पहाड़ को तोड़ सकें.

रुपेश कश्यप

Script-Writer/Lyricist/Adman

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+91 9769424806

 

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