माँझी दी माउंटेन मैन – द्वारा अवनीश कुमार

माँझी दी माउंटेन मन  –
एक दर्शक की नजर से ( अवनीश कुमार)

मुसहर हमारे यूपी और बिहार की अति पिछड़ी और महादलित समुदाय के सदस्य हैं। जो पिछड़े और दलित समुदाय खुद के साथ भेदभाव पर हजार आँसू बहाते हैं, उनका भी रवैया मुसहरों के साथ बिलकुल सवर्णों वाला है। इससे ही अंदाजा लगा लीजिये कि ये वर्ग कितना पददलित हुआ होगा। आज भी लोगों के अंदर मैंने इस समुदाय के प्रति एक वितृष्णा देखी है, इससे इतना सोचा जा सकता है कि सौ दो सौ साल पहले तो इनको इंसान मानने से भी लोग इनकार करते रहे होंगे। मुसहर समुदाय की गरीबी का अंदाज आप इस बात स लगा लीजिये कि मुसहर शब्द मूस और आहार का मेल है। मूस यानि चूहा जिनका भोजन है। ये लोग फसल कट जाने पर जो फसल के बचे खुचे दाने खेत में रह जाते हैं उनको बीनते हैं, चूहों और अन्य जानवरो का शिकार करते हैं। मूस या चूहा पर इतना चौंकिये मत, ये किसने बताया है कि चिकन और मटन ही माँस के सर्वोत्तम प्रकार हैं। भाई जिसको जो सुलभ था वो उसने खाया। जो यायावर है वो मुर्गी बकरी नहीं पाल सकता और खरीदने को उसके पास पैसे नहीं हैं तो वो उन जानवरों के शिकार करेगा जो सुलभ हैं। अब जिनको मानव मानने में ही हम इतना अनुदार थे, उनका हास्य बोध, प्रेम और जूनून जैसी उदात्त भावनाओं को समझना तो तथाकथित सभ्य समाज के बस की बात नहीं। ऐसे में केतन मेहता, नवाजुद्दीन सिद्दीकी और राधिका आप्टे का प्रयास माँझी बहुत ही सराहनीय है। दशरथ माँझी का प्यार, उनकी तड़प, उनका विद्रोह ये सब नवाज ने पर्दे पर जिस तरह जिया है, उसकी प्रशंसा जितनी की जाये कम है। माँझी की फगुनिया उनका प्रेम थीं, उनके दर्द की दवा थीं। जब ऊँची जाति वालों और जमीदारों के शोषण से थक हार कर माँझी घर वापस आते थे, तो फगुनिया उनके घावों पर मरहम रखती थीं। इस तिरस्कार भरी रेगिस्तानी दुनिया में फगुनिया उनका नखलिस्तान थीं। फगुनिया की मृत्यु उनके अंदर के प्रेम को ललकारती है, कल को कोई दूसरा प्रेमी ऐसे बेसहारा न हो, इसका बंदोबस्त करने को कहती है। अब माँझी एक प्रेमी ही नहीं रहे, वो जुनूनी बन गये। प्रेम में कितना बल है इसकी थाह आज तक कोई नहीं पा सका है लेकिन माँझी ने एक पैमाना जरूर तय कर दिया। कल को हम कह सकते हैं कि प्रेम में इतना बल तो है कि पहाड़ का सीना चीरा जा सके। दशरथ माँझी के इस टूटे पहाड़ के आगे दुनिया भर के सारे प्रेम स्मारक फीके हैं क्योंकि वो सम्पन्नो द्वारा बनाये गये, ये विपन्न द्वारा बनाया गया। उनके बनाने में हजारों लोग लगे, इसे अकेले माँझी ने बनाया। उन्हें बनाने वालों को प्रोत्साहन मिला और प्रशंसा मिली, इसे बनाने वाले को तिरस्कार और उपेक्षा मिली। कहने सुनने में ये दो चार वाक्य हैं पर इनका मतलब बहुत विशाल है। आप सोचिये 22 साल का मतलब क्या होता है? वो बाईस साल जिनके बदले में आपको कुछ न मिलने वाला हो। क्या आप अपने प्रेम के लिये सब कुछ छोड़ छाड़कर 22 दिन भी रह सकते हैं? माँझी सिर्फ इसी मोहब्बत के भरोसे 22 साल पहाड़ तोड़ते रहे। अब सोचिये कि दशरथ माँझी ने कितना बड़ा काम किया है। ज्यादा क्या लिखूँ, अब एक वाक्य में फ़िल्म की समीक्षा करता हूँ – शानदार, जबरजस्त, जिंदाबाद

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